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03.23.2014


मेरे साथ कोई खेल जो नहीं रहा था

दीपावली के पूर्व घटी, बचपन की घटना यदा-कदा स्मृतियों के झरोखे से झाँककर, मुझे रोमांचित करके अपनी चंचल अनुजा की शरारत पर खिलखिलाने को बाध्य करती है।

उस समय मेरे पापा स्व. राधे श्याम शर्मा वाराणसी के सी.ओ. सिटी थे और कोतवाली के ऊपर बने आवास में सपरिवार रहते थे। बैरकनुमा बने आवास के सामने लम्बा, सँकरा बरामदा और समानान्तर लम्बा आँगन दीवार से तीन भागों में विभक्त था। बीच के आँगन मे एक प्रवेश द्वार था और सामने एक छोटा चबूतरा था। अवैध पकड़ी गई आतिशबाज़ी सुरक्षा की दृष्टि से आँगन के चबूतरे पर रख दी गई थी।

दोपहर का समय था। पापा सरकारी कार्यवश बाहर गये थे और मम्मी मेरे छोटे भाई - एक वर्षीय राजीव को सुलाने मे व्यस्त थीं। बीच के बरामदे मे छः वर्षीया मैं एक चारपाई पर बैठकर अपने स्कूल का गृहकार्य करने मे व्यस्त थी। मेरी चार वर्षीया अनुजा सुषमा मुझसे बार-बार खेलने का आग्रह कर रही थी जिसे मैंने उस समय मना कर दिया था। वह चुपचाप वहाँ से चली गई और मेरा ध्यान भी उससे हट गया। अचानक कुछ समय के पश्चात एक बम की आवाज़ से मैं चौंक पड़ी। इतने में सर्र-सर्र करता एक अनार चलने लगा और उसकी चिंगारी दूर तक छिटक कर एक राकेट मे लग गई और राकेट जलकर ’धाँय’ बोलते हुए मेरे ऊपर की छत से टकराया। अचानक इस हमले से घबराकर मैं उस छोटे से बरामदे मे बचने के लिये चारपाई खड़ी करके उसके पीछे दुबक कर बैठ गई। बान की झिरी से झाँक कर देखा तो मेरे होश उड़ गये। चबूतरे पर रखे बड़े से टोकरे की आतिशबाज़ी एक-एक कर आग पकड़ रही थी। कभी राकेट छत से टकरा कर ऊपर से उल्कापात सा करते तो कभी बमों के भीषण कर्णभेदी स्वर हृदय दहला जाते। कभी बिच्छू, चर्खी टोकरे से कूद-कूद कर ’छर्र-छूं’ की ध्वनि करते चारपाई के समीप तक आ जाते। मैं दम साधे बम, अनार, फ़ुलझड़ियाँ, बिच्छू, चर्खी आदि सभी पटाकों को चलते देख रही थी, वहाँ से अन्दर जाने का कोई उपाय न था। ’सूं’, ’छर्र’, ’धांय’, ’धड़ाक’ के साथ आँगन व आकाश मे आतिशबाज़ी की चिंगारी, शोर और धुआँ छा गया था। धड़ाधड़ बम और राकेट फ़ट रहे थे जैसे कारगिल का युद्धक्षेत्र हो। कोतवाली के कर्मचारी समझे बदमाशों ने हमला बोल दिया है। ऊपर आकर जब नज़ारा देखा तो वे भी किंकर्तव्यविमूढ़ रह गये। द्वार अन्दर से बन्द था। नल बन्द थे और पानी की एक बाल्टी भी भरी नहीं थी। बाहर जो पानी था वह इतने बड़े आतिशबाज़ी के अग्निकांड के शमन के लिये अपर्याप्त था। मैं सहमी, दुबकी चारपाई के पीछे बैठी रही और आधे घंटे से अधिक समय तक इस ताण्डव चक्र की त्रासदी को झेलती रही। आतिशबाज़ी के रौद्र रूप के शान्त होने पर मेरी दृष्टि अन्दर के दूसरे आँगन में चिमटा पकड़े सुषमा पर पड़ी जो इस घटना से मूर्तिवत स्तब्ध खड़ी रह गई थी। मम्मी मेरी सुरक्षा के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं। उन्होंने दौड़कर चारपाई हटाकर मुझे सुरक्षित देखकर अंक में भर लिया। सुषमा की सहमी मुखाकृति पर मुझे सकुशल देख कर आता उल्लास सहसा थम गया जब मम्मी ने उसकी ओर उन्मुख होकर, आँखें तरेर कर डपटा- "यहाँ आग कैसे लगी?" उस समय उसकी भोली मुद्रा दर्शनीय थी। बड़े भोलेपन से उसने उत्तर दिया- "मैंने चिमटे से कोला टोकली में डाल दिया।" ("मैंने चिमटे से कोयला टोकरी मे डाल दिया।") मम्मी ने उसके गाल पर एक ज़ोर का थप्पड़ मारा और दुबारा मारने को हाथ उठाया एवं डाँटते हुए पूछा- "तुमने ऐसा क्यों किया?"

फूले- फूले गालों को और फुलाकर, आँखो मे आँसू भरे हुए, अपनी भूल से सहमी हुई सुषमा ने जब अत्यन्त भोलेपन से उत्तर दिया- "मेले साथ कुई खेल जो नहीं रहा था" ("मेरे साथ कोई खेल जो नहीं रहा था"); तो मम्मी का हाथ वहीं पर रुक गया और मेरा सारा रोष काफ़ूर हो गया। अब भी जब दीवाली आती है तो मुझे बचपन की यह घटना गुदगुदा जाती है।


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