भारतीय विद्या संस्थान ने आज से लगभग सैंतीस वर्ष पूर्व हिन्दी पत्रिका
-प्रकाशन के क्षेत्र में ज्योति (मासिक) का सूत्रपात कर सफलता-पूर्व
पदार्पण किया था। किन्तु,
समय
और परिस्थितियों ने इसे द्विभाषीय पत्रिका बनने
पर बाध्य कर दिया। ज्योति लगभग बीस वर्षों तक प्रति मास नियमित
रूप से छपती रही। इसे विश्व हिन्दी पत्रिकाओं के इतिहास मं सम्मान एवं
स्थान मिला। यहां तक कि द्वितीय हिन्दी सम्मेलन के अवसर पर भारतीय
साँस्कृतिक सम्बन्ध परिषद द्वारा प्रकाशित गगनांचल के
सम्मेलन-विशेषांक अथवा स्मारिका के आवरण पृष्ठ पर ज्योति
पत्रिका के मुख्य आवरण पृष्ठ का चित्र भी प्रकाशित किया। कालान्तर में
यह द्विभाषीय त्रैमासिक पत्रिका बन प्रकाशित होती रही है। वास्तव में
ज्योति पत्रिका हिन्दी,
संगीत
और साँस्कृतिक पुनरुत्थान के विकास- सम्बन्धित इतिहास में एक दस्तावेज़
बन गई है। देश-विदेश से आने वाले कितने ही शोधार्थी छात्र प्राय: इसकी
सहायता से अपना शोध कार्य सम्पन्न करते हैं। भारतीय उच्चायोग ने एक
हिन्दी पत्रिका हिन्दी-निधि स्वर का श्रीगण्ोश किया किन्तु महामहिम
उच्चायुक्त मोहदय श्री वीरेन्द्र गुप्ता के
निकट अतीत में दिए गए वक्तव्य के अनुसार वह भी द्विभाषीय
पत्रिका बन कर रह गई है। ऐसी स्थिति में ट्रिनिडाड जैसे भारतीय मूल
निवासी-बहुल देश में पूर्ण रूप से हिन्दी पत्रिका का प्रकाशित न होना,
गरिमा
की बात नहीं है।
सन्
2001
में श्री आदेश आश्रम के परिसर में एक विराट अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी
संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया था। उस समय हमने संकल्प लिया था कि
ट्रिनिडाड से एक विश्व हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ होना चाहिए। उस
समय इसका नाम विश्व हिन्दी समीक्षा रखा गया था। महान कवयित्री
स्वर्गीया महादेवी वर्मा के गुणों से अभीभूत हिन्दी की आधुनिक महादेवी
डा. मधुरिमा सिंह भी इस अवसर पर उपस्थित थीं। उन्होंने उस पत्रिका के
मुख पृष्ठों के लिए कुछ चित्र भी बनाए थे। किन्तु परिस्थितियों वश हम
उस संकल्प को सiक्रय
रूप नहीं दे पाए। संभवत: उसी अपूर्ण संकल्प की पूर्त्ति ही इस
यज्ञ-कार्य के श्रीगणेश का हेतु बन गई है। यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा
कि भारतीय विद्या संस्थान के समादृत संस्थापक तथा उनके कर्मठ शिष्यों
की लगन तथा अथक परिश्रम द्वारा की गई सेवाओं के परिणाम स्वरूप इस देश
में हिन्दी के क्षेत्र में अप्रत्याशित प्रगति हुई है। विगत सप्ताह में
आयोजित किए गए भारतीय विद्या संस्थान के तेंतीसवें साँस्कृतिक शिक्षण
शिवर तथा हिन्दी कक्षाओं एवं परिक्षाओं में हिन्दी छात्रों तथा
प्रेमियों की प्रगति देखकर हमारा हृदय पुन: उत्साहित हो गया और हमने उस
प्रगति को देखकर अपनी पत्रिका का नामकरण
’प्रगति’
ही कर
डाला। अत: इस पत्रिका का शुभारंभ
’प्रगति’
नाम
से ही किया जा रहा है। आशा है,
हिन्दी प्रेमियों एवं छात्रों की रुचि एवं ज्ञान-बुद्धि के क्षेत्र में
’प्रगति’
प्रगतिशील सिद्ध होगी। इस पत्रिका का परिसर केवल ट्रिनिडाड एंड टुबेगो
तक ही सीमित नहीं रहेगा अपितु इसे विश्व फलक पर ले जाने का प्रयास
रहेगा। आज के युग में एक छोटे से देश में पत्रिका-प्रकाशन के यज्ञ का
अलख जगाकर हिन्दी संसार से न जुड़ना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। अत:
हमें विश्वास है कि ट्रिनिडाड की यह अकिंचन पत्रिका विश्व के हिन्दी
प्रेमियों के मध्य एक सेतु का कार्य करेगी। हम अपने सभी इष्ट-मित्रों
तथा भारतीय विद्या संस्थान के छात्रों,
हितैषियों तथा समर्थकों से आशा करते हैं कि हमें इस पवित्र कार्य में
उनका पूर्ण सहयोग मिलेगा। संस्थान एक अव्यवसायिक पंजीकृत संस्था है,
जहाँ
आरम्भ से लेकर स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा सदा से ही नि:शुल्क दी जाती
रही है। अतएव अर्थ-संघर्ष की विषमता से सामुख्य होगा ही किन्तु हमें
प्रभु पर पूर्ण विश्वास है कि वह हमारे अन्य उत्तरदायित्त्वों के
निर्वहण के साथ-साथ इस कार्य को भी सफल बनाने में पूर्ण सहायक होगा। यह
ईश्वर का ही कार्य है। हमारे पास केवल लगन है,
निष्काम सेवा है,
एक
महान उद्देश्य है और हमारे साथ आप हैं। अत: सफलता तो मिलनी ही है।