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12.30.2007
 

यह ’भारतीय’ क्या होता है?
निखिल सूद


“वह है पेड़, वह है फूर और वह आकाश”
पिता अपने प्यारे ’बेबी जॉन’ को समझाता है;
पर बेबी जॉन को इस सब की कहाँ परवाह
उसका ध्यान तो मुझपर टिक आता है।

“यह भारतीय है।“ डैडी जॉन ने कहा,
जैसे कोई ज्ञान का बीज बोता है;
बेबी ने बीज उखाड़ और बोला –
“यह ’भारतीय’ – क्या होता है?”

यह ’भारतीय’ क्या होता है?
यह ’भारतीय’ क्या होता है?
यह ’भारतीय’ क्या होता है?
अर डैडी, बताओ न! यह ’भारतीय’ आखिर क्या होता है?

मैं बोला डैडी जॉन से – ’न घबराओ’
और बेबी जॉन से – ’मेरी बात पर कान लगाओ।“

भारतीय है वह पढ़ाकू बच्चा
जिसे चश्मा पहने, रट्टा लगाना ही आता है;
असली ज्ञान तो उसके बस में नहीं,
न जाने ’पेप्स” और ’मेक्किन्स’ कैसे चलाता है!

वह तो रीति-रिवाज़ों में खोया हुआ है,
उसका हर चोंचला पूरी दुनिया को हँसा दे;
पर शायद इसी कारण वह ’प्रेम’ का पाठ
उसी दुनिया को चुटकी में पढ़ा दे!

भ्रष्ट है वह, गरीब है वह,
गिनती में सौ करोड़ के करीब है वह;
जादू ही होगा – जिसके बल पर
प्रगती की जगमगाती तस्वीर है वह!

’जा सिमरन, जा!’ का गीत गाते हुए
फूलों में घूमता है, बादलों पर सोता है
पर इसी “नॉनसेंस’ को देख-सुनकर, जनाब
पूरे ’वर्ल्ड’ को कुछ-कुछ होता है!

और खाता क्या है यह अजूबा?
करी खाता है, बस केवल यही;
दोसा, ढोकला, दाल, पराँठा –
यह सब तो कुछ हैं ही नहीं!

वाह बेबी जॉन और डैडी जॉन!
आपके चेहरों से मालूम होता है;
कि शायद समझ आ ही गया आपको
कि यह ’भारतीय’ आखिर क्या होता है!

मन में यदि आशंका हुई
तो किसी भी भारतीय से पूछ लेना,
या फिर – इस कवित की कॉपी दे रहा हूँ –
इसे ही, महोदय, पढ़ लेना!


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