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05.03.2012
 

धर्म के हथियार
निर्मल सिद्धू


तुम जो लिये हाथ में धर्म के हथियार फिरते हो
क्या समझते हो कि बने परवरदिगार फिरते हो

क्या सीखा है यही, लहू बेगुनाहों का बहाते रहो
गर नहीं तो क्यूँ हथेली पे धरे अंगार फिरते हो

इस आग से जलोगे एक दिन तुम भी ये जान लो
ख़ुद को तुम भले कहते धर्म के ठेकेदार फिरते हो

काम हर्ग़िज़ ये तुम्हारा बहादुरी का हो नहीं सकता
लिये सरफिरे लोगों का चाहे तुम अंबार फिरते हो

यूँ चला तो नक़्श मिट जायेंगे त्वारीख़ के सफ़ों से
बदल जाओ, क्यों सबके तुम बने अय्यार फिरते हो

न उलझो न उलझाओ निर्मल अब फ़िजूल बातों में
मस्ले हल के बीच क्यों बने तुम दीवार फिरते हो


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