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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


इक इब्तिदा

नये साल के जश्न मेँ इक इब्तिदा होगी,
हम होंगे तुम होगे राहें फ़िर आसां होंगी।

कुछ बातें जो छूट गई कहने से,
कुछ जो रूठे हैं हम से,
वो बातें अब पूरी होंगी,
वो रूठे अब अपने होंगें।

उम्मीदों की धूप खिला कर,
आशाओं को मुस्काना होगा।

पड़े अधूरे काम वर्षों से,
तकते राह पूरे होने की,
इस बार कतार में पहले
उनको होना होगा।

नया साल कुछ ऐसा होगा
कि, हर कोई कुछ अपनायेगा,
एक चेहरे की हँसी किसी का,
मुरझाया पल फिर खिलायेगा।

नए साल के स्वागत में,
अच्छाई फिर अन्दर आयेगी,
जो बैठी सेंध लगाये बुराई
उस को बाहर जाना होगा।

अपना छोड़ फिर कुछ दूजों
के लिए कर जाना होगा,
ख़ुशियों के लम्हों से फिर
आने वाला वर्ष भर जायेगा।

इब्तिदा=आरम्भ


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