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ISSN 2292-9754

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10.01.2014


मेरी ग़ज़लों की भी तस्वीर बना दे कोई

मेरी ग़ज़लों की भी तस्वीर बना दे कोई,
लफ्ज़-ब-लफ्ज़ ये रंगों से सजा दे कोई

मैंने जज़्बात को फूलों से हैं अलफ़ाज़ दिए,
दिल के गुलदान में सलीक़े से लगा दे कोई

मैंने ख़ामोश निगाहों से है सब कह डाला,
अब मुकर जाने की तरकीब बता दे कोई

मेरी तहरीर में आ जाये बला की रौनक,
मुझको तालीम दे, फ़नकार बना दे कोई

मुझको मौहलत न मिली सोचने समझने की,
यूँ गया जैसे परिंदों को उड़ा दे कोई

मेरी पेशानी पे लकीरें सी उभर आयी हैं,
इन्हें मासूमियत से छू के मिटा दे कोई


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