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ISSN 2292-9754

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05.16.2017


उसके मुक्कमल रिश्ते

पायल जल्दी जल्दी क़दमों को बढ़ाते हुए सामने खड़ी ऑटो को पकड़ना चाहती थी, पर तभी सेल फ़ोन की घंटी बजी। ओफ़्ह...हो....इसे भी अभी ही बजना था, छोड़ो .... बाद में देखती हूँ।

"भैय्या.. घंटाघर तक चलोगे क्या?"

"चलिए बैठिये।"

ऑटो में बैठते ही पायल बोली, "ऑटो वाले भैय्या आज तो बहुत बारिश हो रही है, ऐसे में ऑटो मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है।"

"हाँ मैडम जी, हमारे लिए तो सारे मौसम एक सामान हैं, अगर काम नहीं करेंगे तो खाएँगे क्या?" ऑटो वाला बोला।

पायल ने टालते हुए जवाब दिया, "हाँ वो तो है।"

"मैडम जी रास्ते में मेरी औरत सड़क किनारे फल की दुकान लगाती है वहीं आपके घंटाघर के थोड़े से पहले ही। बाज़ार भाव से कम रेट पर देती है। मैडम आप भी कभी लेकर देखना।"

"ठीक है..., ठीक है...," और वापस अपना फ़ोन देखने लगी। देखा पापा की मिस्ड काल थी। तुरंत पापा को फ़ोन लगाया और कहा कि हैलो पापा मैं आधे घंटे में पहुँचती हूँ। पापा कुछ बोलते इससे पहले ही फ़ोन काट दिया। ऑटो वाला बोला कि मैडम जी मेरा बच्चा बहुत बीमार है आप कहें तो रास्ते में उसे देखता हुआ चलूँ।

"भैय्या... ज़्यादा देर मत करना।"

"नहीं मैडम जी मैं ऑटो में बैठे-बैठे ही उसके हाल ले लूँगा।"

चौराहे पर पहुँचते ही देखा कि सड़क किनारे बहुत भीड़ है उसने देखा कि उसकी औरत की दुकान भी बंद थी। तभी भीड़ में से कोई बोला, "अरे उस संतरे वाली औरत का बच्चा कुपोषण से मर गया।" इतना सुनते ही मेरे अन्दर कुछ हिल सा गया। मैं हतप्रभ होकर सोचने लगी कि फलवाली का बेटा कुपोषण से मर गया। हे भगवान् कैसी विडम्बना है कि जो फल बेचती रही, वही अपने बेटे को रोज़ एक फल न खिला सकी।

ऑटो वाला बोला, "मैडम जी आपको जल्दी से छोड़ दूँ।"

"अरे नही भैय्या... आप यहीं रुको मैं दूसरी ऑटो लेकर चली जाऊँगी।"

"नहीं मैडम इतनी बरसात में दूसरी ऑटो नहीं मिलेगी," और उसकी आँखों में आँसू आ गए और उसने अपनी पुरानी शर्ट की आस्तीन से आँसू पोंछते हुए ऑटो स्टार्ट कर दी।

मैंने घर आने पर उसे पैसे दिए और चुपचाप उसे बिना देखे घर के अन्दर चली गयी। पता नहीं क्यों नज़रें मिलाने का साहस भी नहीं हुआ और घर आकर बिना खाए ही सो गयी। सुबह हुई तो डेली के रूटीन में वो बातें भूल सी गयी पर हाँ इतना अंतर ज़रूर आया कि अब आते-जाते उसी से फल खरीदने लगी। जितने मीठे उसके फल थे, कहीं उससे ज़्यादा उसका व्यवहार मीठा था। कभी भी मोल-भाव नहीं करती थी बल्कि तौल में एक दो फल ज़्यादा ही डाल देती थी। उसकी कोई दुकान न थी बस एक कोठी के सामने एक खाली जगह पर दुकान लगाती थी और वहीं उसके बच्चे अधनंगे घूमते रहते। सर पर छाया के नाम पर एक फटी बरसाती थी, पर वो फलवाली हमेशा मुस्कुराती रहती थी। मैंने एक बात और गौर करी कि उसकी दुकान में औरों से ज़्यादा भीड़ रहती थी क्योंकि वो सब पैसा कमाते थे और ये रिश्ते। कोई दीदी, कोई चाची कोई बहन कहकर उसे कई नामों से बुलाते थे। मेरा भी एक अनकहा सा रिश्ता जुड़ गया था। पहले हमारे घर में दो–दो महीने में फल आते थे पर आजकल तो हर हफ़्ते आने लगे। क्योंकि सस्ते जो मिल रहे थे। ऐसे ही एक दिन मैं ऑफ़िस से लौट रही थी तो देखा कि नगर निगम की गाड़ी खड़ी है और जितने भी सड़क किनारे पटरी दुकानदार थे सबका चालान काट रही थी इतना ही नहीं रोज़ की दुकानदारी करके अपने बच्चों के सपने पूरा करने की जुगत में लगे रहने वाले इन दुकानदारों का सामान तक ज़ब्त कर लिया। कोई अपने ठेले को वापस करने की कोशिश कर रहा है तो कोई माफ़ी माँग कर दुबारा ठेला सड़क किनारे न लगाने की बात कर रहा था। तभी मैंने देखा कि एक जगह भीड़ का झुण्ड लगा हुआ है। पुलिस जैसे ही संतरे वाली की दुकान हटाने पहुँची तो सारे लोग चिल्ला पड़े...

"अरे साहब...! ये ग़रीब औरत अपने बच्चों का पेट पालती है, क्यों आप उसकी दुकान उजाड़ रहे हो।" पुलिस वाला चिल्लाया, "अरे भाई चालान तो बनेगा ही, इसने टैक्स भी तो नहीं भरा। हम क्या करें। ए हवालदार हटाओ इसकी दुकान यहाँ से।"

"रहने दो साहब मै धीरे-धीरे पैसे दे दूँगी।"

फिर उसने कमर में खोंसे रुमाल की किनारी खोली फिर अपने कपड़े की तिजोरी से रुपये निकाल कर बोली, "अभी ये दो सौ रुपये रखो।"

"चार हज़ार से कम में काम नही होगा।"

तभी भीड़ में से एक आदमी आया और कहा कि ये लो मेरी तरफ से पाँच सौ रुपये। उसका यह कहना कि भीड़ में से हर आदमी कुछ न कुछ पैसा देने लगा और पुलिस वालों से सभी बोले कि इसमें से आगे के दो साल तक का पैसा जमा कर लो और अब हमारी फलवाली चाची को परेशान न करना। सभी ने एक जुट होकर उसकी दुकान बचा ली। वो रोती हुई हाथ जोड़कर सबका शुक्रिया अदा करने लगी। तभी उस भीड़ के बीच से एक सोलह सत्रह साल का लड़का बोला, "अरे चाची आपने मीठे फल ही नहीं बेचे बल्कि फलों से भी ज़्यादा मीठे रिश्ते बनाये हैं।" मैं दूर से खड़ी–खड़ी ये सब मंजर देख रही थी और मन ही मन मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गयी...।


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