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| 10.29.2007 |
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गोस्वामी तुलसीदास के तीन रूप डॉ. निर्मला आदेश |
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श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा
की है कि जब-जब धर्म की हानि होती है,
तब वह
धर्म की संस्थापना के लिए पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में अवश्य अवतरित
होते हें। इसी तथ्य को कवि कुल गुरु गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी अपनी
अमर कृति रामचरित मानस में सीधे-सादे
शब्दों में कहा है :-
जब-जब होइ धर्म की हानी। बाढ़ैं पाप,
असुर-अभिमानी।
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरiहं
व्याधि,
सज्ज्न की पीरा।।
उत्तर
सोलहवीं शताब्दी का भारत शहंशाह अकबर का भारत था। उस समय भारत में ही
भारत-जात हिन्दु दो भागों में विभक्त हो गए थे। एक तो वे जो जन्मजात
हिन्दु थे। दूसरे वे जो हिन्दु से बलात् इस्लाम धर्म स्वीकार करने के
लिए बाध्य किए गए थे। यह क्रम सातवीं शताब्दी से चल रहा था। अत:
भारत-जात मुसलमानों की भी कई पीढ़ियाँ व्यतीत हो चुकी थीं। इस प्रकार
भारत की आत्मा दो भागों में विभक्त हो गई थी। इस प्रकार भारतीयों को
धर्म के नाम पर विभाजित कर कुछ विदेश-जात यवन लोग भारत पर राज्य कर रहे
थे। निरक्षर किन्तु कुशाग्रबुद्ध शहंशाह स्वयं पैगम्बर बनने के स्वप्न
देख रहा था और उसके पिट्ठुओं
द्वारा हिन्दु-मुसलमानों को अपना - अपना धर्म अथवा मत त्याग कर
दीन-इलाही नामक एक नए मत को अपनाने के लिए बहलाया-फुसलाया जा रहा था।
हिन्दुओं में शैव,
वैष्णव,
शाक्त,
सौर्य
एवं गाणपत्य आदि वर्ग बने हुए थे। सभी सम्प्रदाय स्वयं को एक दूसरे से
श्रेष्ठ समझते थे। ऐसे समय में हिन्दु-मुस्लिम एकता का नारा लगाया संत
कबीर ने। मुस्लिम वर्ग में प्रेम का संदेश दिया जायसी,
कुतुबन और मंझन आदि ने। बाल कृष्ण का माधुर्य रूप दर्शा कर वात्सल्य
धर्म का दिग्दर्शन तथा भागवत की भक्ति प्रधान भावना का प्रचार किया सूर
ने,
मीरा
ने। तत्कालीन सारे ही
वर्णों,
वर्गों और दार्शनिक प्रणालियों में समन्वय स्थापित कर सौहार्द्र का
सेतु बनाने का चिर स्मरणीय काम किया तुलसीदास ने। उन्होंने रामचरित
मानस में तत्कालीन संत (ज्ञान - प्रेम),
वेद-वेदान्त तथा पौराणिक दर्शन का सुन्दर एवं संतुलित सामंजस्य स्थापित
किया गया है।
तुलसीदास निश्चय ही परमात्मा द्वारा प्रेषित एक दिव्य दूत,
पीर
या पैगम्बर थे। उन्होने
श्रीराम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। उनके
लोकनायक राम कोई छूआछूत अथवा जाति-पांति का भेद-भाव नहीं मानते।
आतंकवादी ताड़का,
सुन्द-निसुन्द आदि का विनाश कर,
वे
जहाँ एक ओर अनेकानेक ऋषि-मुनियों को हृदय लगाते हैं,
वहीं
शुद्र वर्णीय निषाद राज गुह्य को भी आलिंगन-वद्ध करते हैं।,
केवट
को पाँव धोने देते हैं। भीलनी शबरी के जूठे बेर नि:संकोच भाव से खाते
हैं। उसे नवधा भक्ति का उपदेश देते हुए कहते हैं:-
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउं एक भगति कर नाता।।
जाति-पांति कुल धर्म बड़ाई।....धन बल परिजन गुन चतुराई।।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल वारिद देखिअ जैसा।।
(अरण्य कांड दोहा 35)
अर्थात् श्रीराम ने शबरी से कहा - हे भामिनि! मेरी बात ध्यान से सुन।
मैं केवल भक्ति का ही एक मात्र सम्बन्ध मानता हूँ। जाति,
पांति,
उच्च
कुल,
धर्म,
बड़ाई,
धन,
बल,
परिवार,
गुण
और चातुर्य के होने पर भी भक्ति से विहीन मनुष्य केवल एक जल-रहित बादल
जैसा श्रीहीन प्रतीत होता है। इस प्रकार वे
केवल एक स्बन्ध को श्रेष्ठ मानते हैं,
वह है
भक्त और भगवान का सम्बन्ध।
तुलसी
के आराध्य देव आगे चलकर वानर-कुल शिरोमणि हनुमान एवं सुग्रीव से आत्मीय
सम्बन्ध स्थापित करते हैं। सीता-हरण के पश्चात् पक्षीराज जटायु की
अंत्येष्टि स्वयं करते हैं। राक्षस-कुलोद्भव विभीषण को अपना भ्राता
बनाते हैं। कहाँ है ऊँच-नीच?
जाति-भेद?
रंग-भेद?
चौदह
वर्ष वन में रह कर जन-जातियों में जागृति उत्पन्न कर के उनमें
आत्म-विश्वास पैदा करते हैं। अंत में राक्षसराज रावण को युद्ध में
विधिवत् पराजित कर के संसार से अन्याय अनीति और अनाचार का समूल विनाश
करते हैं और राम-राज्य की स्थापना करते हैं। वे स्वतंत्रता,
समानता,
अनुशासन-प्रियता,
सहअस्तित्व,
कर्त्तव्यपरायणवादिता तथा समन्वयवाद
का संदेश देते हैं।
यथार्थ में हमारे समक्ष गोस्वामी तुलसीदास जी के तीन रूप उपस्थित होते
हैं जो अत्यन्त सशक्त और सक्षम हैं। प्रथम रूप है एक अनन्य अनुरागी का;
जो
जन्म से ही ममत्व का भूखा है,
प्यार
का प्यासा है। जो अपनी पत्नी को इतना अधिक प्यार करता है कि उसकी
दृष्टि में श्रवण-भादों की घटाटोप अंधियारी;
बाढ़
से उफनती हुई नदी,
मृतक
देह तथा छत से लटकता हुआ सर्प भी कोई महत्त्व नहीं रखता। सरिता सामान्य
बन जाती है;
शव
शिव अर्थात नौका का रूप ले लेता है;
सर्प
रज्जु का कार्य करता है। उसे विशुद्ध प्रेम की पराकाष्ठा में सर्वत्र
केवल रतना ही रतना दिखाई पड़ती है। तो इस प्रकार प्रथम रूप है रतना-पति
रामबोला का। द्वितीय रूप है एक परम वैरागी राम-भक्त तुलसीदास का और
तृतीय रूप है उनके आचार्यत्व एवं उच्च कोटि के कवि का। तुलसी दास के
महान कवि तथा भक्त के रूप में इतिहास पुरुष बन जाने
की पृष्ठभूमि में एक अत्यन्त अनुकरणीय बात है कि तुलसी ने जो
लिखा वही जिया और जो जिया वही लिखा। उनकी करनी और कथनी में वैषम्य नहीं
था अपितु पूर्ण साम्य था। इसीलिए उनका साहित्य प्रभावशाली और सर्व
ग्राह्य बन गया। आज के कवियों को तुलसी की इस मूल विशेषता का अनुसरण
करना चाहिए।
कवि
के रूप में तुलसी की कल्पना एवं समाहर शक्ति,
सूक्ष्म पर्यवेक्षण शक्ति,
भाषा
कौशल तथा संवेदन शीलता अद्वितीय है। तुलसी "कला जीवन के लिए" सिद्धान्त
का प्रतिपादन करते हैं न कि "कला कला के लिए"। उनकी मान्यता है कि जो
काव्य लोक-हित के लिए हो,
वही
वास्तव में उत्तम काव्य है। वे कहते हैं :
कीरति भणति भूति भल सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
(बालकांड दोहा 14)
अर्थात् किसी की भी कीर्त्ति,
कविता
तथा संपदा वही श्रेष्ठ है,
जो
पतिपावनी गंगा जी के समान सबका मंगल करनेवाली हो।
तुलसी
की भक्ति में आत्म-कल्याण और लोक कल्याण दोनों का समन्वय है। उनका
भक्ति - संदेश केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं अपितु मानव मात्र
के लिए है। उनके आराध्य देव सामाजिक भेद-भावों से दूर हैं।
सृष्टि के रक्षक हैं। उनके सिद्धान्त अनुकरणीय है।
तुलसीदास ने अनेक पुस्तकें लिखीं। विनय पत्रिका उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति
मानी जाती है,
जिसमें उनके भक्त श्रेष्ठत्व के
अतिरिक्त आचार्यत्व के दर्शन होते हैं और रामचरित मानस महाकाव्य
महान एवं लोकप्रिय माना जाता है। उनके रामचरित मानस की लोकप्रियता एवं
श्रेष्ठता के समक्ष संसार की समस्त पुस्तकों के कीर्त्तिमान फीके पड़
जाते हैं। रामचरित मानस का अनुवाद लगभग सभी विश्व भाषाओं में हो चुका
है। गोस्वामी तुलसीदास सत्य अर्थों में विश्व के पहले महाकवि हैं
जिन्हें इतनी लोकप्रियता एवं आदर मिला है।
गोस्वामी तुलसीदास एक महान आचार्य,
महान
कवि,
दर्शनाचार्य एवं
युग-प्रवर्त्तक थे। |
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