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05.03.2012
 

मुहब्बत का जुनूँ मरा नहीं करता
निर्मल सिद्धू


कहीं तो कोई बेहद ही तरसता है तेरी ख़ातिर
कहीं कोई तेरी ज़रा सी भी परवाह नहीं करता
कहीं तो कोई अपने दिलो जां लुटाता है तुझ पे
कहीं कोई तुझसे थोड़ी सी भी मुहब्बत नहीं करता

कहीं तो दिल में वलवले उठते तेरी आहट से ही
कहीं कोई तेरी तरफ इक निगाह भी नहीं करता
कहीं तो तेरे ख़्वाबों से भी हरदम मुहब्बत है होती
कहीं कोई तुझको एक पल सोचा भी नहीं करता

कहीं तो फ़लक से फ़रिश्ते भी तेरे कदमों को चूमते हैं
कहीं कोई अदना सा इन्सान भी झुका नहीं करता
कहीं तो अब्र भी बरसता है तेरी आँख के इशारे पे
कहीं एक बूँद पानी भी तुझको मिला नहीं करता

कहीं तो नगीने की तरह दिल में सजाते तुझको
कहीं काँच बराबर भी कोई तुझको पूछा नहीं करता
कहीं आस्मां भी रूबरू तेरे झुका देता है खुद को
कहीं एक ज़र्रा भी कभी ख़ुद को क़ुर्बान नहीं करता

ये दुनिया है मेरी जान, लाखों ही रंग हैं इसके
बग़ैर मतलब किसी से कोई निबाह नहीं करता
तुम आज नहीं तो कल यह बात मान ही लोगी
इस दौर में बिना वजह कोई प्यार नहीं करता

हर हाथ में है संग यहाँ हर हाथ में है ख़ंज़र
ऐसे मौसम में मरने वाला भी बचा नहीं करता
पलट आओ कि अभी भी दिल में धड़कन है बची
मुहब्बत का जुनूँ निर्मल यूँ ही मरा नहीं करता


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