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ISSN 2292-9754

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11.04.2014


एक गाँव लाविनी
समीक्षक- राम चंद्र शुक्ल

समीक्ष्य पुस्तक : स्विट्ज़रलैंड के वे 21 दिन
लेखिका- नीरजा द्विवेदी
प्रकाशक- डॉ.. गिरिराजशरण अग्रवाल
हिंदी साहित्य निकेतन, 16, साहित्य विहार, बिजनौर
मूल्य- रु. 200/- मात्र

नीरजा द्विवेदी द्वारा विरचित स्विटज़रलैंड के वे इक्कीस दिन, लौकिक जीवन की अलौकिक कथाओं का सार संग्रह है। इसमें यात्रा का विवरणात्मक वृत्तांत है, प्राकृतिक सौंदर्य और सुषमा का सम्मोहक आकर्षण है, परस्पर प्रेम और सौहार्द का अद्भुत सम्मिश्रण है। यह कथा नहीं कई कथाओं का सीवन है। प्रत्येक सीवन में नवीन अंकुरण की असीम क्षमता है। दुर्लभ संयोग की सुखद परिणिति भी इसमें है। चमत्कार, संस्कार और सत्कार का देशी विदेशी विचार है तो नारी मन की उत्कंठा, जिज्ञासा एवं संकोच का परिपाक भी है। पुस्तक पठनीय तो है ही संस्मरणात्मक दृष्टि से संग्रहणीय भी है।

लाविनी स्विटज़रलैण्ड का एक छोटा सा गाँव है। प्राकृतिक सुषमा से भरपूर। पहाड़ी, झील, झरनों के बीच एक महल है शातो। शातो किसी समय के प्रख्यात साहित्यकार और स्वनामधन्य प्रकाशक स्वर्गीय लेडिंग का निवास हुआ करता था जिसमें वह अपनी द्वितीय पत्नी जेन के साथ रहा करते थे। अब दोनों दिवंगत हैं। जेन ने अपने स्वर्गीय पति लेडिंग की इच्छा और उनकी स्मृति को सदैव के लिये जाग्रत रखने की दृष्टि से लाविनी के इस शातो को एक व्यवस्था के अंदर डाल दिया कि साहित्यकारों की एक समिति विश्व के प्रख्यात साहित्यकारों को आमंत्रित कर इक्कीस दिन इस महल में उनके व्यय रहित रहने की व्यवस्था करे। श्री महेशचंद्र द्विवेदी और श्रीमती नीरजा द्विवेदी दम्पति को चौबीस अगस्त दो हज़ार दश से तीन सप्ताह के लिये यह सुखद अवसर प्राप्त हुआ है जिसका यात्रा वृत्तांत स्विटज़रलैण्ड के वे इक्कीस दिन में है।

द्विवेदी दम्पति मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, किंतु भाग्य के भरोसे नहीं हैं। कर्मठता उनकी उपलब्धि है। श्रम उनकी पूंजी है। जिज्ञासा उनका स्वभाव है। अवसर मिलना एक संयोग हो सकता है। अवसर का उपयोग करना और उसको चिरस्मरणीय बना देना एक कला है। पुस्तक में कला का दिग्दर्शन सर्वत्र विद्यमान है। यह विद्यमानता दो रूपों में है। प्रकृति का सौंदर्य कृति में इस प्रकार उकेरा गया है जैसे शब्द उन्हें भाषा दे रहे हों और उस भाषा को पढ़ने के लिये विश्व साहित्यकार समवेत हुए हैं। कृति के दूसरे खंड में एकत्रित साहित्यकारों का परिचयात्मक चित्रण है। यह कृति को मूल्य प्रदान करता है। उसको उपयोगी बनाता है।

पुस्तक में सीख और शिक्षा का सार्थक संकेत है। भारत विविधतापूर्ण सांस्कृतिक संपदा के लिये जाना जाता है। दुख-दैन्य मालिन्य के कारण हताश है। स्थान-स्थान पर लेखिका इस प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करती है। अपार सम्पत्ति की लालसा भारतीय जन-मानस में ईर्ष्या-द्वेष का आधार है। प्रकाशक लेडिंग और उनकी पत्नी जेन के बहाने लेखिका ने त्याग और बलिदान की महत्ता समझाने का प्रयास किया है और यह बताया है कि धन अर्जन करने से महत्त्वपूर्ण है उसके उपयोग करने की नियति में क्या है।

बोली-भाषा-अभिव्यक्ति की समस्या विश्व भ्रमण में आना स्वाभाविक है किंतु मानवीय सम्वेदना सर्वत्र समान है। सहायक मिल जाते हैं। बाधा दूर हो जाती है। आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति की जिसकी ललक में सभी काम सहज हो जाते हैं। शारीरिक बंधन समाज को बाँधते हैं। अशरीरी आत्मा एकात्म तत्व की उसी भावना को परिपुष्ट करती है। लेडिंग और जेन की आत्मा ने अपने उपयोग की वस्तुओं में लेखिका को विविध अवसरों पर इस प्रकार की अनुभूति दिया है जिसे आज का भौतिकवादी युग स्वीकार करे या न करे किंतु स्पष्ट है कोई चीज़ पूर्ण नष्ट नहीं होती। आकार प्रकार बदलती है। वही तो आत्मा है जो न आकार बदलती है न प्रकार।

रोचक लेखन के लिये कोटिशः बधाई!

रामचंद्र शुक्ल, पूर्व जज,
अवंतिका, (निकट हाथी पार्क)
रायबरेली- 229001 (मो.—9236035306)


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