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| 12.26.2007 |
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आब-ए-हैवाँ दे दे.... |
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मेरी ख़ामोशी को अब ज़ुबाँ दे दे भटक रही हैं आरज़ुयें दर-बदर तेरे सिवा कोई और न हो साथ मेरे ग़र्द-ओ-ग़ुबार में अवस न हो मेरे आँसू जीना मरना मेरा तेरे लिये हो केवल आज़ाद हवाओं पे लिख सकूँ दास्ताँ कोई होंठ न काँपे मेरे सरे दार भी कभी बढ़ चुकी तश्नगी मेरी बेपनाह अब सह सकें ज़माने की मुख़ालफ़त ‘निर्मल’ मेरी ख़ामोशी को अब ज़ुबाँ दे दे |
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