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| 09.18.2007 |
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’वह पिता जी ही थे‘ |
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“दीदी!
क्या आप आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करती हैं”-बड़ी
बड़ी,
भोली आँखों से मेरी ओर देख कर नन्दिता ने प्रश्न किया।
लगभग तीस बत्तीस वर्षीया,
गौरवर्णीया,
सुडौल,
मृदुभाषिनी नन्दिता से मेरी भेंट कुछ वर्ष पूर्व मेरी छोटी बहिन सुषमा के
आवास पर हुई थी। नन्दिता के पति श्री भरत भास्कर आई० आई० एम० में प्रोफेसर
हैं और लखनऊ आई०आई०एम० के कैम्पस में प्रोफेसरों के लिये बने एक आवास में
रहते हैं। आयु में अन्तर होते हुए भी न जाने कैसे हम दोनों के परिवारों में
अन्तरंगता स्थापित हो गई। नन्दिता के अचानक इस प्रकार प्रश्न करने से मैं
चौंक पड़ी और उसका अभिप्राय न समझ पाने के कारण उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि
से निहारने लगी। इसपर नन्दिता कुछ हिचकते हुए,
अटकते स्वर में धीमे से बोली-
“दीदी
मेरे साथ एक अजीबोगरीब घटना घटित हुई है। मैं सच कह रही हूँ,
भास्कर भी बैठे हैं,
पूछ लीजिये।”
मैंने देखा कि भास्कर चुपचाप हम लोगों की बातें सुन रहे थे। वह बोली-
“मेरे
पिताजी की आत्मा मरणोपरान्त मुझसे मिलने आई थी। क्या आप इन बातों पर
विश्वास करती हैं?”-
यह कह कर वह मेरी ओर दृष्टि गड़ाकर देखने लगी।
“हाँ
मैं आत्मा,
पुनर्जन्म आदि विषयों पर विश्वास करती हूँ और इस विषय में क्षोध करके
“अशरीरी
संसार”
नामक एक पुस्तक भी लिखी है।”
मैंने सामने रखी पुस्तक की ओर इंगित करके कहा कि
“जैसे
यह पुस्तक सामने रखी है इस प्रकार से तो मैं यह नहीं कह सकती कि ये बातें
सत्य हैं परन्तु कुछ साक्ष्यों के आधार पर यह निर्विवाद रूप से कह सकती हूँ
कि यदि
’आत्मा‘
और
’पुनर्जन्म‘
सत्य है तो ये घटनायें इसका प्रमाण हैं।”
आश्वस्त होकर नन्दिता व्यग्रता से बोल उठी-”दीदी!
मुझे अब कोई संशय नहीं है कि मेरे पिताजी की आत्मा मुझसे मिलने के लिये आई
थी। आप निःसंकोच होकर मेरे नाम,
पते का उल्लेख करके यह संस्मरण लिख दीजिये ताकि यदि किसी को उत्सुकता हो या
शोध करना चाहे तो मुझसे सम्पर्क कर सकता है। भरत भास्कर की मौन दृष्टि इसका
समर्थन कर रही थी। अभी तक मैं इस घटना का किसी से उल्लेख करने में हिचक रही
थी कि कहीं लोग मेरी खँसी न उड़ायें। किसी और को क्या कहूँ,
मैं स्वयं भी इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी”-
नन्दिता ने गहरी श्वांस लेकर गम्भीर स्वर में कहा।
“अच्छा
अब सम्पूर्ण विवरण याद करके सही सही बताना।”-
यह कह कर मैं लेखनी लेकर घटना के विवरण अंकित करने लगी।
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१५/१६ फरवरी २००१ की रात्रि के डेढ़ बजे अचानक टेलीफोन की घन्टी घनघना उठी-“हैलो
नन्दिता दीदी! मैं अमित बोल रहा हूँ। आपके पिताजी को श्वांस लेने में
दिक्कत हो रही थी,
बड़े भैया उन्हें कार्डियोलोजी में ले गये हैं और आपको सूचना देने को कहा
है। शाम से ही पिताजी आपको बहुत याद कर रहे थे।” “क्या”, कुछ क्षणों को मौन, स्तब्ध हो नन्दिता वहीं पर थरथरा कर बैठ गई।
उस शाम से ही एक कुत्ता उनके घर के समीप आकर न जाने कितनी बार रोया था-
जिसे सुनकर उसका दिल दहल सा जाता था। अनजानी आशंका से अधीर सी वह अभी तक
सोई नहीं थी। इतने में फिर
’हू-उ-ऊ
-हू-ऊ-ऊ-ऊ-ओं
ओं ओं------‘
कुत्ते के रोने की ध्वनि वातावरण में गूँज उठी। चौकीदार बार बार आकर कुत्ते
को खदेड़ता था पर वह थोड़ी देर के बाद ही फिर उसके घर के आस पास आकर रोने
लगता था। नन्दिता का हृदय भावी की आशंका से काँप उठा। आज प्रातः से ही वह
बहुत अन्यमनस्क थी और न जाने क्यों पिताजी की याद बहुत सता रही थी। बिन माँ
की बेटी नन्दिता को मन ही मन यह दुख त्रस्त कर रहा था कि उसके पिताजी उसे
चारों बड़े भाइयों की अपेक्षा कम स्नेह करते हैं। सुबह से उसे पिताजी की
इतनी याद आ रही थी कि उसने कई बार फोन मिलाने के लिये रिसीवर उठाया परन्तु
मान में फोन नहीं मिलाया। इस सूचना से तो जैसे उसपर वज्रपात हो गया। बड़ी
कठिनाई से उठकर वह अपने शयनकक्ष में आई। फोन की घन्टी सुन कर भास्कर भी जाग
गये थे। उनकी दृष्टि पत्नी के मुख पर गई तो समझ गये कि कोई अशुभ समाचार है।
“पिताजी
को कार्डियोलोजी में ले गये हैं”-
बड़ी कठिनाई से नन्दिता के मुख से स्वर प्रस्फुटित हुए।
“हम
प्रातः ६ बजे यहाँ से कानपुर चले चलेंगे”
-कह
कर भास्कर ने नन्दिता को सान्त्वना देने का प्रयास किया। प्रातःकाल जब वे
दोनों कानपुर पहुँचे तो पिताजी के दिवंगत होने का समाचार ज्ञात हुआ।
नन्दिता रोती जाती थी और अपने दिवंगत पिताजी से मन ही मन शिकायत करती जाती
थी कि “आप
मुझे प्यार नहीं करते थे इसीलिये मुझसे मिल कर नहीं गये। फोन से भी बात
नहीं की।”
उसकी अन्तरात्मा उसे कचोट रही थी कि वह अन्तिम बार पिताजी से मिलना तो दूर,
उनसे फोन से भी बात न कर सकी। काश उसने स्वयं ही फोन मिला लिया होता।
नन्दिता के पिता श्री रामशंकर शुक्ल कानपुर के लब्ध प्रतिष्ठ व्यक्ति थे।
वह कई वर्षों तक आर्मापुर और्डिनेन्स फैक्टरी इन्टर कालेज के प्रिन्सिपल
रहे थे। सेवानिवृत होने पर पं० दीनदयाल उपाध्याय कालेज में कुछ वर्ष
प्रिन्सिपल रहे। वह आर० एस० एस० के जिला संचालक भी थे। नन्दिता की माता की
बचपन मे ही मृत्यु हो गई थी। नन्दिता से बडे चार भाई हैं। उसके मन में
बचपन से ही यह ग्रन्थि पड़ गई थी कि पिताजी उसकी अपेक्षा उसके बड़े भाइयों और
भाभियों को अधिक प्यार करते हैं। इसी कारण विवाह के उपरान्त पति के साथ
अमेरिका प्रवास में उसे कोई कष्ट नहीं हुआ। नन्दिता का मातृविहीन,
संवेदनशील हृदय पिता से अतिरिक्त स्नेह की आकांक्षा रखता था परन्तु उसके
पिताजी अपनी भावनायें व्यक्त नहीं कर पाते थे।
कानपुर से लौटकर नन्दिता अपने दुख पर नियन्त्रण नहीं कर सकी। पिता की
मृत्यु के दुख के साथ ही यह पीड़ा भी उसके हृदय को तड़पा रही थी कि अन्तिम
समय वह उससे बिना मिले चले गये। मानसिक पीड़ा से विक्षिप्त सी होकर वह बार
बार सिसक उठती थी। शाम हो गई थी अतः वह रात्रि के भोजन की व्यवस्था करने के
लिये रसोईगृह में पहुँची। बैठक कक्ष के समीप ही रसेाईगृह है और वहाँ से
स्पष्ट दिखाई देता है। अचानक उसे ऐसा आभास हुआ कि बैठक कक्ष में एक दीवार
के किनारे किनारे होकर दूसरी दीवार के कोने तक कोई वस्तु चलकर आती है और
लौट जाती है। नन्दिता का उस ओर कई बार ध्यान आकर्षित हुआ। उसे वहाँ पर कोई
वस्तु नहीं दिखाई देती थी केवल गतिशीलता का आभास होता था। उसने सोचा कि
शायद चुहिया घर में आ गई है। इसी समय नन्दिता की एक परिचिता श्रीमती कुमुद
सिंह,
जो प्रो० शैलेन्द्र सिंह की पत्नी हैं और स्वयं भी बाराबंकी में
एग्रिकल्चरल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं,
उनसे मिलने एवं सम्वेदना प्रकट करने के लिये आ गईं। दोनों लोग बैठक में
बैठकर बातें करने लगीं। बात करते करते नन्दिता रोने लगी तो कुमुद सिंह
उन्हें सान्त्वना देने लगीं। बात करते समय कुमुद सिंह की दृष्टि बार बार
नन्दिता से हटकर,
उसके सिर के पीछे,
दाहिनी ओर अटक जाती थी।
नन्दिता ने अचकचा कर प्रश्न किया-
“भाभी
जी! आप बार बार उधर क्या देखने लगती हैं,
कुछ है क्या।”
“तुम्हारे
पीछे कुछ है”-
नन्दिता की ओर असमंजसभरी दृष्टि से देखते हुए कुमुद सिंह ने कहा।
“हाँ
शाम से ही मैं भी कुछ देख रही हूँ। लगता है चुहिया घर में घुस आई है।”-नन्दिता
के उत्तर पर कुमुद सिंह कुछ देर उसे गौर से देखती रहीं,
पुनः कुछ दुविधा की स्थिति में धीम से उन्होंने उत्तर दिया-
“हो
सकता है चुहिया ही हो।”
नन्दिता को उनकी भावभंगिमा कुछ अटपटी सी लगी,
पर उस समय उसका इस पर अधिक ध्यान नहीं गया। कुछ देर के बाद कुमुद सिंह अपने
घर चली गईं।
१८ फरवरी की रात में ही नन्दिता के भाई का फोन आया-
“आर०
एस० एस० के लोगों ने पिताजी का शान्ति पाठ कल प्रातः साढ़े सात आठ बजे रक्खा
है। तुम्हें आना है। हाँ,
पिताजी की जो सुन्दर सी फोटो तुम्हारे पास है,
उसे साथ लेती आना। उसकी कई प्रतिलिपि करा ली जायेंगी।”
भरत भास्कर को २० तारीख़ को दिल्ली में सेमिनार में जाना था और इसके लिये वह
आवश्यक तैयारी में जुटे थे। वह कानपुर जाने में असमर्थ थे। उन्होंने
नन्दिता को प्रातः साढ़े पाँच बजे कानपुर ले जाने के लिये ड्राइवर की
व्यवस्था कर दी।
प्रातः पाँच
बजे नन्दिता तैयार होकर अपने दुमंजले मकान के नीचे के तल में आई जहाँ पर
बैठक है। वहाँ आकर वह पिताजी की फोटो खोजने लगी। फोटो अल्मारी में ही थी
परन्तु भास्कर ने अपनी चीजें खोजते समय न जाने कहाँ रख दी थी। भली भाँति
खोजने पर भी जब पिताजी की फोट नहीं मिली तो दुखी होकर उसने अल्मारी के
ऊपरी भाग का शीशे का दरवाजा बन्द कर दिया। वह नीचे बैठ गई और नीचे की
अल्मारी,
जहाँ एलबम रखी थीं,
का दरवाजा खेालते हुए हताशा में सिर पर हाथ रख कर सोचने लगी कि
“इतनी
ढेर सारी एलबमों में पिताजी की फोटो खोजूँगी तो देर हो जायेगी,
क्या करूँ”,
कि इतने में ऊपर शीशे की अल्मारी में रक्खे काँच के दो शो पीसेज ज़ोर ज़ोर से
हिलने लगे। शो पीसेज गिर कर टूट न जायें,
यह सोच कर वह शीघ्रता से उठी और शीशे की अल्मारी का दरवाजा खोला और हाथ
बढ़ाया कि हिलते हुए शो पीस को रोक दें कि तब तक अचानक बिना छुए ही शो पीसेज
का हिलना बन्द हो गया। उनमें एक हल्का था और एक भारी। नन्दिता ने देखा कि
हल्का वाला शो पीस अपनी जगह से तिरछा खिसक गया है और पीछे से पिताजी की
फोटो दिखाई दे रही है। फोटो उठाकर जैसे ही उसने अल्मारी का दरवाजा बन्द
किया कि उसके दिमाग में खटका हुआ-
“बिना
हवा के अल्मारी के अन्दर शो पीसेज कैसे हिले।”
इतने में उसके मस्तिष्क में जैसे विचार आया-
“ऐ
लड़की। मैं दो दिन से तेरे आस पास घूम रहा हूँ और तू मुझे पहचान ही नहीं रही
है।”
नन्दिता चौंक पड़ी- पिताजी उसे ’ऐ लड़की‘
कह कर ही सम्बोधित करते थे। उसका शरीर रोमांचित हो उठा और वह भाव विह्वल
होकर दौड़ते हुए शयन कक्ष में पति के समीप पहुँची,
उनका हाथ खींचकर उठाते हुए बोली-
“भास्कर!
भास्कर! उठिये। देखिये पिताजी आये हैं।”
भास्कर को ऐसा प्रतीत हुआ कि नन्दिता भावावेश में भावुक होकर ऐसा व्यवहार
कर रही है,
अतः पुचकार कर बोले-
“हाँ,
हाँ,
जरा मेरे पास बैठो,
शान्त रह।”
नन्दिता ने उत्तेजित स्वर में भास्कर को पूरी बात बताई और उनका हाथ खींचते
हुए उन्हें बैठक में ले आई।
“प्लीज
आप देखिये न,
आप साइन्स के विद्यार्थी रहे हैं,
आप ही सोचिये कि क्या अल्मारी के अन्दर अपने आप शो पीसेज हिल सकते हैं। न
वहाँ अन्दर हवा है न कोई धक्का लगा तो शो पीसेज अपने आप कैसे हिलने लगे।”
भरत भास्कर को भी समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। अल्मारी में और शो
पीसेज भी थे परन्तु केवल वे शो पीसेज ही हिले जिनके पीछे पिताजी की फोटो
छिप गई थी। आश्चर्यचकित भास्कर भी थे परन्तु उन्होंने नन्दिता के सामने
प्रदर्शित नहीं किया और नन्दिता को आश्वस्त करने के लिये बात पलट दी। उस
समय तो नहीं परन्तु बाद में भरत भास्कर ने नन्दिता से छिपाकर कई बार
परीक्षण किया कि अल्मारी में अपने आप शो पीसेज हिल सकते हैं कि नहीं,
पर उसका कोई हल नहीं निकला। नन्दिता कानपुर गई तो उसने इस घटना का किसी से
ज़िक्र नहीं किया। उसने सोचा कि लोग परिहास करेंगे।
अगले दिन २१ फरवरी को,
कानपुर से लौटने के पश्चात् नन्दिता ने श्रीमती कुमुद सिंह को शाम को अपने
साथ चाय पीने के लिये आमन्त्रित किया। उनके आने पर उसने कुमुद से प्रश्न
किया- “भाभी
जी! सच बताइये उस दिन आपने मेरे पीछे क्या देखा था।”
पहले तो कुमुद सिंह कुछ बताने में आनाकानी करती रहीं। जब नन्दिता ने आपबीती
फोटो वाली घटना सुना कर प्रश्न किया तो उन्होंने उत्तर दिया-
“मैं
तो तुमसे कह रही थी कि तुम्हारे पीछे कुछ है,
पर जब तुमने कहा कि चुहिया होगी तो मैंने चुप रहना ठीक समझा और कुछ बताया
नहीं।”
“भाभी
जी! उस शाम को मैंने कई बार दीवार के एक कोने से दूसरे कोने तक जाती हुई
कोई गतिशील चीज देखी थी,
परन्तु कोई आकृति नहीं दिखाई दे रही थी,
अतः मैं समझी थी कि चुहिया होगी। कृपया अब आप मुझे बताइये कि आपने मेरे
पीछे क्या देखा था”
-नन्दिता
ने उत्सुकता से प्रश्न किया।
“तुम
जब बैठी थीं तो मुझे तुम्हारे सिर के पीछे दाहिनी ओर ऐसा आभास होता था जैसे
भाप जैसी कोई चीज उपस्थित है,
जो इधर उधर घूमती थी। कोई आकृति या छाया नहीं दिखाई देती थी। वह मुझे वहाँ
पर कई बार दिखाई दी थी”
-श्रीमती
सिंह ने उत्तर दिया।
नन्दिता अपनी बात बताकर भावातिरेक से रोने लगी और बोली-
“मेरे
पिताजी मरणोपरान्त मुझसे मिलने आये थे। निश्चय ही वह मेरी इस धारणा को
निर्मूल सिद्ध करने आये थे कि वह मुझे भाइयों से कम प्यार करते हैं।”
नन्दिता की भीगी पलकें और भरत भास्कर का मौन घटना की सत्यता का साक्षी था।
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