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ISSN 2292-9754

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02.02.2017


मनुस्मृति के बहाने

आज-कल संस्थान में प्रवीण द्वितीय वर्ष और विशेष गहन कक्षा के शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य गति पकड़े हुए है। इसी क्रम में के.हि.सं के वृहत् पुस्तक संग्रहालय के कोने-कोने से गुज़रते हुए, एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ हाथ लगा। "मनुस्मृति" | इस ग्रन्थ की इस अधुनातन समाज मे उपयोगीता तथा सरोकार को लेकर पहले ही कई बार मेरे मन में सवाल उठ चुके थे। मानती हूँ प्रत्येक रचना, अपने कालखंड की विभिन्न परिस्थितियों की उपज होती है, तथा प्रत्येक वस्तु के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू होते हैं। किन्तु मनुस्मृति की जिस तरह से उपदेयता बढ़ाई गयी है वह नकारात्मक प्रभाव डालती है। विशेषकर जब बात स्त्री वर्ग, धर्म और जाति के सन्दर्भ में हो तो यहाँ अन्धानुकरण ही दिखता है।

मनुस्मृति- संक्षिप्त परिचय

"मनुस्मृति हिन्दु धर्म का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्राचीन धर्म शास्त्र है। इसे "मानव-धर्म-शास्त्र", "मनुसंहिता" आदि नामों से भी जाना जाता है। परंपरानुसार यह स्मृति स्वायंभुव मनु द्वारा रचित है, वैवस्तव मनु या प्राचनेस मनु द्वारा नहीं। हिन्दू मान्यता के अनुसार मनुस्मृति ब्रह्मा की वाणी है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भाँति-भाँति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है। मनुस्मृति के काल एवं प्रणेता के विषय में नवीन अनुसंधानकारी विद्वानों ने पर्याप्त विचार किया है। किसी का मत है कि "मानव" चरण (वैदिक शाखा) में प्रोक्त होने के कारण इस स्मृति का नाम मनुस्मृति पड़ा। कोई कहता है कि मनुस्मृति से पहले कोई मानव धर्मसूत्र था (जैसे मानव गृह्यसूत्र आदि हैं) जिसका आश्रय लेकर किसी ने एक मूल मनुस्मृति बनाई थी जो बाद में उपबृंहित होकर वर्तमान रूप में प्रचलित हो गई। मनुस्मृति के अनेक मत या वाक्य जो निरुक्त, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते हैं, उनके हेतु पर विचार करने पर भी कई उत्तर प्रतिभासित होते हैं। इस प्रकार के अनेक तथ्यों का बूहलर (Buhler, G.) (सेक्रेड बुक्स ऑफ़ ईस्ट सीरीज़, संख्या २५), पाण्डुरंग वामन काणे (हिस्ट्री ऑफ़ धर्मशात्र में मनुप्रकरण) आदि विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है। यह अनुमान बहुत कुछ संगत प्रतीत होता है कि मनु के नाम से धर्मशास्त्रीय विषय परक वाक्य समाज में प्रचलित थे, जिनका निर्देश महाभारतादि में है तथा जिन वचनों का आश्रय लेकर वर्तमान मनुसंहिता बनाई गई, साथ ही प्रसिद्धि के लिये भृगु नामक प्राचीन ऋषि का नाम उसके साथ जोड़ दिया गया। मनु से पहले भी धर्मशास्त्रकार थे, यह मनु के "एके" आदि शब्दों से ही ज्ञात हुआ है। कौटिल्य ने "मानवा: (मनुमतानुयायियों) का उल्लेख किया है।

पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार मनु परंपरा की प्राचीनता होने पर भी वर्तमान मनुस्मृति ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी से प्राचीन नहीं हो सकती (यह बात दूसरी है कि इसमें प्राचीनतर काल के अनेक वचन संगृहीत हुए हैं) यह बात यवन, शक, कांबोज, चीन आदि जातियों के निर्देश से ज्ञात होती है। यह भी निश्चित है कि स्मृति का वर्तमान रूप द्वितीय शती ईसा पूर्व तक दृढ़ हो गया था और इस काल के बाद इसमें कोई संस्कार नहीं किया गया।"

मनुस्मृति और स्त्री : अध्ययन और पुष्टिकरण

शास्त्री जी अपने "दो शब्दों" में मनुस्मृति की उपयोगिता दर्शाते हुए लिखते हैं – "मनुष्य ने जब से जीवन के विकास के लिए प्राण, संपत्ति और सम्मान की सुरक्षा के रूप में... व्यक्ति को सभ्य, सुसंस्कृत और सामाजिक बनाने के लिए, उसके सर्वतोन्मुखी विकास के लिए, परिवार में उसके स्थान के लिए, स्त्री-पुरुष के संबंध की समुचित व्यव्यस्था के लिए व्यक्ति द्वारा संचित संपत्ति के उत्तराधिकारी के साथ-साथ उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने तथा दण्ड व्यव्यस्था करने की आवश्यकता हुई। इन्हीं आवश्यकता के पूरक ग्रन्थ को स्मृति नाम दिया गया, जिन्हें कालान्तर में शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठा मिली।"

मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पाँच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित आदि विषयों का उल्लेख है। मनु के अनेक टीकाकारों के नाम तथा व्याख्याएँ भी प्रचलित हैं। परन्तु मेरी रुचि इसके नवम अध्याय में वर्णित स्त्री के कर्तव्य और अधिकार प्रसंग पर अधिक रही। कारण स्त्री का कर्त्तव्य निर्धारण और दायित्व बोध तो विस्तार से वर्णित किया गया किन्तु अधिकारों को शून्य घोषित कर दिया गया। नवम अध्याय का आरंभ निम्न श्लोक से होता है –

पुरुषस्य स्त्रीयाश्वैव धर्मवर्लनि तिष्ठोः
संयोगे विप्रयोगे च धर्मन्वक्ष्यमि शाश्व, तान॥1॥

(पृष्ठ-334)

टीका - "भृगु जी बोले हैं - महात्माओ! अब मैं आप लोगों को धर्म मार्ग पर चलने वाली स्त्रियों और पुरुषों के साथ रहने और पृथक-पृथक रहने के सनातन धर्मों का परिचय देता हूँ। आप लोग ध्यान से सुनें।"

रीतिकाल के आरम्भ से ही हम लोग पाते हैं कि स्त्री का माता-भगिनी-पत्नी आदि रूप धूमिल होने लगता है और उसका शृंगारिक चित्रण आरम्भ हो जाता है। स्त्री देह का मांसल वर्णन जयदेव से आरम्भ होकर आदिकाल में विद्यापति से होते हुए रीतिकाल में संपूर्ण रूप से व्याप्त हो जाता है। स्त्री के इस रूप की प्रतिष्ठा मेरे ख़्याल से मनुस्मृति के प्रभाव स्वरूप उत्पन्न होती है।

हर काल में हर जाति, धर्म, वर्ण विशेष में हम देख सकते हैं पुरुषों को एकाधिक पत्नियाँ ग्रहण करने की अधिकार रहा है। परंतु स्त्रियाँ बाल्यावस्था में ही क्यों न विधवा हो जाएँ उन्हें दूसरा पति ग्रहण करने की स्वीकृति नहीं रही है। इसके विपरीत ऐसी अवस्था में उसे "सतित्व धर्म" पालन करने हेतु बाध्य किया गया है, और पति के शव के साथ अग्नि में विसर्जित कर दिया गया है। निम्न श्लोक देखिए –

अश्वतन्त्राः स्त्रीयः कार्याः पुरुर्षेः स्वर्दिवानिशम्।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाण्याः आत्मनोवेशो ॥2॥

पृष्ठ-334)

टीका - "पुरुषों (पतियों) को विषय में आसक्त अपनी स्त्रियों को सदैव दिन-रात अपने वश में रखना चाहिए।"

प्रकृति की दो जातियाँ नारी और पुरुष में नारी बुद्धि है तो पुरुष बल है। दोनों, एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं। तब यह अधीनता का प्रसंग ही कहाँ से उठ खड़ा होता है? मनुस्मृति का निम्न श्लोक, पुरुषों के द्वारा नारी की आजीवन संरक्षण का मुद्दा सामने रखता है। परंतु प्रश्न ये है कि संरक्षण या सुरक्षा किससे! –

पिता रक्षती कौमार्ये भर्ता रक्षती यौवने।
रक्षन्ति स्तविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यर्महति ॥3॥

(पृष्ठ-334)

टीका- "स्त्री की बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में क्रमशः पिता, पति और पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात वह उनके अधीन रहती है, और उसे अधीन ही रहना चाहिए, क्योंकि वह कभी स्वतन्त्रता के योग्य नहीं।"

प्रकृति के समान केवल स्त्री जाति के पास ही नये जीवन को जन पाने की वरदान है। उसकी यही शक्ति उसे वेदों-उपनिषदों तथा मनुस्मृति में भी महान बनाती है। मेरे इस कथन को निम्नोक्त श्लोक पुष्ट करता है।

परंतु इसका अंतर्विरोध भी कुछ श्लोक में देखा जा सकता है | कैसे पुरुष नारी के इस महानतम रूप को अपनी कृपादृष्टि का परिणाम घोषित कर देता है। श्लोक देखिए-

प्रतिभार्या सम्प्रविश्य गर्भभूत्वेह जायते।
जायायास्तद्धि जायात्वं भदस्यां जायते पुनः॥8॥

(पृष्ठ-335)

टीका - "पति ही प्रकारांतर से पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होकर इस संसार में उत्पन्न होता है। (पति को) फिर से जनने के कारण ही जाया को "जाया" संज्ञा दी जाती है। दूसरे शब्दों में (पति को) जनना ही जाया की जायात्व है।"

अपने आसपास दृष्टि डालने पर मैं इस अंतर्विरोध का निष्कर्ष यह प्राप्त करती हूँ कि, नारी-पुरुष जब वैवाहिक सम्बन्ध में बँधते हैं तब पति-पत्नी कहलाते हैं। दोनों के बीच प्राकृतिक संबंध स्थापित होने पर एक नया जीवन अपना अस्तित्व प्रकट करता है। एक पुरुष ही होता है जो कभी नैतिक रूप से तो कभी अनैतिक रूप से स्त्री से सम्बन्ध बनाता है। परंतु कोई भी परिस्थिति हो दोषी केवल नारी ही होती है। उसका गर्भ कभी प्रेम का प्रतीक बनता है, तो कभी पाप का अंश। सभी परिस्थितियों में वह शोषित, अपमानित होती है।

मनुस्मुति में एक श्लोक ऐसा भी है जो स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को ही पुरुष में समाहित करता दिखाई पड़ता है। श्लोक-

एतावानेव पुरुषो भज्जायात्मा प्रज्ज्यति ह।
विप्रा प्रादुस्तथा चेतद्या भत्ति स्मुताङ्गना ॥44॥

(पृष्ठ-341)

टीका - विद्व ब्राह्मणों का कथन है कि स्त्री, पुरुष और संतान, ये तीनों मिलकर (इनका संयुक्त रूप का नाम) ही एक पुरुष कहलाता है। इस रूप में पति ही पत्नी और पति ही पुत्र है।

स्त्री की ख़रीद-फ़रोख्त आज भी हमारे समाज कि एक सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। आज भी स्त्री एक भोग की वस्तु समझी जाती है। इस समस्या का सूत्रपात मेरे अनुसार मनुस्मृति के अनुशीलन से ही होता है। निम्नलिखित श्लोक देखिए-

न निष्क्रयविसर्गास्यां भर्तृभीया विमुच्यते।
एवं धर्म विजानमिः प्राक्प्रजापतिनिर्मितम ॥45॥

(पृष्ठ-341)

टीका- "प्रजापति द्वारा निर्मित यही सनातन धर्म है कि पति भले ही स्त्री का विक्रय अथवा त्याग कर दे, फिर भी वह उसकी पत्नी कहलाती है।"

सामाजिक होने के नाते हो या स्वयं के जीवन को सफल बनाने के लिए हो कुछ नियम या अनुशासनों का पालन करना अनिवार्य होता है। इस मामले में प्रकृति भी बाध्य होती है। वो भी एक निश्चित समय में आवागमन करती है, अपना वेश परिवर्तन करती है। इसी उद्देश्य से मनुस्मृति में दोनों जातियों के लिए कुछ नियम प्रणयन किया गया है। परंतु सूक्ष्म विश्लेषण से ही यह साफ दिख जाता है कि नारी के लिए ये नियम कैसे कारुणिक बन जाता है। दूसरी तरफ़ यह ग्रन्थ पुरुष के वर्चस्व को मज़बूती प्रदान करता है। नारी के लिए प्रणीत नियम (श्लोक)-

विधिवत्प्रतिगृह्यपि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम।
व्यधितां विप्रदृष्टां वा छद्म नाचोपपादिताम ॥71॥

(पृष्ठ-345)

टीका- "विधिपूर्वक ग्रहण कि गई कन्या भी यदि निंदित, रोगग्रस्त, दोषयुक्ता और छलपूर्वक दी गई सिद्ध होती है तो उसका परित्याग कर देना चाहिए।"

स्त्री के चरित्रगत या स्वास्थ्यगत समस्या होने पर पुरुष को उसे तत्क्षण परिययाग कर देना चाहिए परन्तु यही समस्या जब पुरुष की हो तो नारी का कर्त्तव्य है कि वह पुरुष कि सेवा करे। क्योंकि पति परमेश्वर का रूप होता है और नारी उसकी चरणों की दासी। प्रस्तुत श्लोक देखिए –

अन्मत्तं पतितं क्लीवमवींम पापरोगिणम्।
न च त्यागेऽस्ति द्विषन्त्याश्च न च दाया प्रबर्तनम् ॥78॥

(पृष्ठ-346)

टीका- "पागल, पतित, नपुंसक, क्षीणवीर्य, भयंकर रोगग्रस्त तथा पापकर्मों में विरत पति से घृणा करने वाली स्त्री का न तो ऐसे पति को परित्याग करना चाहिए और न ही उससे धन छीनना चाहिए।"

आगे ऐसे ही कई श्लोक सामने आते जाते हैं जो नारी को अस्तित्वहीन, दासी,वस्तु रूप से परिगणित करते हैं। सभी नियमों का बोझ नारी के पैरों में पायल के रूप में बाँध दिया गया है। आज भी वह मनुस्मृति नामक पायल को अपने पैरों में लपेटे उसे शोभा बढ़ाने वाले अलंकार के रूप में देखती है। अपने स्वाभिमान और अस्तित्व को वह पुरुष के हाथों कब का समर्पण कर चुकी है आज के आधुनिक समाज की न्याय व्यवस्था की नींव भी मनुस्मुति ही है। टीकाकार अपने "दो शब्द" में ही लिखते हैं -"ब्रिटिश शासकों ने भी भारत पर अधिकार करने के बाद इसी स्मृति को आधार बनाकर इंडियन पैनल कोड बनाया तथा स्वतंत्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना... पिछले दो हज़ार वर्षों से हिन्दू समाज की संरचना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

पारंपरिक समाज से लेकर उत्तर-आधुनिक समाज में, अपने कर्मक्षेत्र से लेकर गृहस्थ जीवन आदि सभी क्षेत्रों में नारी आज भी दलित, प्रताड़ित, शोषित वर्ग का बड़ा हिस्सा रही है। और स्त्री को उसका हिस्सा बनाने में मनुस्मृति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। कह सकते हैं मनुस्मृति ने बधिया स्त्री को गढ़ा है। इस सन्दर्भ में फ्रेंच भाषा की स्त्रीवादी लेखिका सिमोन-द-बोउवार का कथन एकदम सटीक बैठता है -"स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है"।

1. सन्दर्भ ग्रन्थ - मनुस्मृति (भारतीय आचार- संहिता का विश्वकोश) / टीकाकार - डा. रामचंद्र वर्मा शास्त्री / प्रकाशक- विद्याविहार, नई दिल्ली
2. सहायक –
१. विकिपीडिया : एक मुक्त ज्ञानकोश
२. agniveer.कॉम
३. bharatdiscovery.org/india/मनुस्मृति
४. jaisudhir.blogspot.com/2011/07/blog-post_17.html


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