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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


काश…!

अच्छा होता कि हम बच्चे होते
समझदार नहीं नासमझ होते
छोटे से हाथ होते पर हिम्मत
आसमान को छूने की होती।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

पास ना कोई ख़ज़ाना होता,पर
गुल्लक में डैडी से ज़िद कर
जोड़े गए पैसों से, पूरी दुनियाँ
ख़रीद लेने का जज़्बा होता।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

रूठने का भी एक अलग अंदाज़ होता
दोस्ती भी बस छोटी उँगलियों
के मिलने भर से होती।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

कई बार गिरते पर उठ कर
बस शान से, जीते ठोकरों
से सम्भलकर चलना सीख लेते।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

मिट्टी के घरौंदे ही कभी
सच के घर बन जाते, जहाँ
हम बस ख़ुशियाँ ही रखते
फ़िक्र को तो जैसे "नो एंट्री"
का बोर्ड दिखाते।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

करते कई मनमानियाँ तो, कभी
करते ज़िद चाँद को छूने की
तो सच में छू भी लेते उसे
फर्श पर बने बिम्ब में और
उस ज़ीत में फ़ख्र से मुस्कुराते।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।

मुट्ठी में हौंसले ले घूमते
रात को सोते तो किसी चीज़
की परवाह ना होती, ना कल की
ना आज की, हर लम्हें को जीते
हर पल में ख़ुश रहते और
हर हाल में में मुस्कुराते।

अच्छा होता कि हम बच्चे होते।


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