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ISSN 2292-9754

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02.04.2017


लोक साहित्य में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना
(हरियाणा के विशेष सन्दर्भ में)

लोक साहित्य ‘लोक’ और ‘साहित्य’ दो शब्दों के मेल से बना है। साहित्य में वर्णित ‘लोक’ शब्द के अर्थ को आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने बहुत ही सटीक शब्दों में व्याख्यायित किया है कि ‘लोक’ का अर्थ नगरों एवम् गाँवों में फैली उस समूची जनता से है जो परिष्कृत, रुचि-सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन की अभ्यस्त होती है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं।1 इसी मत की सम्पुष्टि करते हुए डॉ. सत्येन्द्र कहते हैं कि लोक मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो आभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।2

अत: यह स्पष्ट है कि लोक से तात्पर्य उस सामान्य जनता से है जिसके पास पुस्तकीय ज्ञान न होते हुए भी, अपनी संस्कृति को वाणी के द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन्त रखने की क्षमता रखती है। अस्तु! लोक से ही संस्कृति की उपज होती है वही संस्कृति को आधार प्रदान करता है। लोक और संस्कृति का सम्बन्ध आधाराधेय का है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि लोकसाहित्य का जन्म भी लोकसंस्कृति से ही होता है। लोकसाहित्य का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना कि मानव। लोक मानस की अभिव्यक्ति का माध्यम है वह गेय रचना-साहित्य जिसमें लोक जीवन के अनुभूत चित्र अपने सरलतम नैसर्गिक रूप में मिलते हैं। लोकसाहित्य में लोकमानस का हृदय बोलता है। स्मृति के सहारे जीवित रहने वाला लोकसाहित्य अनेक कण्ठों से गुजरता हुआ बनता-बिगड़ता एक सर्वमान्य लोक-स्वीकृत, लोक-व्यवहृत रूप पा लेता है। अनेकों के मध्य से गुज़रते हुए भी एकता की भावना से ओत-प्रोत लोक-साहित्य जन-जन को जोड़ने की क्षमता रखता है। लोक साहित्य में व्यक्ति-विशेष की नहीं; लोक की छाप रहती है। चूँकि लोक-साहित्य लिपिबद्ध कम मौखिक अधिक रहता है, अत: साधारण जन-स्वभाव के अनुरूप उसकी भाषा भी शिष्ट साहित्यिक न होकर जन-मन की भाषा होती है। उसका शिल्प-विधान भी नैसर्गिक, निर्व्याज एवम्‌ निर्मुक्त होता है। प्राकृतिक आभा से दीप्त इसकी अनलंकृत शैली उस वन्य-कुसुम के समान है जिसे देखने-सुनने वाले भले ही कम हों पर उनकी सुरभि-सुगन्ध चहुँ ओर मदमाती है।

लोक-साहित्य के सन्दर्भ में जहाँ तक हरियाणा का सम्बन्ध है तो ध्यातव्य है कि उसमें हरियाणवी लोक-संस्कृति का प्रतिबिम्ब हू-ब-हू देखने को मिलता है। यहाँ के निवासियों का रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान, तीज-त्यौहार, व्रत-उपवास, आस्था-विश्वास, सुख-दु:ख सभी की अनगिन छवियों का भावन हरियाणवी लोक-साहित्य के अन्तर्गत किया जा सकता है।

हरियाणवी संस्कृति ग्राम्य संस्कृति है। यहाँ के लोग मुख्यत: खेती पर निर्भर करते हैं। उनके जीवन का केन्द्र और धुरी सब कृषि पर ही टिका हुआ है। उपहास की दृष्टि से यहाँ की ‘कल्चर’ को ‘एग्रीकल्चर’ से जोड़ कर भी देखा जाता है। यही कारण है कि यहाँ का लोक-संसार हो या लोक साहित्य सभी अत्यन्त सहज है, प्रकृत है। बनावट या कृत्रिमता का कहीं कोई नामोनिशान नहीं है। प्रकृति से घनिष्ठता रखने वाला हरियाणवी लोक-मन प्रकृति के हर कोमल-कठोर रूप का खुली बाँहों से स्वागत करता है। पर्वोँ–त्यौहारों के प्रति जो उल्लास यहाँ के लोगों में दिखायी पड़ता है वह यहाँ के लोकगीतों में भी दिखायी पड़ता है। हरियाणा में ‘तीज’ का त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है । श्रावण मास में आने वाला ‘तीज’ का यह पर्व इसीलिये भी विशेष महत्त्व रखता है क्योंकि यह मुख्यत: स्त्रियों का त्यौहार है। हर विवाहिता स्त्री बेसब्री से इस त्यौहार का इन्तज़ार करती है कि उसका भाई उसे ससुराल से लिवाने के लिये आयेगा और मायके में वह सखी-सहेलियों के साथ सावन की फुहारों का आनन्द लेते हुए झूला झूलेंगी, गीत गायेंगी –

आया तीजा का त्योहार
आज मेरा बीरा आवैगा।
सामण मै बादल छाये
सखियाँ नै झूले पाये
मैं कर लूँ मौज- बहार
आज मेरा बीरा आवैगा।3

सावन की बरसती फुहारों का आनन्द इस लोकगीत में भी उठाया जा सकता है –

नानीं – नानीं बूँदियाँ
हे सावन का म्हारा झूलणा
एक झूला डाला मैने
बाबल के राज में
X X X X
नानीं नानीं बूँदिया मीया बरसता हे जी
हाँ जी काहे चारूँ दिसा पड़ेगी फुवार
हाँ जी काहे सामण आया सुगड सुहावणा
संग की सहेली मा मेरी झूल तीजी
हमनै झूलण का हे माँ मेरी चाव जी4

होली का त्यौहार भी यहाँ बड़े चाव से मनाया जाता है। पूरा गाँव मिलकर होली खेलता है। क्या बूढ़ा - क्या जवान, क्या पुरुष – क्या स्त्री, क्या बाल – क्या वृद्ध सब होली के रंगों में सराबोर हो जाते हैं। ऐसा ही एक चित्ताकर्षी उदाहरण इस लोकगीत में द्रष्टव्य है –

फागण के दिन चार री सजनी
मध जोबण आया फागण मै
फागण बी आया जोबण मै
झाल उठै सै मेरे मन मै
जिसका बार न पार री सजनी
फागण के दिन चार।

एक और उदाहरण देखें–

होली खेल रहे शिवशंकर गौरा पारवती के संग
गौरा पारवती के संग माता पारवती के संग
कुटी छोड शिवशंकर चल दिये लियो नदिया संग
गले में रुण्डों की माला, सर्प लिपट रहे अंग
होली खेल रहे शिवशंकर गौरा पारवती के संग 5

हरियाणा का अधिकतर लोक साहित्य रागनी और सांगबद्ध है। कुछ ऐसे कालजयी रचनाकारों-गायकों पर एक दृष्टि अवलोकनीय है जिन्होंने हरियाणवी लोक साहित्य को सांग एवम् रागनीबद्ध करके हरियाणवी लोक साहित्य को अमर बनाने का सराहनीय प्रयास किया है। कुछ लब्ध-प्रतिष्ठ हरियाणवी लोकसाहित्यकारों पर एक दृष्टि अनिवार्य है –

पण्डित लखमी चन्द :

आपका जन्म सोनीपत ज़िले के जाटीकलाँ नामक गाँव में एक सामान्य किसान परिवार के घर हुआ था । घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण स्कूल न जा सके और घर पर ही रह कर घर के कामों में हाथ बँटाने लगे। पशु चराना उन्हें बहुत प्रिय था। पशु चराते – चराते बालक लखमी अपनी धुन में मस्त भजन, गीत गाता रहता। धीरे–धीरे लोग लखमी की गायन- प्रतिभा से प्रभावित होने लगे। बाद में उन्होंने संगीत की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की तथा रागबद्ध रागनियाँ तथा साँग गाने लगे।

रागनी एक कौरवी लोकगीत विधा है और आज एक स्वतन्त्र लोकगीत विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। रागनी के माध्यम से जीवन के अनुभूत तथ्यों–सत्यों का वर्णन लखमीचन्द जी ने बख़ूबी किया है। जीवन की रेल के साथ तुलना करते हुए कितना अद्भुत –अनन्य साँगरूपक का प्रयोग इन्होंने अपनी इस रचना में किया है –

हो ग्या इंजन फेल चालण तै घण्टे बन्द घडी रहगी
छोड ड्राइवर चल्या गया टेशन पै रेल खडी रहगी
भर टी टी का भेष रेल मै बैठ वे कुफिया काल गये
बन्द हो गी रफ्तार चालण तै, पुर्जे सारे हाल गये
पाँच ठगाँ नै जेब कतर ली, डूब – डूब धन माल गये।6

पण्डित माँगेराम :

पण्डित माँगेराम पण्डित लखमी चन्द के प्रिय शिष्यों में से एक थे। साँग कला में निपुण वे एक प्रसिद्ध गायक थे। हरियाणवी लोक साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर माने जाने वाले पण्डित माँगेराम की रागणियाँ पूरे हरियाणा में प्रसिद्ध हैं और खूब चाव से गायी जाती हैं। एक बानगी देखिये –

तेरा बडा भाई तेरे भरोसे करग्या
तनै बचन भरे थे, तू इसा तावला फिर ग्या
तेरा दिन की अलग छठी बैठी सूँ
मेरा हो ग्या कम तौल घटी बैठी सूँ
सब कार ब्योवहार तै दूर हटी बैठी सूँ
तनै धन चाहिये मै लुटी – पिटी बैठी सूँ।7

इन पंक्तियों में उस विवाहिता स्त्री का दारुण चित्र उपस्थित है जिसके पति की अकाल मृत्यु हो गयी है तथा समाज की रीति अनुसार अब उसे जीवन पति के भाई के साथ व्यतीत करना है । यह प्रथा शायद ज़मीन–ज़ायदाद को बँटने न देने के लिये बनायी गयी थी।

कवि नर सिंह : कवि नर सिंह लोकप्रिय गायक थे, मिट्टी से जुडे हुए नायक थे। इन्होंने अपनी रागणियों में किसान के जीवन की करुण गाथा का वर्णन इतने मार्मिक शब्दों में किया है कि आँखों से अश्रु बह निकलते हैं । एक छोटा-सा उदाहरण देखिये –

कातिक बदी अमावस थी
अर दिन था खास दिवाली का
आँख्याँ कै माँह आ गे घर देख जब हाली का
कितै बणै थी खीर, कितै हलवे की खुशबू ऊठ रही
हाली की बहू एक कूण मै खडी बाजरा कूट रही
हाली नै ली खाट बिछा वा पैंत्या कानी तै टूट रही
भर कै हुक्का बैठ ग्या वो चिलम तलै तै फूट रही
सारे पडोसी बालकाँ खातर खील खिलौणे ल्याये थे
दो बालक बैठे हाली के उनकी ओड लखावै थे
बची रात की जली खीचडी घोल सीत मै खावै थे 8

मेहर सिंह :

मेहर सिंह एक फौजी कवि थे। सन् 1944 ई. के युद्ध में शहीद हो जाने के कारण मेहर सिंह की रागणियों को एक विशेष लोकप्रियता प्राप्त है। सैनिक होने के नाते यह नितान्त स्वाभाविक ही है कि उनकी रागनियाँ युद्ध और सैन्य जीवन के अनुभवों से ओत-प्रोत है। सैनिक का जीवन केवल सैनिक के लिये ही चुनौतियों से भरपूर नहीं होता वरन् उनके निकट के सगे सम्बन्धियों के लिये भी उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है । सैनिक की पत्नी की भावनाओं के कुछ उदाहरण ध्यानीय हैं –

फौज मै जाकै भूल ना जाइये तू अपनी प्रेम कौर नै
डर डर कै मर ज्याँगी मै देख कै घटा घोट नै
X x x
हाँ शाम सवेरी मनै एकली नै खेत मै जाणा हो
बदमास्याँ की टोली घुमै मुश्किल गात बचाणा हो
तेरी खातर रहूँगी जीवती जब तक पाणी – दाणा हो
नहीं मौत का कोई भरोसा कद हो ज्या माल बिराणा हो 9

जैमिनी हरियाणवी :

आपका वास्तविक नाम देवकीनन्दन है लेकिन हरियाणवी लोक जगत में आप जैमिनी हरियाणवी के नाम से विख्यात हैं। हास्य रस के सम्राट कहलाने वाले आप हरियाणवी लोकसाहित्य के अकेले ऐसे कवि है जिन्होंने अपनी हरियाणवी रचनाओं में इतना हास्य रंग भर दिया कि वे बेमिसाल बन गये –

ओ मेरी महबूबा, महबूबा, महबूबा
तू मन्नै ले डूब्बी मै तन्नै ले डूब्बा

X X X X
गोरी म्हारै गाम की चाल्ली छम छम
गलियारा भी काँप गया मर गये हम

कँवल हरियाणवी :

हरियाणा के कैथल जिले में जन्मे श्री कृष्ण व्यास ‘कँवल हरियाणवी’ के नाम से विख्यात हैं। आप एक सेवामुक्त सैनिक हैं और शायद पहले ऐसे हरियाणवी रचनाकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल जैसी विधा को हरियाणवी में लिखने का दुस्साहस किया। कुछ-एक उदाहरण द्रष्टव्य हैं –

चाल – चलण के घटिया देखे बडे बडे बडबोल्ले लोग ।
भारी भरकम दिक्खण आलै थे भीत्तर तै पोल्ले लोग ।।
X X X X
जीवन भर तो खूब सताया करया मेरा अपमान
अरथी पै जिब लै कै चाल्लै बडा भला था बोल्ले लोग
X X X X
चोट इतनी खाई सै मन्नै
दर्द की दुनिया बसाई सै मन्नै।10

सन्दर्भ सूची :
1. डॉ. सत्येन्द्र, लोक साहित्य का विज्ञान, प्र॰ 3
2. आ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, लोकसाहित्य का अध्ययन, जनपद, अंक – 1
3. www.mharaharyana.com
4. वही।
5. वही।
6. वही।
7. वही।
8. वही।
9. वही।
10. वही।

अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, भारतीदासन गवर्नमैण्ट कालेज फार विमैन, पुदुच्चेरी, भारत


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