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ISSN 2292-9754

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07.08.2014


अपनी-अपनी सोच

दफतर में बैठे-बैठे मैंने सोचा कि सुमन से मिले हुए बहुत दिन हो गए, उससे मिलकर आती हूँ। फिर मुझे ख्याल आया कि पहले उससे फोन पर पूछ लूँ कि वह दफतर आई है भी या नहीं।

उसके फोन की घंटी बजने लगी उधर से आवाज़ आई- "हैलो"
मैंने कहा- "सुमन तुम दफतर आई हो? मैं तुमसे मिलने आ रही हूँ.........।"

उसने कहा- "नहीं! मैं तो छुट्टी पर हूँ, मेरी लड़की को टायफाइड हो गया है, बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है, तीन दिन से अस्पताल में भर्ती है...।"

"अच्छा! तो उसे अस्पताल से कब छुट्टी मिलेगी..........?"

"पता नहीं जब बुखार उतरेगा शायद तभी हम लोग घर जा पायेंगे..........।"

अचानक फोन की लाइन कट गई।

बहुत देर तक उसी के बारे में सोचने लगी। मैं उसकी बच्ची को देखने अस्पताल जाना चाहती थी। मौसम भी आज बहुत गर्म था। मेरा अस्पताल जाना नहीं हुआ। दो-तीन दिन बीत गये, मेरी तबियत भी खराब थी। इसलिए सुमन से बात नहीं हो पाई।

मुझे याद आया कि आज रात को हम सबको एक शादी की पार्टी में जाना है। मैंने सुमन को वहाँ जाने के लिए फोन लगाया। उसने मुझसे कहा- "डॉक्टर साहब आज छुट्टी देने को कह रहे थे, तुम ज़रूर जाना......।"

हमारे बीच थोड़ी ही बातचीत हुई। मैं सोच रही थी कि मेरी सहेली कैसी बात कर रही है, क्या अस्पताल से घर लौटकर वह पार्टी में जाने के लिए तैयार हो जायेगी। क्या उसकी मानसिक स्थिति इतनी जल्दी बदल जायेगी। उस ऊहापोह में मैंने पार्टी में जाना निरस्त कर दिया।

कुछ दिन के पश्चात् एक दिन दफतर में सुमन से मेरी मुलाकात हुई तो वह मुझसे पूछने लगी- "तुम उस दिन पार्टी में नहीं दिखी, क्यों नहीं आई, पार्टी में बहुत मज़ा आया........।"

उसकी बातों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। और मैं बहुत देर तक सुमन के बारे में ही सोचती रही। फिर मन ही मन स्वयं को समझाने की कोशिश की कि मैं आज के आधुनिक युग की सोच से कितनी दूर हूँ। क्या मैं सुमन की तरह अपनी सोच में बदलाव ला पाऊँगी।


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