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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


एक उड़ान

उड़ चला है फिर आज मन
चलो फिर एक दुनियाँ सजाते हैं।

जोड़ते हैं मन की बात से दिलों को
चलो आज फिर बैठ कुछ रिश्ते बनाते हैं।

चल पड़ते हैं आज वही पुरानी राहों में,
कहते है कुछ क़िस्से वक़्त के
चलो आज फिर उस वक़्त में चलते हैं।

कुरेदते हैं आज फिर उन सब को
जो यूँ ही गुमसुम बैठे हैं
चलो आज उन से ही कुछ गुफ़्तगू करते हैं।

बुनते हैं कुछ सपने, सँजोते हैं कुछ ख़्वाब
चलो आज फिर एक नई उड़ान भरते हैं।


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