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05.01.2014


बर्बाद ज़माने को गोया

बर्बाद ज़माने को गोया
तौफ़ीक कहाँ आबादी की
जिस दर्द को बँधन कहते हैं
वही राह मेरी आज़ादी की

न देख मेरी रुसवाई को
तू देख गिरेबाँ में अपने
हर अश्क़ है कोहेनूर मेरा
हर आह मेरी शाहज़ादी सी

न जाने कौन ख़ता थी वो
कि सज़ा उम्र की पाई है
क्यूँ यार को रुसवा कर बैठे
क्या वज़ह थी मेरी बर्बादी की

मुझ को यकीँ है वादे पर
वो तेरा वस्ल-ए-कयामत का वादा
मेरा निकलेगा जनाज़ा कुछ ऐसे
हो धूम किसी की शादी की

यार ज़माना वखवा हैं
दिल याँ रखूं या वाँ रखूँ
या उल्झन को सुलझा दे इस
या सुने दुआ फरियादी की


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