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04.13.2012

फीनिक्स

ठण्ड की धुन्ध भरी सुबह कब की हो चुकी थी लेकिन सतीश के घर में अब भी सन्नाटा था...

सतीश ने बिस्तर पर लेटे-लेटे दीवार घड़ी पर नज़र डाली सात बज गये थे । आज बिरजू नहीं आया वर्ना बर्तनों की आवाज़ आने लगती। सतीश उदास हो उठे। अलसाये हुए बिस्तर पर ही लेटे रहे। चाय पीने की तलब मन में उठ रही थी। सर्दी ने हाथ पैर इस कदर जकड़ दिए कि वे हिल डुल भी नहीं पा रहे थे। कैसे चलेगा यह सब ? ...और कब तक! वे सोचने लगे।

रोज़ सुबह पाँच बजे उठकर दैनिक कार्यों से फारिग होते और साढ़े पाँच बजे जो घूमने जाते तो साढ़े छः तक लौटते। दस पन्द्रह मिनिट आराम से बैठते फिर बाबा रामदेव का योग करते। तब तक बिरजू आ जाता वह बर्तन साफ करता, झाड़ू लगाता, फिर चाय बनाता। सतीश चाय पीने के साथ-साथ अखबार पढ़ते । बिरजू एफ एम रेडियो के समान मोहल्ले भर के ताज़ा और स्थानीय समाचार चटखारे ले-लेकर सुनाता।

शाम की चाय वे स्वयं बनाते और पीने बैठते तो गम में डूब जाते ।

सतीश गोस्वामी- जी हाँ यही पूरा नाम था उनका । लेकिन उनकी कॉलोनी के लोग उन्हें गोस्वामी जी के नाम से ही जानते थे। बेटा बारह वर्ष का और बेटी दस वर्ष की थी तब ही उनकी पत्नी संध्या की मृत्यु हो गयी । बच्चों के पालन पोषण में वे इतने व्यस्त रहे कि कभी एकाकी जीवन दुःखदायी न बना । बेटा विदेश में नौकरी कर रहा था और परदेशी बन गया था। बेटी का विवाह हो गया तो ज़िन्दगी ही बेमानी लगने लगी... किसके लिये जियें... लेकिन जीवन है...साँसें हैं...धडकने हैं...रोज़मर्रा की आवश्यकताये हैं...।

मधुमेह और उच्च रक्त चाप ने उनकी काया में स्थायी बसेरा कर लिया था । किसके लिए कमायें ? प्रश्न उन्हें रोज़ परेशान करता इसलिए पचास वर्ष की उम्र में ही बैंक से वालेन्चुअरी रिटायरमेन्ट ले लिया ।
तीन कमरों के इस फ्लैट को उन्होंने तीन वर्ष पहले खरीदा था । घर में भरा पूरा सामान है। खाने का झंझट कौन पाले सो एक मैस से दोनों वक्त के भोजन का टिफिन बाँध लिया। जब कभी हल्का फुल्का खाने का मन करता तो खिचड़ी बना लेते इसके अलावा कुछ और बनाना ही नहीं आता ।

उन्होंने लिहाफ हटाकर उठना चाहा तो खिड़की से आयी सर्द हवा उनके प्रौढ़ चेहरे को कँपकँपाती चली गयी वे फिर से लिहाफ में दुबक गए। इस ठण्ड ने उन्हें पैंतीस साल पहले ले जाकर खड़ा कर दिया । इस सर्दी ने ही तो उन्हें और संध्या को पहली ही रात में इतने करीब ला दिया था कि दोनों की गर्म साँसे आपस में टकरा जलतरंग पैदा कर रहीं थीं और उसी लय पर उनके हाथ थिरक रहे थे। उसी ताल पर चूड़ियों की खनक, पायल की रूनझुन, कपड़ों की सरसराहट और मुँह की दबी एवं घुटी हिस्...सिस्...की आवाज़ों ने ...आनन्द के चरम शिखर पर पहुँचाकर...अनिर्वचनीय सुख का अहसास करा दिया था।

यादें ताज़ा हुयीं। पुरुषतत्व भी जागा। शरीर में फुरफुरी सी दौड़ी... हाथ-पैरों के रक्त संचार तीव्र हुआ...मन काम लालसा की बूँदों से सराबोर हो उठा...।

दरअसल बैंक की एक ही ब्रांच में काम करते थे वे दोनों, और बैंक के काम से टूर पर गये थे। मीटिंग एक दूरस्थ फैक्ट्री में थी, जहाँ से अपने होटल लौटते-लौटते साँझ घिरने लगी थी और बादल भी। दिसम्बर का महीना और कड़ाके की सर्दी...। वे और संध्या नीचे के डाइनिंग रूम मे चाय पीने बैठे। जल्दी ही दोनों एक दूसरे से प्रभावित हो गये। दोनों ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम ए किया था। सतीश तो शेक्सपीयर के साहित्य पर पीएच डी भी करना चाहता था।

दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित....एक-दूसरे पर मोहित...सो जल्दी ही अगले माह फिर से टूर पर थे...। संध्या सतीश के रूम में आयी। उसकी नज़र जॉन डन की पुस्तक पर पड़ी जिसे सतीश ने हाथ मे पकड़ रखा था। संध्या ने किताब ली और उसके पन्ने पलटने लगी। उसकी नज़रें डन की कविता "द कैननाइजेशन" की पंक्तियों पर ठहर गयीं-
The Phoenix ridle hath more wit
By us, we two being one, are it,
So, to one neutrall thing both sexes fit
Wee dye and rise the same, and prove
Mysterious by this love
(फीनिक्स पक्षी की पहेली हमारे प्रेम की समझ को और अधिक सार्थक तथा प्रगाढ़ करती है, हम दो होते हुए भी एक हैं। इसलिये हमारे दो सेक्स इतनी पूर्णता से परस्पर फिट होते हैं और सेक्सरहित एक व्यक्ति बन जाते है। यह प्रेम सेक्स भावना से कहीं ऊपर हैं । मृत्यु के पश्चात् हम पुनः जीवित होकर वही बन जाते हैं जो पहले थे ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार फीनिक्स पक्षी अपनी ही भस्म से पुनः जीवित हो जाता है और यह प्रेम हमें एक रहस्य देता है जो आदर योग्य होता है। )

संध्या ने पंक्तियाँ ऊँचे स्वर में पढ़कर सुनायीं और प्रश्न करते हुए सतीश की आँखों में झाँका- "क्या हमारा प्रेम भी यही है ?"

प्रश्न ने सतीश को थोड़ा सोच में डाल दिया। कुछ ठहरकर वह बोला- "हमारा प्रेम, प्रेम है-सच्चा प्रेम, पर रहस्यमय नहीं है और न ही काम भाव से परे। फिर सतीश ने शेक्सपीयर की "The phoenix and the turtle" कुछ पंक्तियाँ संध्या को सुनाईं-
Here the anthem doth commence
Love and constancy is dead
Phoenix and the Turtle fled
In a mutuual flame from hence
(यहाँसे एन्थम(गीत) की शुरुआत होती है। प्रेम और निरंतरता अब मर चुके है। फीनिक्स और टर्टल अब उड़ चुके है यहाँ से, एक ही ज्वाला बन कर।)

संध्या ने अपनी उत्सुकता ज़ाहिर करते हुए कहा- "फीनिक्स पक्षी एक मिथक है ?"
"एक काल्पनिक पक्षी जो अरब के रेगिस्तान में सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है, तब स्वयं को जला डालता है फिर अपनी ही भस्म से पुनः युवा के रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है।"

थोड़ा रुककर सतीश ने कहा - "फीनिक्स अपने आप में पूर्ण नहीं है। उसका पूरक टर्टल (सुंदरता की देवी वीनस का फाख़्ता) है। इसमें रहस्य नहीं है । तुम मेरा और मैं तुम्हारा पूरक हूँ।"

संध्या ने गहरी साँस लेकर कहा- "लेकिन शेक्सपीयर ने ये भी तो कहा है-
So they lov’d as love in twain
Had the essences but in one:

"हाँ बिल्कुल," कहकर सतीश ने स्टैंज़ा को पूरा करने के लिये आगे की पंक्तियाँ सुनायीं-
Two distincts, division none:
Number there in love was slain.
(प्रेम अपने आप में इतना व्यापक है कि वहाँ संख्या का कोई अस्तित्व नहीं है। दो अलग-अलग जीवों की तरह उन्होंने (फीनिक्स और टर्टल ने ) प्रेम किया लेकिन उनका (उनके प्रेम का) सार एक होने में ही है। दो अलग-अलग शरीर होते हुए भी कोई विभाजन नहीं है क्योंकि संख्या का प्रेम में कोई अस्तित्व नहीं हो सकता।)

अब संध्या ने कुछ हल्कापन महसूस किया और सतीश का हाथ पकड़कर बोली- "हाँ बाबा ये सब तो ठीक है, आई एग्री बट टैल मी (मैं सहमत हूँ लेकिन ये बताओ) कि हमारा प्यार फीनिक्स और टर्टल, प्रकृति और पुरुष के प्रेम की ही तरह है ना...अमर...निरंतर...प्रगाढ़....?"

सतीश ने संध्या का हाथ अपने हाथ में लेते हुए उसके कान के पास मुँह ले जाकर धीरे से फुसफुसाया- "हूँ"।

संध्या ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। अपने तन और मन की जलतरंग को एक दूसरे को सुना दिया था उन्होने। दोनों कुंवारे थे, दोनों ही ख़ुद मुख्तार । जल्दी ही ब्याह कर लिया था दोनों ने ।

एक ही जाति के होने के कारण भी संध्या के परिवारवालों ने बखेड़ा खड़ा कर दिया था क्योंकि यह वह ज़माना था जब वर वधू की मर्ज़ी नहीं चलती थी बल्कि माँ-बाप की इच्छा वच्चों पर थोपी जाती थी। सतीश को कई दिनों तक ये महसूस होता रहा कि कुछ अनजान से गुण्डे किस्म के लड़के उसका पीछा कर रहे हैं। लेकिन वे डरे नहीं । जब एक लड़के ने उन्हें परेशान करने की कोशिश की तो उन्होंने उसका गिरेबान पकड़कर उसे घूँसा ही मार दिया, फिर उसकी पुलिस में भी रिपोर्ट कर दी थी।

अचानक मोबाइल की घंटी ने गोस्वामीजी का ध्यान भंग कर दिया। घूमकर आने के बाद मोबाइल चार्ज होने लगा दिया था। मजबूरी में उन्हें उठना पड़ा । कॉल देखी। जयपुर से छोटी बहन राजरानी का फोन था।
"हलो हाँ राज बोलो कैसी हो...""भैया मैं ठीक हूँ... आप सनडे को जयपुर आ जाओ..."
"क्यों..."
"यहीं आ जाओ तब बताऊँगी...बहुत अर्जेंन्ट काम है..."
"तुम्हारी तबियत तो..."
"नहीं मैं व सभी लोग ठीक हैं...बस आपसे कुछ काम था..."
"....अच्छा"
"...्ज़रूर आना, अभी से रिज़र्वेशन करवा लेना।"
"ओके..."
वे कुछ देर वही बैठे रहे। जयपुर बुलाये जाने का कारण ढूँढने लगे। दूर-दूर तक नौकाविहार की लेकिन कोई किनारा नहीं दिखा...कोई सूत्र नहीं मिला..।

वे उठकर किचिन की ओर चल दिए। चाय चढ़ाई, शक्कर-पत्ती, पानी...जीवन में सब कुछ था बस दूध के बिना चाय... खदक रही थी... वहीं के वहीं... दूध डालने पर कैसा उफान आता है...।

सारी उम्र दोस्तों की तरह रहे वे और संध्या । दो बच्चे हुऐ । संध्या ने दोनों की परवरिश अच्छे ढंग से की। दिसम्बर अंत के जाड़ों में उस दिन संध्या को हार्ट अटैक आया और वह उन्हें तन्हा छोड़ जाने किस जहान में चली गई।

चाय सिप करते हुए वे सोच रहे थे काश ! कोई होता जिससे बात करके मन हल्का कर सकते। शाम के समय सारे हमउम्र दोस्त बैठकर बातें करते हैं गप्पे लगाते हैं, फिर भी कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कुछ ख़ास लोगों में ही बाँटी जा सकती हैं।

शनिवार की रात वे जयपुर पहुँच गए। रेल्वे स्टेशन पर उनके बहन-बहनोई लेने आ गये । गोस्वामी जी की खोजी निगाहें कई बार राजरानी से प्रश्न कर चुकी थीं। राजरानी आँखों से उन्हें इशारा कर देती कि अभी बताऊँगी।

भोजन के बाद राजरानी ने उन्हें एक पंफ्लेट लाकर दिया जिसमें लिखा था - "प्रौढ़ महिला -पुरुष सम्मेलन"

स्थानीय लोगों की अनूठी पहल - प्रौढ़ महिलाओं-पुरुषों के विवाह को प्रोत्साहन...। युवावस्था में अकेले हो गये महिला/पुरुष सामाजिक प्रतिष्ठा, मर्यादा, सर्विस के कारण या पारिवारिक उत्तरदायित्वों के कारण विवाह नहीं कर पाते जीवन साथी के बिना अकेले रह जाते हैं। युवावस्था तो व्यस्तता में निकल जाती है। प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में व्यक्ति को जीवन साथी की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, जिसे वह अपना अन्तरंग साथी बना सके। सन्तान की अपनी अलग व्यस्ततायें हैं। जब शरीर भी शिथिल होने लगता है तब एक हमदर्द, हमसफ़र, और एक हमराज़ की ज़रूरत होती है।
आइये और जीवनसाथी का चयन करें जिसे रविवार...

वे एक साँस में ही पूरा पंफ्लेट पढ़ गये। स्थान और समय को अनदेखा करते हुए वे राजरानी को प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगे।

"...भैया मैं चाहती हूँ आप भी अच्छा सा साथी देखकर विवाह कर लें।"गोस्वामी जी चौंक गए और हँसकर बोले - "इस उम्र में...!"
"हाँ इसी उम्र में तो जीवनसाथी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।"
"...नहीं.. इतने दिन तुम्हारी भाभी के बिना गुज़ार दिए। उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।"
"...उनके स्थान पर किसी और को बिठाने की बात नहीं कहती। जो स्थान अब सूना है उसमें तो किसी का प्रवेश हो सकता है।"
"...बेटा विदेश में सैटल हो गया। बेटी का विवाह हो गया अब क्या करूँगा...यह सब करके?"
"...आप अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो गये हैं। तब तो और अधिक सुगमता है। अपने स्वयं के जीवन के लिए भी कोई धर्म होता है। यों घुट-घुटकर जीवन जीने से मानव जीवन को शाप लगता है।"
"...लेकिन लोग क्या कहेगें ? बुढ़ापे में विवाह । सब कहेगे बुड्ढा सठिया गया है।"
"...भैया शादी शरीर की तुष्टि मात्र नहीं है । साथी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत इसी उम्र में पड़ती है। एक ऐसे साथी की आवश्यकता होती है जिससे हम अपना दुःख-सुख बाँट सकें। और फिर हमें भी आपकी चिन्ता लगी रहती है।"
"...अरे अब क्या करना है ? बात करने को दोस्त यार हैं। घर में नौकर हैं काम के लिए। बिल्डिंग में कई लोग हैं... सब सहयोग कर देते है।"

...अब तक राजरानी के पति नवीन मौन थे दोनों की बातें सुन रहे थे । वे बात काटते हुए बीच में बोले- "भैया! राजरानी ठीक कह रही है नौकर काम कर जायेगा। दोस्तों के साथ भी कितना समय गुज़ारेंगे। ज़िंदगी की मंज़िल पहाड़ के रास्ते तय मत करो भैया... उसमें सीढ़ियाँ बना लो।

उन लोगों की ज़िद और उनके तर्कों के आगे झुकना पड़ा गोस्वामी जी को । सहमति देते हुए वे संकोच से बोले- "लेकिन अप्पू क्या सोचेगी? वरुण क्या सोचेगा?"

तल्ख़ आवाज़ में राजरानी बोली, "अभी पिछले माह आप दस दिन अस्पताल में भर्ती रहे। आपने हमें ख़बर नहीं की। अप्पू को फोन किया तब भी वो नहीं आ पायी। रही वरुण की बात तो उसने आपसे संबंध ही कब बना रखे हैं। उसे आपकी ज़रूरत नहीं है। पिछले पाँच वर्षों से उसका कोई पत्र, उसका कोई कॉल, उसकी कोई ख़बर आपके पास आयी है? उसके हर जन्मदिन पर आप पत्र डालते हैं, उसका भी कभी उत्तर आया है? बदले में पहुँचा देता है अमेरिकी डॉलर जिसे आप गुस्से में वापस कर देते हैं।"

गोस्वामीजी अपने आपसे भी हार गये थे...बस एक वाक्य मुँह से निकला- "जैसा तुम चाहो... "

रातभर गोस्वामी जी ऊहापोह की स्थिति में रहे।

बेटी... दोस्त ...बिल्डिंग वाले...बच्चे सब क्या सोचेंगें। कभी-कभी मन पुलक उठता शादी के नाम से। पहली बार भी तो वे कितने प्रसन्न थे। सारी रस्में उन्होंने परम्परागत ढंग से ही निबाही थीं। वे करवट बदल सोने की कोशिश करने लग गये।

समारोह स्थल पर आकर उन्हें लगा कि वे नाहक ही संकोच कर रहे थे। यहाँ तो उनसे भी अधिक शारीरिक दृष्टि से वृद्ध नज़र आ रहे लोग बैठे थे। वे चारों तरफ का जायज़ा लेने लगे। एक तरफ़ महिलाओं की सीटें लगी थीं दूसरी ओर पु्रुषों की।

समारोह शुरू हो गया। उनके नाम की पुकार लगते ही वे सकुचाते हुए स्टेज पर आये। कई प्रतियोगिताओं में भाग लेने स्टेज पर गये हैं। उस समय कितना उत्साह रहता था। लेकिन आज पैरों में कम्पन था,चेहरे पर हल्की पसीने की बूँदे झलक आयी थीं। घबराहट के कारण सीना धौंकनी के समान चल रहा था। माइक के पास आकर वे ठिठक गये। सामने की पंक्ति में बैठी अपनी बहन राजरानी की ओर देखा। उसने सिर हिलाकर उन्हें बोलने का इशारा किया। ...आवाज़ हलक से बाहर ही नहीं निकल पा रही थी। वे बहुत असहाय महसूस कर रहे थे अपने आपको। वे बैंक में कामयाब अधिकारी रहे हैं। उनकी रौबदार आवाज़ से सभी मातहत डरते थे पर आज आवाज़ घुटी जा रही थी। ...जीभ तालू से चिपक कर रह गयी थी।

...हकलाते से बोलने लगे- "मैं सतीश गोस्वामी...निवासी ग्वालियर...आयु इकसठ वर्ष... बैंक से कम्पलसरी रिटायरमेन्ट...पेंशन बीस हज़ार...एक बेटा और एक बेटी...दोनों विवाहित...बेटा विदेश में, बेटी ललितपुर में... स्वयं का फ्लैट ग्वालियर में... मैं डायबैटिक हूँ...

गोस्वामीजी स्टेज से उतरकर अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गये। उन्हें लग रहा था कि ज़िन्दगी की रील रिवर्स हो गयी है। विवाह के लिये स्वयं का परिचय देना वो भी सबके सामने कितना मुश्किल होता है।

पुरुषों का परिचय समाप्त हो गया था। अब महिलाओं का परिचय शुरू हो गया। एक-एक महिलायें आ रही थी और अपना परिचय देकर जा रही थी। एक नाम एनाउंस हुआ- माला रावत...एक महिला अपने स्थान से उठी लेकिन वहीं कुर्सी पकड़कर खड़ी हो गयी। स्टेज तक जाने का उसमे साहस नहीं हो पा रहा था। वह फिर से बैठ गयी। उसके साथ आयी युवती ने उसे सहारा दिया...और उसे ऊपर तक लेकर आयी।

युवती माइक के पास आयी और बोली- "ये मेरी मौसी हैं- माला रावत... उम्र साठ वर्ष... बरेली में रहती थी - पति और दो बेटे थे- जिनकी एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी।"

तब व्यवस्थापक ने कहा- कुछ उन्हें भी कहने दो..."कहाँ तक पढ़ी हो आप?"

महिला ने हॉल में नज़र दौड़ाई। सभी उसी को देख रहे थे। लाज की गठरी बनी वह काँपती आवाज़ में बोली- "मैं पोस्ट ग्रेजुएट हूँ।"
"कोई हॉबी...".
"साहित्य पढ़ना "
"आपकी कोई शर्त ?"
"...दोस्त के रूप में हमसफ़र चाहिये जो मेरे दुःख को समझ सके। मेरा साथ दे सके।"
"कोई बीमारी...".

अपनी उखड़ती हुयी साँस पर काबू करते हुए बोली- "बी.पी. हाई रहता है...सर्दी में साँस उखड़ती है..."

गोस्वामीजी और उनकी बहन स्टेज पर आने वाली हर महिला को ध्यान से देख रहे थे। अभी तक ज़्यादातर महिलायें सर्विस वाली ही आयी थीं। हर महिला के जाते ही राजरानी आँखों से प्रश्न करती और हर बार गोस्वामीजी सिर हिलाकर नकारात्मक उत्तर दे देते। गोस्वामीजी की निगाहें किसी ज़रूरतमंद को ढूँढ रहीं थी जिसका जीवन वे सवार सकें। माला के स्टेज पर आते ही वे उसका रूप देखकर ठगे से रह गये। श्वेत वर्ण.. कपोलों पर रक्तिम आभास...एक अनोखा तेज लिये हुए चेहरा...चौड़ा माथा... बड़ी- बड़ी आँखे सभीत हिरणी जैसी...। जिन्हें देखकर सतीश को संध्या की आँखें याद हो आयीं । जब वह बोल रही थी उसके शब्द कानों के रास्ते मन में जलतरंग सी पैदा कर रहे थे। उन्हें लगा माला ही उनके लिये योग्य रहेगी।

लौटते समय राजरानी ने पूछा..."भैया आपको कौन अच्छी लगी ?"

गोस्वामीजी नवीन से बोले - "तुम अपनी राय बताओ"

नवीन बोले- "भैया मुझको तो न. 11 अच्छी लगी......क्या नाम था...माला?"

राजरानी हँसते हुए बोली"...रावत। हाँ भैया मुझे भी वही पसन्द है।"

गोस्वामीजी का चेहरा शर्म से हल्का गुलाबी हो चला था पर जल्द ही अप्पू का घ्यान आते ही चेहरे पर परेशानी छा गयी। वे धीरे से बोले- "ठीक है जैसा बहुमत हो।"

सम्मेलन से मिली पत्रिका में माला का पता देखा गया। फोन पर बगीचे में मिलने का स्थान और समय तय किया गया।

दोनों परिवारों के बीच बातें हुयी। कुछ समय गोस्वामीजी और माला ने साथ व्यतीत किया। एकांत पाते ही गोस्वामीजी ने ध्यान से माला को देखा, वे निर्निमेष ताकते रह गये। बहुत ही सलीके से उसने साड़ी बाँध रखी है।उसका साइड फेस देखकर तो वे और भी चैंक गये हूबहू संध्या जैसा चेहरा...वैसी ही कांति...वैसी ही शांति लिये...।उन्होंने उसकी चुप्पी तोड़ने के लिये बात करना शुरू की। माला के एक-एक शब्द गोस्वामीजी के ज़ेहन में उतरते जा रहे थे। शब्द का हर कतरा ऐसा लग रहा था जैसे बूँद-बूँद थाली पर गिरकर जलतरंग सा बज रहा हो। उनका शरीर कान और आँख में सिमट गया।यह जानकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि माला को भी शेक्सपीयर का साहित्य अच्छा लगता है। उन्हें बरबस ही याद हो आया संध्या के साथ वार्तालाप का वह अवसर...।

विवाह के लिए रविवार का मुहूर्त निकला। राजरानी ने अप्पू को फोन लगाया । राजी खुशी के समाचार लेने के बाद राजरानी ने अप्पू से कहा- "मैं सोचती हूँ भैया विवाह करलें तो अच्छा है इस समय उन्हें एक हमसफ़र की सबसे अधिक ज़रूरत है।"

पापा के विवाह की बात सुनकर अप्पू चौंक गयी और बोली- "ऐसी भी क्या ज़रूरत है, इतने साल गुज़ार दिये अब कौन सा नया तूफान आया हुआ है।"

अर्पिता को फिर से समझाते हुए बताया- "भैया अकेलापन महसूस करते हैं, कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं है। वैसे भी वे शुगर के मरीज है, और इस बीमारी में जितनी देखभाल होनी चाहिये वह तो कोई घर का व्यक्ति ही कर सकता है। ऐसे में तुम्हें या मुझे किसी को भी इतनी फुरसत कहाँ है कि उन्हे देख सकें। इसलिये मैंने बहाने से भैया को जयपुर बुलाया है । यहाँ वृद्ध महिला पुरुष का सम्मेलन था। हम लोगों के आग्रह करने पर भैया को एक महिला पसन्द भी आयी है। मुहूर्त के मुताबिक अगले रविवार को दोनों का गठजोड़ है।"

अर्पिता बौखला गयी थी बोली- "बुआजी आप भी क्या बकवास करती है, भला इस उम्र में भी कोई ब्याह रचाता है। अब तो भगवान का भजन करने का टाइम है। क्या इस उम्र में भी उन्हे पत्नी की आवश्यकता है?"
..."देखो अप्पू, भैया बड़ी मुश्किल से माने हैं तुम सहमत हो जाओगी तो भैया का एकाकी जीवन समाप्त हो जायेगा। मैं व तुम दोनों ही उनकी देखभाल नहीं कर पाते ऐसे में एक साथी की ज़रूरत है जो अकेलेपन को भर सके"...।

उधर से कोई आवाज़ नहीं आई।

..अब तक गोस्वामी जी पास आ गये। राजरानी से रिसीवर लेकर अप्पू को समझाते हुए बोले- "बेटी गुस्सा थूक दो, जल्दी से परिवार सहित यहाँ चली आओ.."
.उधर से आवाज़ आयी- "पापा मैं आपसे बात करना नहीं चाहती।"
"... इस उमर में शादी का शौक आया है आपको..." कहकर अप्पू ने फोन रख दिया।

गोस्वामी जी पसोपेस में पड़ गये। वे एक रिश्ता तोड़कर दूसरा जोड़ना नहीं चाहते थे। बच्चों की ख़ातिर ही तो उन्होंने अब तक अपने बारे में नहीं सोचा था। अप्पू को जब भी ज़रूरत पड़ी वे उसके हर फैसले में साथ खड़े थे। उसने अन्तर्जातीय विवाह किया उसके लिये भी उन्होंने जाति बंधन की दीवारें खड़ी नहीं की। यह सही है कि एकाकीपन अब सहा नहीं जाता। नौकर न आये तो एक गिलास पानी पिलाने वाला नहीं मिलता।

कुछ देर तक वे हताश होकर बैठे रहे। उन्होंने हिम्मत जुटाई अपने दोस्त जीवनलाल को फोन लगाया "हलो जीवन-मैं सतीश बोल रहा हूँ"

उधर से भी उत्साह भरी आवाज़ आयी- "सतीश कब आ रहे हो ?"
"अभी कुछ दिन बाद आऊँगा...एक खुशखबरी है "
"...बता जल्दी बता...".
"तेरी भाभी भी साथ में आयेंगी...रविवार को मेरी शादी है"
"...क्यों मज़ाक करते हो यार? आज तो फर्स्ट अप्रैल भी नहीं है"
"मैं सही कह रहा हूँ। तुम सब लोग यहाँ आ जाओ, तुम अपने ग्रुप को खबर कर देना..."
"... ..."

दूसरी तरफ एक दम सन्नाटा छा गया। गोस्वामीजी सोच रहे थे जीवन उन्हें बधाई देगा तो वे कहेंगे अब तू भी जल्दी से खुशखबरी सुनाना। लेकिन उसने रिसीवर रख दिया था।

उन्हें एक बार फिर से लगने लगा कि वे गलत फैसला कर रहे हैं। सब क्या सोचेंगे? मेरा मखौल उड़ायेंगे। रात भर उनके मन में द्वन्द्व चलता रहा।

सुबह जब वे घूमकर लौटे राजरानी किसी से फोन पर बात कर रही थी । राजरानी के चेहरे पर चिन्ता झलक रही थी-उसने बताया- "माला के यहाँ से फोन था। माला की ससुराल वालों ने दो वर्षों से उसकी कोई खबर नहीं ली थी। अब जैसे ही उन्हें पता चला है कि माला शादी कर रही है, उन लोगों ने दवाब बनाना शुरू कर दिया। वे नहीं चाहते माला शादी करे।"

गोस्वामीजी नहीं चाहते थे इतनी विसंगतियों में शादी हो। उन्हें लग रहा था कि अब शादी नहीं होगी इस विचार के साथ ही उनके मन का द्वंद्व भी खत्म हो गया।

शाम को माला संगीता के साथ उनके यहाँ आयी। माला के चेहरे पर अत्यन्त चिंता थी। कुछ देर खामोशी रही। बात संगीता ने ही शुरू की।

राजरानी की ओर देखते हुए वह बोली- "मौसीजी आज सुबह से परेशान हैं। इनके ससुराल वालों को इनकी शादी की भनक लग गयी। वहाँ से सुबह धमकी भरा फोन आया था। ...कुछ हकलाते हुए बोली... दरअसल इनके देवर इनसे शादी करना चाहते हैं, वे तलाकशुदा हैं।"

राजरानी ने कुछ सोचते हुए कहा- "यह तो और भी अच्छी बात है। ये उसी कुटुम्ब में अपने आप को जल्दी एडजस्ट कर लेंगी।"

.....इस बार उत्तर माला ने दिया, बड़े ही संयत किन्तु सहमे स्वर उसके मुँह से निकले- "वो मुझे नहीं मेरी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहते हैं। सुबह तो उन्होंने यही कहा जो कुछ तुम्हारे नाम है, हमारे नाम कर दो...फिर चाहे ब्याह रचाओ या...या किसी के संग मुँह काला करो...।"

एक सन्नाटा छा गया वहाँ। किसी को समझ नहीं आ रहा था क्या करें।

चुप्पी फिर से माला ने तोड़ी..."देवर शराब पीते हैं और दूसरी महिलाओं से भी उनके संबंध हैं इसीलिये देवरानी ने तलाक ले लिया। दो वर्षों से किसी ने मेरी खोज खबर नहीं ली। मैं कैसी हूँ? पति व बच्चों के दुःख में किसी ने मुझे सहारा नहीं दिया। पति व बच्चों के अन्तिम संस्कार में जो खर्चा हुआ था वह भी मुझसे ले लिया था। यदि मायके वालों ने साथ नहीं दिया होता तो मैं आज...। वहाँ जाकर मेरा दुःख और बढ़ जायेगा। और अगर शादी नहीं की तो मुझे और परेशान करेंगे। हो सकता है मुझे मरवा दें फिर सारी जायदाद स्वतः उन्हें मिल जायेगी।

गोस्वामीजी को माला का बोलना अच्छा लग रहा था। अचानक माला ने गोस्वामीजी की ओर देखा, अपनी ओर ताकता हुआ पाकर वह सकुचा गयी। माला की आँखों में उन्हें अपने प्रति चाहत का समंदर हिलोरें लेता मिला। उन्हें उससे जुड़ाव महसूस होने लगा। काफी देर चर्चाएँ चलती रहीं। पर समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

रात्रि में खाना खाते समय गोस्वामीजी ने राजरानी से कहा मैं कल वापस चला जाता हूँ अब क्या करना रुककर...।

नवीन ने कहा- "अभी आप क्या करेंगे वहाँ जाकर...। यहाँ आराम से रहो... बच्चों को भी अच्छा लग रहा है। हम सबको नयी-नयी डिशेज़ खाने को जो मिल रही हैं जो ख़ासतौर पर आपके आने के कारण राजरानी बना रही है।"

सभी लोग मुस्कराने लगे। बोझिल वातावरण थोड़ा हल्का हुआ। गोस्वामीजी के मोबाइल पर रिंग आयी। वे चौंक गये राजरानी उनके चेहरे को पढ़ते हुए बोली- "किसका फोन है?"

अरे आज तो वरुण का फोन आया है। सब आश्चर्यमिश्रित हर्षातिरेक में आ गये। गोस्वामीजी ने स्पीकर ऑन कर दिया । कॉल रिसीव करके उमगते हुए कहा -‘हाँ बेटा कैसे हो?"

इस बात का कोई उत्तर नहीं आया बल्कि उनसे ही प्रश्न पूछा गया - "पापा क्या आप शादी कर रहे हैं?"
वे अचकचा गये, क्या उत्तर दें...‘तुम्हें किसने बताया? सात समुंदर दूर मेरी बीमारी की खबर तो नहीं पहुँची अलबत्ता विवाह की खबर पहुँच गयी।"
"अप्पू का फोन आया था..."
"... और क्या कहा अप्पू ने?"
उधर से झल्लाया हुआ वाक्य - "पापा आप शादी-वादी नहीं करें। इस उम्र में शोभा देगा क्या? देखिए हम लोगों की भी इमेज का सवाल है?"

पश्चिमी सभ्यता में रचा बसा उनका बेटा आज अच्छे बुरे की वकालत कर रहा है।

"... फिर आप समझते क्यों नहीं प्रॉपर्टी का क्या होगा?" इस वाक्य ने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। अब उन्हें समझ आया कि वरुण क्यों ज़िद कर रहा था कि सब कुछ बेचकर उसके पास चले आओ।

गोस्वामी जी बेटे के मोह में सब कुछ बेचकर जाने को तैयार भी हो गये थे। अखबार के विक्रय कॉलम में विज्ञापन भी दे दिया था। उन्होंने खुशी-खुशी फोन करके बेटे को इसकी सूचना देना चाही, तब बातों मे पता लगा कि वो उन्हें अपने साथ नहीं वरन् "सीनियर सिटीज़न हाऊस" में रखना चाहता है जो एक तरह से वृद्धाश्रम है।

उन्होंने वरुण को कोई उत्तर नहीं दिया, मोबाइल बंद कर दिया। वे कुछ फैसला नहीं ले पा रहे थे। राजरानी और नवीन भी अचंभित थे वरुण की बात सुनकर। इतने वर्षों बाद फोन, वो भी इस तरह से...

गोस्वामीजी के हृदय में तूफान उठ रहा था। उन्हें अब समझ आ रहा था कि अब तक वरुण शान्त था, क्योंकि उनकी सारी सम्पत्ति उसी की तो थी पर अब छिनने का भय उसके मस्तिष्क पर हावी हो रहा था।

वे कमरे में चहलकदमी करने लगे। सब शान्त थे पर अन्दर हलचल लिये। उन्होंने सबके चेहरों की ओर देखा फिर मोबाइल पर कॉल करने लगे। उधर अर्पिता थी। उसने पापा से सबसे पहला प्रश्न किया- " पापा आपने क्या सोचा?’
".....बेटा तुम क्या चाहती हो?"
"पापा इतनी उम्र गुज़र गयी अब क्या करेंगे शादी करके... ?"
"माला को भी ज़रूरत है मेरी... "
"दो दिन में ही आप अपने रक्त संबंधों को भूलकर दूसरे के बारे में सोचने लगे... "
"नहीं ये बात नहीं है बेटा मुझे समझने की कोशिश करो।"
"तो ठीक है लुटा देना अपना पूरा पैसा उस दूसरी औरत पर"

यह दूसरा अवसर था जब गोस्वामीजी हक्के-बक्के रह गये । अब उन्हें समझ आ रहा था कि बच्चे उनकी शादी का विरोध क्यों कर रहे हैं?

वे रातभर करवटें बदलते रहे एक निश्चित किन्तु दृढ़ निर्णय लेने के लिये। जैसे दही मथने के बाद मक्खन ऊपर तैर आता है।

मैंने अपने बच्चों के सुख के लिये अपने सुख-वैभव के दिन यों ही अकेले गुज़ार दिये। जब जिसने जो इच्छा की हर संभव पूरी की। बेटे ने विदेशी लड़की से शादी करना चाही मैंने विरोध नहीं किया। लड़की ने अन्तर्जातीय विवाह करना चाहा मैंने विरोध नहीं किया... उन लोगों के हर सुख के आगे अपनी इच्छायें, आकांक्षाये सब कुर्बान कर दीं। संध्या की मृत्यु के बाद कितने रिश्ते आये थे... कुँवारी लड़कियों के भी... आखिर वे बैंक की नौकरी में थे और हर दृष्टि से योग्य भी। बच्चों को कोई असुविधा न हो या समाज बच्चों के मन में ’सौतेला’ शब्द न उगा दे यही सोचकर के बच्चों में ही डूबे रहे। उन लोगों को सम्पत्ति से मोह है मुझसे कोई सरोकार नहीं ... मेरे प्यार का, मेरे विश्वास का, मेरी आत्मीयता का अच्छा सिला दे रहे हैं ये लोग...।

जयपुर आने से पूर्व वे भी नहीं चाहते थे विवाह करना। पर यहाँ आकर, माला से मिलकर एक ख़्वाब पलने लगा है मन में, जीवन में फिर से वो बहार लौटती लगती है। उधर माला के परिजन भी उसकी संपत्ति चाहते हैं। हम किसी की परवाह नहीं करेंगे।यह विवाह ज़रूर करेंगे। यह तय करते ही उनके मन में उत्साह के स्फुलिंग जग उठे। उन्हे लग रहा है पतझड़ के बाद बसन्त आ रहा है। सुखद कल्पनाओं में वे विचरण करने लगे। उनके मन में एक ज़िद पलने लगी।

आज फिर उन्हें संध्या के साथ पढ़ी हुयी शेक्सपीयर की कविता ‘फीनिक्स एण्ड टर्टल" की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं-
Leaving no posterity
“Twas not their infirmity
It was married chastity
(कोई संतान या पीढ़ी नहीं छोड़कर जाना, यह उनकी कमज़ोरी नहीं, बंधन की पवित्रता है।)

वे निरंतर सोच में डूबे रहे... । संध्या और माला... माला और संध्या...दोनों चेहरे एकमेव हो रहे थे। वही अहसास...वही चाहत... वही आकर्षण और वही जलतरंग...। फीनिक्स जलकर भस्म होता है और अपनी ही राख से पुनः पैदा होता है, युवा के रूप में जीवित होकर वही चक्र दोहराता है।

इसी ऊहापोह में भोर हो गई । प्रातःकालीन सैर के लिए लोग निकलने लगे थे। आज गोस्वामीजी ने जल्दी ही बिस्तर छोड़ दिया और नित्यकर्म से निबट गए। उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे वे फीनिक्स हों । वे तैयार हुए और राजरानी और नवीन को बुलाकर अपना फैसला सुना दिया कि वे माला को ही अपना जीवनसाथी बनायेंगे। वे आगत दिनों की मधुर कल्पनाओं में विचरण करने लगे...।


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