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| 12.26.2007 |
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ओ ख़ुदा |
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राह मुझे दिखलाता चल राह मुझे दिखलाता चल...
भूली भटकी यह काया है
गुत्थी यह सुलझाता चल
दुनिया है क्यों ग़म का मेला
फिर जो चाहे करवाता चल
सुन्दर उजली वो बूँद कहाँ है
प्रेम सुधा बरसाता चल
मुझको दे दे ध्यान अपना तू
राह मुझे दिखलाता चल |
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