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| 10.29.2007 |
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आधुनिक गद्य गीत शैली के जनकश्री बालकृष्ण भट्ट
डॉ. निर्मला आदेश |
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हिन्दी गद्याकाश के जाज्वल्यमान नक्षत्रश्री बालकृष्ण भट्ट हिन्दी
साहित्य के अमूल्य रत्न थे। उनका जन्म प्रयाग के एक प्रतिष्ठित परिवार
में हुआ था। भट्ट जी की माता अपने पति की अपेक्षा अधिक पढ़ी-लिखी और
विदुषी थीं। उनका प्रभाव बालकृष्ण भट्ट जी पर अधिक पड़ा। भट्ट जी मिशन
स्कूल में पढ़ते थे। वहाँ का प्रधानाचार्य एक ईसाई पादरी था। उससे
वाद-विवाद हो जाने के कारण इन्होंने मिशन स्कूल जाना बंद कर दिया। इस
प्रकार वह गृह पर रह कर ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे। वे अपने
सिद्धान्तों एवं जीवन-मूल्यों के इतने दृढ़ प्रतिपादक थे कि कालान्तर
में इन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण मिशन स्कूल तथा कायस्थ
पाठशाला के संस्कृत अध्यापक के पद से त्याग-पत्र देना पड़ा था।
जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने कुछ समय तक व्यापार भी किया परन्तु उसमें
इनकी अधिक रुचि न होने के कारण सफलता नहीं मिल सकी। आपकी अभिरुचि आरंभ
से ही साहित्य सेवा में थी। अत: सेवा-वृत्ति को तिलांजलि देकर वे
यावज्जीवन हिन्दी साहित्य की सेवा ही करते रहे।
भट्ट
जी एक अच्छे और सफल पत्रकार भी थे। हिन्दी प्रचार के लिए उन्होंने
संवत्
1933
में प्रयाग में हिन्दी वर्द्धिनी नामक सभा की स्थापना की। उसकी ओर से
एक हिन्दी मासिक पत्र का प्रकाशन भी किया,
जिसका
नाम था "हिन्दी प्रदीप"। वह बत्तीस वर्ष तक इसके संपादक रहे और इसे
नियमित रूप से भली - भाँति चलाते रहे। हिन्दी प्रदीप के अतिरिक्त
बालकृष्ण भट्ट जी ने दो-तीन अन्य पत्रिकाओं का संपादन भी किया। संवत्
1971
में उनका देहावसान हो गया।
भट्ट
जी भारतेन्दु युग के प्रतिष्ठित निबंधकार थे। अपने निबंधों द्वारा
हिन्दी की सेवा करने के लिए उनका नाम सदैव अग्रगण्य रहेगा। उनके निबंध
अधिकतर हिन्दी प्रदीप में प्रकाशित होते थे। उनके निबंध सदा मौलिक और
भावना पूर्ण होते थे। वह इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें पुस्तकें लिखने
के लिए अवकाश ही नहीं मिलता था। अत्यन्त व्यस्त समय होते हुए भी
उन्होंने "सौ अजान एक सुजान",
"रेल
का विकट खेल",
"नूतन
ब्रह्ममचारी",
"बाल
विवाह" तथा "भाग्य की परख" आदि छोटी-मोटी दस-बारह पुस्तकें लिखीं। वैसे
आपने निबंधों के अतिरिक्त कुछ नाटक,
कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे हैं।
बालकृष्ण भट्ट की भाषा को दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि
की भाषा तत्सम शब्दों से युक्त है। द्वितीय कोटि में आने वाली भाषा में
संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ-साथ तत्कालीन उर्दू,
अरबी,
फारसी
तथा आँग्ल भाषीय शब्दों का प्रयोग भी किया गया है। वह हिन्दी की परिधि
का विस्तार करना चाहते थे,
इसलिए
उन्होंने भाषा को विषय एवं प्रसंग के अनुसार प्रचलित हिन्दीतर शब्दों
से भी समन्वित किया है। आपकी भाषा जीवंत तथा चित्ताकर्षक है। इसमें
यत्र-तत्र पूर्वी बोली के प्रयोगों के साथ-साथ मुहावरों का प्रयोग भी
किया गया है
,
जिससे
भाषा अत्यन्त रोचक और प्रवाहमयी बन गई है।
भट्ट
जी की लेखन - शैली को भी दो कोटियों में रखा जा सकता है। प्रथम कोटि की
शैली को परिचयात्मक शैली कहा जा सकता है। इस शैली में उन्होंने
कहानियाँ और उपन्यास लिखे हैं। किन्तु इस शैली में कोई विशेषता नहीं है
जो हृदय-ग्राही हो। द्वितीय कोटि में आने वाली शैली गूढ़ और गम्भीर है।
इस शैली में भट्ट जी को अधिक नैपुण्य प्राप्त है। आपने "आत्म-निर्भरता"
तथा "कल्पना" जैसे गम्भीर विषयों के अतिरिक्त
, "आँख",
"नाक",
तथा
"कान",
आदि
अति सामान्य विषयों पर भी सुन्दर निबंध लिखे हैं। आपके निबंधों में
विचारों की गहनता,
विषय
की विस्तृत विवेचना,
गम्भीर चिन्तन के साथ एक अनूठापन भी है। यत्र-तत्र व्यंग्य एवं विनोद
उनकी शैली को मनोरंजक बना देता है। उन्होंने हास्य आधारित लेख भी लिखे
हैं,
जो
अत्यन्त शिक्षादायक हैं। भट्ट जी की गद्य गद्य न होकर गद्यकाव्य सी
प्रतीत होती है। वस्तुत: आधुनिक कविता में पद्यात्मक शैली में गद्य
लिखने की परंपरा का सूत्रपात श्री बाल कृष्ण भट्ट जी ने ही किया था।
उन्हें आज की गद्य प्रधान कविता का जनक माना जा सकता है। हिन्दी गद्य
साहित्य के निर्माताओं में उनका प्रमुख स्थान है। |
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