पंकज "होशियारपुरी"

दीवान
गर है कहीं तो आकर
तुझ से मुकम्मल थी ज़िन्दगी
तुम इस शहर में सुकूँ ढूँढते हो
बर्बाद ज़माने को गोया
कविता