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ISSN 2292-9754

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01.23.2015


अपनी तो बीत गई

अपनी तो बीत गई
कल्पना की ये बातें

अधूरे सपने ही हैं
आते हैं और जाते

राह आँख सुझाती
मंज़िल पैरों से पाते

ग़म की बात कही
अपनों से ही पाते

बढ़े चले जो राही
लक्ष्य वे ही पाते


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