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ISSN 2292-9754

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02.23.2016


आईना

पार्सल खोला तो एल्बम था। पहला पृष्ट पलटा। उस के माता-पिता का फोटो था, "मुझे माफ़ कर देना। आप मुझे बहुत प्यार करते थे। हर छोटी-बड़ी चीज़ का ध्यान रखते थे। मगर मैंने आप के साथ धोखा किया," आँख से आँसू टपक पड़े।

दुसरा पृष्ट पलटाया। यह उस के प्रेम-विवाह का चित्र था, "मैं ने आप को जी-जान से ज़्यादा चाहा है। इस के लिए माता-पिता के अरमानों को बलिदान कर दिया," कहते हुए उस ने चित्र को चूम लिया।

तीसरे पृष्ट पर अस्पताल का चित्र था। उस ने पलंग पर सोई हुई पुत्री को देखा, "बेटी! मैं तेरी इच्छा का भी ध्यान रखूँगी। ताकि तू मेरी तरह क़दम न उठाने को मजबूर न हो," कहते हुए उसे माँ की सूनी आँखें याद आ गईं।

चौथे पृष्ट पर पति का चित्र था, "अब मैं भी आप के साथ अमेरिका में सुख से रहूँगी," उस की निगाहों में सपने तैरने लगे थे।

उस ने अगला पृष्ट पलटा। यहाँ काग़ज़ पर लिखा था, "मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ। तेरे बिना रह नहीं सकता हूँ।" पढ़ कर उस ने काग़ज़ चूम लिया, "मैं भी," कहते हुए वह यादों में खो गई।

जब होश आया तो अगला पृष्ट पलटा । वह चौंक गई। यहाँ पति दो बच्चे और एक औरत के साथ खड़े थे। "ये पहले से ही शादीशुदा थे" वह एक झटके के साथ आकाश में उडती हुई ज़मीन पर आ गई। उस की निगाहों के सामने माता-पिता का सवाली चेहरा घूम गया।

दुनिया में उस का एक मात्र सहारा उस का पति था, वह भी धोखेबाज़ निकला। पास ही रस्सी पड़ी थी। उस ने पंखे पर डाली। स्टूल पर चढ़ गई।

तभी उस की बच्ची ज़ोर से रो पड़ी।

"हे भगवान! अब तो मेरे अमृत मंथन का विषपान मुझे भी करना पड़ेगा," कहते हुए वह बच्ची से लिपट कर रो पड़ी और उस की निगाहें शंकर भगवान के गले पर अटक गई।


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