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ISSN 2292-9754

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07.30.2014


देश-प्रेम

कहानी लद्दाख की है - और उस समय की जब चीनी फौजें भारत की ज़मीन में घुसती चली आ रही थीं।

दीपक की माँ नहीं थी और वह अपने पिता के साथ अकेला रहता था। घर के छोटे-छोटे काम करता और समय निकालकर पढ़ने बैठ जाता था। खेलकूद के समय वह अपने पिताजी के पास बैठकर फौजी क़िस्से सुना करता था। पिताजी स्वयं फौजी सिपाही थे और बहादुरी के क़िस्सों का उनके पास जैसे अपार भंडार था। क़िस्से सुनाते समय वे दीपक से बोलते, "बेटा, जो देश के लिये बलिदान देते हैं वे भगवान के समान होते हैं।"

दीपक के मन में धीरे-धीरे देश प्रेम के बीज अंकुरित होने लगे और वह वीर बालक अभिमन्यु की भूमिका निभाने का सपना देखने लगा।

लेकिन चीनी फौजियों के अचानक हमले ने उसे अपने पिताजी से अलग कर दिया। उसे गाँव में बुआ के पास भेज दिया गया। वहाँ गाँव के लोगों से उसे तरह-तरह की खबरें मिलती रहीं। वह सोचता पिताजी क़िस्मत वाले हैं कि उन्हें देश के लिये कुछ करने का मौका मिला। "काश! मैं भी एक सिपाही होता," उसने मन ही मन सोचा।

तभी एक दिन उसे गाँव वालों से ख़बर मिली कि उसके पिताजी को चीनी फौज ने बंदी बना लिया है। गाँव वाले रोती बुआ को सांत्वना देने आते रहे, दीपक को देखकर उनकी आँखें डबडबा जातीं। दीपक रात देर तक सो नहीं पाया। फिर न जाने क्या सोच, वह घर से निकल पड़ा।

गाँव से बाहर बर्फीले मैदान को पार करता हुआ वह अकेले चलता गया। जैसे जैसे उसके नन्हे कदम बढ़ते जाते उसमें नई ताज़गी बढ़ती जाती। वह गाँव से इतनी दूर आ गया था कि अब आगे बढ़ने के अलावा और कोई चारा नहीं था। उसे क्या मालूम था कि अनजाने में उसके मासूम कदम उसे चीनी तंबू की ओर खींचे ले जा रहे थे।

पर वह तंबू तक नहीं पहुँच सका। चीनी फौजियों ने उसे पकड़ लिया और अंधेरे में रस्सी से बाँधकर रखा। जब उसकी आँखें खुली तो सूरज उग आया था। एक चीनी फौजी ने टूटी-फूटी हिन्दी में कुछ पूछा। दीपक ने कहा कि उसके पिताजी लड़ाई में कैदी बना लिये गये हैं और वह उन्हें ढूँढने निकला था। यह सुनकर चीनी दाँत निपोरकर हँसने लगा। वह चीनी सिपाही उसे बड़े चीनी अफ़सर के पास ले गया। इस अफ़सर के तंबू के सामने लोहे की चेन से बंधे भारत के सिपाही खड़े थे। अफ़सर दीपक की ऊँगली पकड़कर सिपाहियों की कतार के सामने से चलने लगा। दीपक ने दूसरी कतार में खड़े अपने पिताजी को देखा और अफ़सर की ऊँगली छोड़ पिताजी से लिपट गया। चीनी अफ़सर के चेहरे पर यकायक ख़ुशी नाच उठी। वह दीपक को और पिताजी को अलग ले गया। दीपक के पिताजी को घेरकर पाँच चीनी फौजी खड़े हो गये। उनके हाथ में बंदूकें थीं। वे पिताजी से टूटी-फूटी हिन्दी में भारतीय सैनिकों के अड्डे की जानकारी पूछ रहे थे। परन्तु दीपक के पिताजी यातनाओं के बावजूद कुछ नहीं कह रहे थे। वे यातनाओं को सहन करके भी चुप थे। बंदूक के हत्थे की मार से उनके सिर पर लगी चोट से खून बह रहा था।

अब चीनी अफ़सर आगे आया और दीपक के कपड़ों को पेट्रोल से भिगो दिया गया। चीनी अफ़सर ने पिताजी से फिर पूछा, "अब बताओ, नहीं तो तुम्हारा लड़का जला दिया जायेगा।"

पर पिताजी चुप खड़े रहे। एक फौजी ने आगे आकर दीपक के कपड़ों में आग ला दी। चीनी फौजी और अफ़सर जलते दीपक को देखकर ज़ोर-जोर से हँसने लगे। दीपक ने आग की लपटों में से चीनी अफ़सर को देखा और दौड़कर उससे लिपट गया। चीनी अफ़सर चिल्लाया और दीपक की पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगा। परन्तु दीपक जलते हुये अफ़सर से चिपका रहा। उसने सुना कि पिताजी कह रहे थे, "दीपक तुम देश के लिये बलिदान हुये हो, तुम भगवान हो, मैं तुन्हें नमन करता हूँ।"

ऐसे शहीदों के लिये किसी ने ठीक ही कहा है -

शहीदों की चिताओं पर, भरेंगे हर बरस मेले।
वतन पे मरने वालों का, यही नामो निशां होगा।


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