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ISSN 2292-9754

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09.02.2014


जादूगर थुम्बा

यह कहानी उन दिनों की है जब कलाकार कला की पराकाष्ठा को छूने के लिये जी जान से लग जाते थे। शिवदत्त उसी समय का मूर्तिकार था। उसने अपनी इस कला में इतनी प्रवीणता प्राप्त कर ली थी कि लोग कहते कि इसकी कृतियाँ इतनी सजीव हैं कि बस इनमें जान फूँकने भर की ज़रूरत है। कोई कहता कि उसकी बनाई मूर्ति को अगर काँटा चुभ जाये तो उसमें से खून बह निकलेगा। सभी उसकी मूर्तिकला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते और मुँह-माँगी कीमत देकर उन्हें खरीदने तैयार रहते। उसकी बनाई मूर्तियाँ ऊँची कीमत पर बिक जाती थीं।

शिवदत्त ज़्यादातर देवी-देवताओं की ही मूर्तियाँ बनाता। उसका विचार था कि इन देवी-देवताओं की मूर्तियों की स्थापना से लोगों की आत्मा में जागृति पैदा होगी और वे पुण्य कर्म की ओर प्रेरित होंगे। पृथ्वी स्वर्ग बन जाएगी।

"शिवदत्त की कला में जादू है," यह कहते हुये लोगों को जब जादूगर थुम्बा ने सुना तो उसके मन में ईर्ष्या जाग उठी। जादूगर थुम्बा दुष्ट और कपटी था। दुष्ट और कपटी के ही मन में ईर्ष्या जल्दी घर कर लेती है और कालान्तर यही ईर्ष्या अपनी क्रूर बाहों में स्वयं उस दुष्ट को भी जकड़ लेती है और उसका सत्यानाश कर देती है। ईर्ष्या के वशीभूत हो जादूगर थुम्बा वेश बदलकर शिवदत्त की बनाई मूर्तियों की प्रदर्शनी में गया और जादू फूँककर शिवदत्त को ही मूर्ति में बदल दिया और जब उस मूर्ति की निलामी हुई तो जादूगर ने इतनी ऊँची बोली दी कि सब हार गये। जादूगर थुम्बा मूर्तिरूप में पाषाण बने शिवदत्त को अपने महल में ले आया और उसे लोहे की मज़बूत सलाखों में बंदकर उसमें वापस जान फूँक दी।

शिवदत्त अपने को कैद में देखकर घबरा उठा। सामने जादूगर थुम्बा को देख वह थर-थर काँपने लगा। शिवदत्त ने पूछा कि उसे इस तरह क्यों कैद रखा गया था, तो जादूगर दहाड़ा, "सुना है कि तेरी कला में जादू है। तू देवी-देवताओं की सुन्दर मूर्तियाँ बनाता है और उनकी स्थापना सर्वत्र कराकर तू पृथ्वी को स्वर्ग में बदलना चाहता है। अब देखना है कि तू बड़ा जादूगर है या मैं। तू यहाँ रहकर देवी-देवताओं की सुन्दर मूर्ति बनायेगा और मैं उनमें शैतान की जान फूँक दूँगा और तब पृथ्वी पर देवी-देवताओं के रूप में शैतान ही शैतान बिखर जाएँगे।"

दुष्ट जादूगर के चेहरे पर क्रूरता झलक रही थी। शिवदत्त डर गया। परन्तु उसने सोचा कि अगर वह मूर्तियाँ ही नहीं बनायेगा तो जादूगर कर ही क्या पायेगा। पर जादूगर दुष्ट था। वह शिवदत्त को कड़ी से कड़ी यातनायें देने लगा। हताश हो शिवदत्त को हथौड़ी और छैनी उठानी ही पड़ी। वह डर-डर कर धीरे-धीरे मूर्तियाँ तराशने लगा। किन्तु जादूगर उसकी चाल समझ गया और उसे चेतावनी दी, "देख, मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश मत कर। धीरे-धीरे मूर्तियाँ बनायेगा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। मैं जानता हूँ कि तू हर रोज़ कम से कम एक मूर्ति तो बना ही सकता है।"

बेचारा शिवदत्त क्या करता। वह रात दिन मूर्तियाँ बनाने लगा। ब्रह्ममुहूर्त पर रोज़ जादूगर थुम्बा आता और देवी-देवताओं की मूर्ति में शैतान की जान भर देता और उन्हें कटघरे से बाहर निकालकर लोगों के बीच में भेज देता। सुन्दर देवी-देवताओं की मूर्ति समझ लोग उन्हें खरीद लेते और मंदिर में स्थापित करते। देखते ही देखते उन शैतानों ने तबाही मचाना शुरू कर दी। लोग तो सुन्दर देवी-देवता के चेहरों को देख पूजने दौड़ पड़ते रहे। बेचारे कैसे जान पाते कि इन देवी-देवताओं की सूरत के अंदर शैतान छिपा था? सब जगह त्राही-त्राही मच उठी।

जब शिवदत्त को इस बात का पता चला तो वह बहुत रोया। उस दिन वह मूर्ति न बना सका। जादूगर ने उस दिन उसे खूब तड़पाया। शिवदत्त विवश था। परन्तु उसने सोचा कि ऐसे सीधेपन से काम नहीं चलेगा। उसे स्वयं कुछ करना चाहिये। खूब सोच विचार कर उसने हथौड़ी और छैनी उठायी और काले पत्थर को तराशना शुरू कर दिया। देखते ही देखते उसने जादूगर की शक्ल की मूर्ति बना दी। वह मूर्ति हूबहू जादूगर थुम्बा के शक्ल की इतनी सजीव थी कि जादूगर भी एक पल के लिये भौंचक्का हो उठा। उसे लगा कि जैसे वह दर्पण के सामने खड़ा अपनी सूरत देख रहा हो। पर दूसरे ही क्षण वह सँभल गया और बोला, "ऐ मूर्ख शिवदत्त, तू ने यह मूर्ति क्यों बनाई। मैं तेरी चालाकी समझ गया। तू सोचता है कि मेरी सूरत का शैतान लोगों के बीच जाएगा तो हमशक्ल जादूगर के साथ सब लोग मेरे भी खून के प्यासे हो जाएँगे। क्यों है ना यही बात?"

शिवदत्त ने उत्तर दिया, "हे महान जादूगर, आप गलत सोच रहे हैं। मेरा मन अब आपको ही देवता मान बैठा है और इसलिये देवता की मूर्ति बनाने वाले मेरे औज़ारों से ख़ुद-ब-ख़ुद आपकी मूर्ति बन जाती है।"

जादूगर थुम्बा इन शब्दों को सुन गद्गद् हो उठा और बोला, "ठीक है पर अब बता कि मैं इस मूर्ति का क्या करूँ ?"

शिवदत्त जैसे इस प्रश्न की ही प्रतीक्षा में था। उसने कहा, "हे जादूगर देवता, आप चाहें तो इसमें अपने ही प्राण फूँक दें। तब इस दुनिया में आपके समान दो जादूगर हो जाएँगे और आपका प्रभुत्व भी दुगना हो जाएगा।"

जादगूर थुम्बा शिवदत्त की बुद्धिमत्ता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने बिना सोचे समझे जादू फूँका और अपने प्राण उस मूर्ति में भर दिये। मानव के प्राण एक समय एक ही जगह रह सकते हैं। ईश्वर या शैतान की तरह उन्हें अनेकों जगह विद्यमान होने का अधिकार नहीं है। इसलिये जैसे ही मूर्ति जादूगर के प्राण पाकर सजीव हो उठी तो जादूगर थुम्बा स्वतः मृतप्राय हो ज़मीन पर गिर पड़ा। और तब -

दूसरे ही क्षण जब वह मूर्ति जादूगर के प्राण धारण किये आगे बढ़ी तो उसका सिर ज़मीन पर गिर गया और धड़ भी काँपता हुआ धराशायी हो गया। शिवदत्त ने बड़ी चतुराई से मूर्ति का सिर अलग से बनाया था और उसे धड़ पर इस तरह जमाकर रखा था कि पास से भी कोई पहचान न पाता कि सिर कटा था और हल्के झटके से वह धड़ से अलग हो कर गिर पड़ेगा।

जादूगर का अंत होते ही उसके जादू का प्रभाव भी जाता रहा और त्राही मचाने वाले शैतान के प्राण देवी-देवताओं की मूर्ति से निकलकर शून्य में चले गये।


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