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| 09.03.2007 |
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लास वेगस - एक जादुई नगरी |
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शाम के सात बजे हैं। कालामजू,
मिशिगन में अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है। कमला एवं गोपाल सिंह के ड्राइंगरुम
में बैठकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम नैनीताल में रुके हों। काँच के खिड़की
और दरवाजों से दृष्टिगत होती आवास के पीछे स्थित झील की सुन्दरता अवर्णनीय
है। झील में त्वरित गति से उछलती,
गतिमान जलधारा नवोढ़ा सुन्दरी की भाँति पद-निक्षेप करती प्रवाहित हो रही है।
दूर पर तैरते हंसों की धवल पंक्तियाँ इस झील में मानसरोवर की कल्पना को
साकार करती प्रतीत हो रही हैं। तट पर स्थित वृक्षों ने अपने जीर्ण-क्षीर्ण
पल्लवों को गिराकर जैसे नवीन हरित वस्त्र धारण कर लिये हैं। झील से सटी
छोटी सी पहाड़ी है जिसपर मैपल,
ओक,
ऐश,
पाइन,
ओकरी,
ब्रैडफर्ड पियर आदि के वृक्ष उस तट को सधन वन का रूप प्रदान कर रहे हैं।
“अरे
देखो वह पानी में क्या तैर रहा है ! - भूरे रंग का
- यह मगर है क्या”-
मेरे पति ने एक काष्ठवत् जीव की ओर इंगित किया। हम लोग ध्यान से उधर देख
रहे थे कि अचानक किनारे पहुँचकर वह जीव पानी से निकलकर बाहर आया -”यह
तो हिरन है”-
उसे देखकर हम लोगों का मन प्रसन्नता से भर गया। ध्यान से देखा तो एक हिरनों
का झुन्ड सामने पहाड़ी पर खड़ा अपने साथी की प्रतीक्षा कर रहा था। दूर एक
युवा अमेरिकन युगल अपनी बोट में नौका-विहार का आनन्द लेते दृष्टिगोचर हुआ।
इघर किनारे पर गोपालसिंह अपनी स्पीडबोट की देखभाल कर रहे थे। कमला रात्रि
के भोजन की तैयारी कर रही थीं।
अब हम दोनों काँच का स्लाइडिंग डोर खिसकाकर बाहर टेरेस पर आ गए हैं। कितना
सुन्दर दृश्य है यहाँ का। स्वच्छ नीला आकाश और उसकी परछाईं से नीलाभ झील का
जल। घर के पीछे लान की हरी-हरी चमकीली घास और सामने झील के किनारे मैपल का
एक वृक्ष और उसके नीचे खड़ी स्पीड बोट एवं पौन्टून बोट। दाहिनी ओर के वीपिंग
विलो के वृक्ष अब काफी घने हो गये हैं। पवन की गति के साथ उनकी लम्बी-लम्बी
पत्तियाँ तीव्रता से इधर-उधर लहराती डोल रही हैं जैसे प्रसन्नता के आवेग
में आलिंगनबद्ध करने का आमन्त्रण दे रही हों। हमारे ठीक सामने एक हंसों का
जोड़ा तैरते हुए आ गया है। वे अपनी लम्बी पतली ग्रीवा को जल में डालकर
छोटी-छोटी मछलियाँ पकड़ रहे हैं। अपनी क्षुधापूर्ति के पश्चात् वे एक दूसरे
के समीप आते है और चोंचें मिलाकर परस्पर स्नेह का प्रदर्शन करते हैं।
अब सूर्यास्त होने वाला है। पहाड़ी पर वृक्षों के पीछे का समस्त भाग नारंगी
हो गया है। आकाश में लालिमा है और जल में उसका प्रतिबिम्ब अत्यन्त सुन्दर
है। काश मैं चित्रकार होती और इस प्राकृतिक सौन्दर्य को चित्रित कर साकार
कर पाती। “भाईसाहब,
भाभी जी! आप लोगों के लिये सरप्राइज
रक्खा है- हम आपको घुमाने ले जायेंगे। जल्दी-जल्दी जेटलैग की थकान
मिटा लीजिये”
- -कमला
ने हमसे कहा। “कब
धूमने चलेंगे”
-
मेरे
पति ने प्रश्न किया। “७
ता० को चलना है,
१२ ता० को लौटेंगे”
-
गोपाल सिंह ने उत्तर दिया। “कहाँ
जायेंगे”
-
मैने
पूछा। “यह
बता दिया तो सरप्राइज कैसे रहेगा”
- कमला
ने हँसते हुए उत्तर दिया। बस यह बता देती ह कि बहुत सुन्दर जगह है। अभी हम
भी नहीं गये हैं।” “अच्छा
तब तो बड़ा आनन्द आयेगा”
-
हम दोनों पति - पत्नी एक साथ बोल पड़े।
७ ता० को प्रातः गोपाल सिंह ने बताया –
“आज
शाम को ४ बजे कार से चलना है। आज रात्रि के १० बजे हमें डिट्रायट से फ्लाइट
लेनी है।” “हम
कहाँ चल रहे हैं?”
- मैने
प्रश्न किया। “लास-वेगस”
-
कमला ने उत्तर दिया –
“दीप्ति-बृज
भार्गव,
सरोज-महेन्द्र अमीन भी हमारे साथ चल रहे हैं।“
’लास-वेगस‘
का नाम सुनकर मेरे हृदय में घूमने जाने का उत्साह तो था परन्तु मैं मन ही
मन आतंकित भी थी। कुछ वर्ष पूर्व
मैंने टी० वी० पर लास-वेगस का एक अश्लील प्रोग्राम देखा था। उसकी
स्मृति से अभी भी मेरे रोम रोम घृणा से गिजगिजा उठते हैं। मुझे यह भी ज्ञात
था कि लास-वेगस अमीरों की ऐशगाह है। खाली जेब लेकर सबके साथ घूमने जाने का
क्या औचित्य है
-मेरे
मन में एक हिचकिचाहट यह भी थी।
शाम को ४ बजे हम सब लोगों ने महेन्द्र अमीन की वैन से डिट्रायट के लिये
प्रस्थान किया। अपने अतीत की बात में महेन्द्र ने बताया कि उनकी सरोज से
पहली मुलाकात बड़ौदा में हुई थी और उनकी बुआ ने दूसरे दिन ही फटाकड़ी को
सिनेमा ले जाने को कह दिया था। फटाकड़ी का अर्थ पूछने पर पता चला कि गुजराती
में सुन्दर लड़की को फटाकड़ी कहते हैं। फिर क्या था हर बात में फटाकड़ी या
फटाकड़ा कहते हुए और एक दूसरे को छेड़ते हुए ४ घंटे का डिट्रायट का रास्ता
हँसी-मजाक में कट गया। गोपाल सिंह ने रास्ते में बताया कि हमें डील अच्छी
मिल गई है। मिशिगन से लास वेगस का रिटर्न टिकिट एवं ४ दिन होटल में रहने की
व्यवस्था के लिये प्रति व्यक्ति ३४५ डालर ही देना होगा। एयरपोर्ट पर
सिक्योरिटी चेक के उपरान्त हम लोग लाउन्ज में बैठकर प्रतीक्षा करने लगे।
रात्रि के साढ़े आठ बजे फ्लाइट न० ०९९ की घोषणा हुई तो सब लोग चलकर प्लेन
में बैठ गये, गोपाल सिंह ने बताया कि मिशिगन स्टेट से नेवादा स्टेट जहाँ
लास वेगस है,
का समय ३ घन्टे पीछे है और हम लोग वहाँ के ११ बजे रात
पहुँचेंगे।
पूरा प्लेन खचाखच भरा था। जब प्लेन ने उडान भर ली,
तब एयरहोस्टेस ने दो पैकिट प्रिटजेल एवं एक गिलास जिंजरएल
लाकर हमलोगों को दिया। सोने का समय हो गया था अतः उसने ब्लाइन्ड बन्द कर दी
और लाइट धीमी कर दी। मुझे तो नींद नहीं आ रही थी। दो एक बार ब्लाइन्ड हटाकर
देखना चाहा तो सिवाय अन्धकार के कुछ नहीं दिखाई दिया तो मुझे विवश होकर
सोना पड़ा। साढ़े चार घन्टे की फ्लाइट थी। लास वेगास आने के कुछ समय पूर्व हम
जग गये। ब्लाइन्ड हटाकर नीचे देखा तो देखते ही रह गये- चारों ओर प्रकाश ही
प्रकाश। रोशनी की जगमगाहट ऐसी थी जैसे हीरा, पन्ना,
रूबी, नीलम आदि जवाहरात बिखेर दिये
गये हों। जैसे-जैसे प्लेन नीचे उतर रहा था, वहाँ के
भवन स्पष्ट से स्पष्टतर दिखाई दे रहे थे। प्रकाश के साथ भवनों की कलात्मकता,
भव्यता एवं सुन्दरता देखकर एक क्षण को ऐसा लगा जैसे या तो
यह स्वर्ग है या हम किसी जादुई नगरी में आ गये हैं। ऊपर से नारंगी,
लाल, बैगनी रंग की मीनारों से
सुसज्जित एक बिल्डिंग को देखकर मेरे पति बोल पड़े –
“यह
तो अल्लादीन का महल है जो जिन्न ने बनाया है।”
एयरपोर्ट पर प्लेन से उतरकर हमलोग बाहर निकले। वहाँ गोपालसिंह एवं ब्रिज
भार्गव ने एक वैन १६० डालर किराये पर ली,
पेट्रोल अपना डालना था। सब लोगों ने वैन में बैठकर होटल के
लिये प्रस्थान किया। नई जगह थी अतः होटल खोजने में समय लगा परन्तु इसी
बहाने से सारे शहर का भ्रमण कर लिया। बलाजियो,
मान्डले बे, ट्रेजर आइलैन्ड,
सीजर्स पैलेस, वेनेशियन,
एम.जी.एम. ग्रैन्ड, स्फ़िंक्स,
न्यूयार्क-न्यूयार्क, गोल्ड
स्ट्राइक, द मिराज, लक्सर,
सर्कस-सर्कस, मौन्टेकॉर्लो आदि
सुन्दरता में सभी कसीनों एक से बढ़कर एक थे। किसी के सामने बड़े से शेर की
मूर्ति थी तो कहीं स्फ़िंक्स की, कहीं रंगीन मीनारें
लाल, नीली, बैगनी,
पीली जगमग कर रही थीं तो कहीं डाइनोसोर की मूर्ति लगी थी।
कहीं स्टेच्यू आफं लिबर्टी की मूर्ति थी तो कहीं सीजर की जगह-जगह बड़े-बड़े
पोस्टर्स लगे थे जिनपर नाइटशोज की झलक दिखाई दे रही थी। प्रत्येक भवन की
रंग-बिरंगी रोशनियों की जगमगाहट एवं सुन्दरता एक दूसरे से प्रतिस्पर्धारत
थी।
“यह
कहना कठिन है कि कौन सा कसीनो बाहर से अधिक सुन्दर लगता है”-
मैं बोल पड़ी।
सरोज ने उत्तर दिया -
”भाभी
! अभी आपने क्या देखा है;
कसीनों के अन्दर की सुन्दरता देखकर तो आप भैांचक्की रह
जायेंगीं।”
सरोज और महेन्द्र अमीन यहाँ इससे पूर्व कई बार आ चुके थे।
दीप्ति ने कहा -”यहाँ
के शोज तो कमाल के होते हैं और क्या कमाल के स्टेज बनाते हैं।”
दीप्ति और बृज भी पहले एक बार लास वेगस आ चुके थे।
कमला बोलीं – “भई
मैं तो यहाँ पहली बार आई हूँ। मैने केवल सुन रक्खा है। गोपाल सिंह
जरुर एक बार आफिशियल मीटिंग में आये थे।”
इस पर गोपालसिंह ने कहा
”आफशियल
मीटिंग में मैं एक बार यहाँ आया था परन्तु मीटिंग समाप्त होते ही तुरन्त
वापस चला गया था, अतः मैने भी यहाँ कुछ नहीं देखा है।”
मेरे पति ने कहा – “मैंने
अटलान्टिक सिटी देखा है,
परन्तु वह तो लास-वेगस के आगे कुछ भी नहीं है। यहाँ तो
एक-एक कसीनो फर्लांगों लम्बे दायरे में बने दिखाई देते हैं।”
इतने में हमलोग रंगीन मीनारों वाले होटल के सामने पहुँचे जिसपर एक्सकैलिबर
लिखा था। बृज भार्गव ने बताया कि इसी होटल में हमारे रुकने का प्रबन्ध है।
वैसे तो सभी कसीनो अत्यन्त सुन्दर थे परन्तु ऊपर प्लेन से इसे देखकर एक
रोमांचक अनुभूति हुई थी - ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम वास्तव में अलादीन
के महल के समीप आ गये हों और चिराग का जिन्न क्षणमात्र में प्रकट होने वाला
हो।
अपने-अपने बैग को खींचते हुए हम लोगों ने होटल के पिछले द्वार से अन्दर
प्रवेश किया। शीशे के दरवाजे के समीप पहुँचने पर वे स्वयंमेव खुल गये।
सामने दाईं ओर कॉफी शाप थी। बगल में स्विमिंग पूल एवं स्पा का चिन्ह लगा
था। कुछ दूर पर सीधे चलकर बाईं ओर एक गैलरी बनी थी, जहाँ से एस्कैलिबर टावर
११ के कमरों में जाने के लिये लिफ़्ट लगी थी। हम लोग इसी में सिक्सटीन्थ
फलोर पर १४,
२४,
२८,
३४
न० के कमरों में रुकने थे, परन्तु इनमें
जाने के पूर्व रजिस्ट्रेशन कराने के लिये हमें पूरा कसीनो पार करके
रजिस्ट्रेशन आफ़िस तक जाना था। विशाल हाल स्लाट मशीनों से भरा पडा था और
खेलने वालों के सिर ही सिर चमक रहे थे। कहीं एक सेन्ट से खेला जा सकता था
तो कहीं पाँच डालर से। दाहिनी ओर एक हाल था जहाँ हाई स्टेक्स से खेला जाता
था। कहीं - कहीं पर ५ हजार की एक चाल से भी खेला जाता था। वहाँ पर पोकर व
ब्लैक जैक की मेजें भी सजी थीं। रात्रि के १२ बजने
वाले थे अतः खेलने वालों की संख्या अधिक थी।
बृज भार्गव और दीप्ति बहुत हँसमुख हैं और किसी न किसी को छेड़ने का सिलसिला
चलता रहता है। वहाँ चलते - चलते एकाएक दीप्ति बड़े जोर से हँसने लगीं और
शैतानी से बृज की ओर देखकर मुस्करा कर हमसे बोलीं –
“संगीता
ने यहाँ आते समय बड़ी गम्भीरता से मुझसे कहा - आन्टी ! अंकल को लास वेगास
में अकेले मत छोड़ियेगा”-और
यह कहकर वह फिर जोर से हँसने लगी। लगभग एक - दो फर्लांग का चक्कर काटने के
उपरान्त हम रजिस्ट्रेशन आफस के काउन्टर पर पहुँचे। अपनी-अपनी चाभी लेकर जब
हम लोग अपने कक्ष में पहुँचे तो देखा कि यह एक फेमिली रूम है जिसमें दो
डबलबेड पड़े हैं। बीच में एक टेबिल पर एक टेलिफ़ोन व एक लैम्प रक्खा है।
दूसरी ओर एक कबर्ड रक्खा है जिसके ऊपर दीवार में बहुत बड़ी टी०वी० स्क्रीन
लगी है। कबर्ड पर टी० वी० का रिमोट रक्खा है। उसके समीप दो गद्दीदार
कुर्सियाँ रक्खी हैं। उनके ऊपर एक लम्बा लैम्प छत से लटक रहा है। दाहिनी ओर
एक बड़ी सी शीशे की खिड़की है, जिसके नीचे
एयरकन्डीशनर लगा है परन्तु ऊपर बेन्च बनी है, जिसका
उपयोग सामान रखने के लिये किया जा सकता है। हम दोनों जब खिड़की पर आकर खड़े
हुए तो वहाँ का दृश्य देखकर विमुग्ध हो उठे। खिड़की के ठीक सामने इस होटल की
दस मीनारें दिखाई दे रही थीं, जिनमे कुछ का ऊपरी
भाग लाल, कुछ का नारंगी और कुछ का बैंगनी था। हल्के
नीले आकाश की पृष्ठभमि में, पीले प्रकाश के साथ,
टावर १ एवं टावर २ के बीच में स्थित ये मीनारें अत्यन्त
सुन्दर दिखाई दे रही थीं। इस विशाल बहुमंजली होटल मे चार हजार कमरे हैं।
नजर भरकर इस दृश्य को देखने के उपरान्त हम दोनों सोने के लिए नर्म- नर्म
बिस्तर में घुस गये।
हाउसकीपिंग के खटखटाने पर नींद खुली तो देखा साढ़े दस बजे हैं। हम शीघ्रता
से नहा धेाकर तैयार होने लगे। इसी समय फोन की घन्टी बजी -”भाई
साहब ! चाय या काफी लेंगे”
गोपालसिंह ने आत्मीयता से ूछा।”हाँ,
क्यों नहीं”
- मेरे पति ने उत्तर दिया।
”ठीक
है,
मैं अभी लेकर आता
हूँ”
- गोपाल सिंह ने कहा। कुछ देर में ही गोपालसिंह एवं कमला
अपने हाथों में काफी के दो बड़े गिलास एवं एक पैकिट मे ढेर सारे क्रीम व
शुगर के सैशे लेकर आ गए।
“
भाईसाहब,
भाभी जी आप लोग तैयार होकर नीचे हाल में आ जाइयेगा। तब तक
हम लोग स्लौट मशीन का हाल - चाल देख लें‘ स्मार्टली
ड्रेस्ड कमला ने मुस्करा कर कहा।
हम लोग तैयार होकर कक्ष से बाहर निकले तो दीप्ति भी अपने कक्ष से बाहर आ
रही थीं। सरोज के कमरे का दरवाजा खटखटाया तो देखा कि वह अभी कमरे में थीं।
बृज ब्लैक जैक खेलने एवं महेन्द्र पोकर खेलने के लिये नीचे जा चुके थे।
ब्लैक पैन्ट व एम्ब्रौइडर्ड वाइट एन्ड ब्लैक टौप पहने सरोज एवं पिंक टौप
एवं मैचिंग पैन्ट पहने दीप्ति मेकअप करके तैयार थीं। इतने में ब्राउन पैन्ट
व मैचिंग लाइट ब्राउन टौप पहने स्फूर्ति भरी
कमला हमें बुलाने के लिये ऊपर आती दिखाई दीं। सब लोग नीचे लिफ़्ट से
उतरे तो सामने ही स्लौट मशीनें थीं। कुछ दूर आगे चलने पर,
बाईं ओर एस्कलेटर से ऊपर जाने पर,
दाहिनी ओर मैक्डौनल्ड, पीजाहट,
खाने - पीने के अन्य रेस्ट्राँ,
कपड़ों,
खिलौनों आदि की दूकानें थीं। इस समय १२ बज चुके थे अतः
सबने लंच लेकर घूमने का कार्यक्रम बनाया। सब नामक सैन्डविच जो लम्बे से बन
के बीच में ओलिव, लेटअस,
टोमैटो, अनियन, चीज आदि
डालकर बनाई जाती है, का आर्डर दिया। उसके साथ
हैलोपीनो नामक कटी हुई मिर्च एवं सौस भी था। हममें से कुछ लोगों ने चाय,
काफी व कुछ ने पेप्सी ली। यहाँ के रेस्ट्राँ में भेजन का
आर्डर देकर पहले मूल्य चुका दिया जाता है तब एक रसीद मिलती है जिसपर आर्डर
का नम्बर लिखा रहता है। अगले काउन्टर पर सामग्री तैयार हो जाने पर उसका
नम्बर बुलाया जाता है। अपना नम्बर आने पर अपना पैकिट लेकर समीप रक्खी
कुर्सियों पर बैठ कर खा लीजिये। पानी लेना है तो मशीन लगी है। डिस्पोजेबिल
गिलासों में पानी या शर्बत लेकर आ जाइये। भोजनोपरान्त अपनी जूठी प्लेटें,
गिलास आदि स्वयं ही समीप रक्खे डस्टबिन में डाल देते हैं
और मेज को भी नैपकिन से पोछकर साफ कर दिया जाता है।
हम लोग भेाजन से निवृत्त होकर नीचे आये तो कुछ देर कसीनों में स्लौट मशीनों
पर खेलने का कार्यक्रम बनाया। वहाँ पर एक सेन्ट वाली मशीने भी थीं अतः मैं
व मेरे पति ने कुछ देर उसका आनन्द लिया। एक दो बार खेल जीतकर हारना तो
निश्चित ही था अतः दो डालर हारने के उपरान्त हम लोग कमला व सरोज की ओर
पहुँचे। वे लोग २५ सेन्ट वाली मशीन पर खेल रही थीं। उन्होंने अपनी सीमा २०
डालर तक निश्चित की थी। वे भी दो एक बार जीतकर हार गईं। इसी बीच एक व्यक्ति
ने आकर बताया कि खेलने के लिये १० डालर का कार्ड मुफ़्त मिलता है। हम लोगों
ने भी १० डालर का कार्ड बनवाया। सरोज इस कार्ड को लेकर खेलने पथुँची तो
ज्ञात हुआ कि जब अपने पैसे से एक हजार पॉइन्ट खेल लेंगे तब यह १० डालर का
कार्ड एक्टिवेट होगा। इसके बाद ही इसका उपयोग हो सकेगा अन्यथा नहीं। हम लोग
भी उनसे कम चालाक नहीं थे। १० डालर के लालच में अपना धन गँवाना उचित न समझ
कर कार्ड तो बच्चों को दिखाने के लिये पर्स में रख लिये और अन्य कसीनो
घूमने का कार्यक्रम बना लिया।
बृज भार्गव एवं गोपाल सिंह पैदल जाकर,
काफी दूर बनी सेल्फ-पार्किंग से कार कसीनो के सामने ले
आये। बृज ने ड्राइवर की सीट सम्हाली, हम सब पीछे
बैठ गये। सर्वप्रथम हम मिराज में पहुँचे। वहाँ से पैदल चलकर हम स्टैटोस्फयर
पहुँचे। विशाल क्षेत्र में बने इस कसीनो की खासियत यह है कि इसमें ऊपर टावर
बनी है। १० डालर का टिकिट लेकर टावर पर ऊपर जा सकते हैं। वहाँ से पूरे शहर
का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। साथ ही वहाँ तीन राइड्स हैं जिन पर दर्शकों
को ऊपर से नीचे विभिन्न कोणों से लटका दिया जाता है। उसके चित्रों को देखकर
ही हमारी रूह काँप गई और सबने केवल दृश्य देखने के लिये १० डालर व्यय करना
व्यर्थ समझा।
वहाँ से चलकर हम ट्रैर्जर आइलैन्ड कसीनो में पहुँचे। वहाँ बहुत सुन्दर शो
होता है। शो शुरू होने में अभी देर थी अतः हम लोग सर्कस - सर्कस में चले
गये। वहाँ कसीनो के साथ सर्कस शो भी होता है। दो गोरे लड़कों एवं दो गोरी
लड़कियों ने झूले से झूलने के हैरतअंगेज कारनामे दिखाये। जब एक लड़की झूला
झूलती थी तब दूसरी एकदम छोटे अधोवस्त्र पहने,
अपने पैरों, कूल्हों एवं शरीर को
कामुकतापूर्ण अन्दाज में घुमाती रहती थी। लगभग १५ या २० मिनट का शो था।
अब सर्कस - सर्कस से निकलकर हम पुनः मिराज में पहुँचे। वहाँ पर सबने पहले
आइसक्रीम खाई,
तत्पश्चात् ट्राम से ट्रैजर आइलैन्ड पहुँचे। वहाँ एक पुल
बनाया गया था जिसके दो भाग किये गये थे। वहाँ सीक्योरिटी गार्ड खड़े थे। पुल
पर रस्सी से सामने की ओर एक घेरा बनाया गया था। जो पर्यटक होटल में रुके थे,
उनकी चाभी देखकर सीक्योरिटी गार्ड उन्हें घेरे मे जाने
देते थे। जो पर्यटक बाहर के थे उन्हें पुल के दूसरी ओर खड़ा करते थे। इस शो
का कोई टिकिट नहीं था। शो प्रारम्भ होने का समय संध्या साढ़े सात बजे था।
पुल के सामने एक ओर एक शिप खड़ा था जिसमें कई सीढ़ियाँ और छोटे - छोटे डेक
थे। शो शुरू होने से पूर्व साइरन बजा। काले रंग के टाइट वस्त्र पहने कुछ
लड़कियाँ एक डेक से दूसरे डेक पर छ्लाँग लगाते हुए ऊपर नीचे आने - जाने
लगीं। वे समझ में न आनेवाली अंग्रेजी भाषा बोल रही थीं। कुछ देर के पश्चात्
दूसरी ओर से एक शानदार शिप आया जिसपर कई पाइरेट खड़े थे। उन्होंने फाइरिंग
प्रारम्भ की तो सामने वाले शिप में आग लग गई। लड़कियों ने छिपकर स्वयं को
बचा लिया। आग भी बुझा दी। अब लड़कियों ने फाइरिंग प्रारम्भ की तो पाइरेट्स
का शिप जलने लगा और डूब गया। पाइरेट्स तैरकर लड़कियों के शिप प पहुँच गये
और सब लोग मिलकर नाचने लगे। पूरे शो में भाषा समझ में न आने पर भी हमें शो
ने बहुत प्रभावित किया। उसका प्रस्तुतीकरण बहुत सुन्दर,
भव्य, एवं आकर्षक था।
शो समाप्त होने पर हम लोग एस्कैलिबर होटल में वापस आ गये। रात्रि का भोजन
हमने वहाँ के रेस्ट्राँ में किया। कुछ ने पीज़ा खाया और कुछ ने सब सैन्डविच
खाईं। रात के दस बज गए थे,
हम सब लोग थक गए
थे अतः गुड नाइट कह कर सोने चले गये।
“भाईसाहब
! गुड मार्निंग। कॉफी पीना है क्या”
-फोन की घन्टी से नींद खुली तो महेन्द्र अमीन का स्वर
सुनाई दिया।
“हाँ,
हाँ बिल्कुल। काफी पीना है”
- मेरे पति ने प्रफुल्लता से उत्तर दिया।
“ठीक
है,
मैं पाँच मिनट
में आफ व भाभी जी के लिये कॉफी लेकर आ रहा हूँ। आप फ्रेश हो लीजिये”
- मेरे पति की उनींदी आवाज को सुनकर महेन्द्र ने कहा।
“ठीक
है”
- कहकर मेरे पति ब्रश करने चले गए। हम दोनों तैयार हुए तब
तक दरवाजे पर खटखटाहट सुनाई दी, खेालने पर सामने
महेन्द्र जी खड़े दिखाई दिये
- दोनों हाथों में बड़े - बड़े कॉफी के गिलास और सीने से चिपकाये हुए पैकिट
में ढेर सारे क्रीम एवं शुगर के सैशे एवं
मुख पर आत्मीयताभरी मुस्कान। दोहरे बदन के,
कुछ छोटे कद के महेन्द्र भाई नीले पैन्ट, धारीदार
शर्ट एवं टाई में भली भाँति तैयार होकर आये थे। बोले –
“भाईसाहब
तुमको ज्यादे दूध पसन्द है न,
इस वास्ते ज्यादा क्रीम लाया हूँ। आप तैयार हो जाओ तब हम
लोग ब्रेकफास्ट करके घूमने चलेंगे। फिर सिर आगे झुकाकर,
मुस्कुराकर, जरा धीमे स्वर में
बोले – “तब
तक मैं थोड़ी देर पोकर खेलकर आता हूँ। ठीक है न।”
“हाँ
,
हाँ
,बिल्कुल
ठीक है”
-
मेरे पति ने उत्तर दिया
हम तैयार होकर नीचे उतरे तो दस बजने वाले थे। एस्कलेटर से ऊपर जाकर सबने
ब्रेकफास्ट किया। कुछ देर वहाँ की दुकानों का भ्रमण किया। वहाँ पर अनेकों
प्रकार की दुकानें थीं। तरह-तरह का सामान रक्खा था - आर्टिफ़िशियल ज्यूलरी
से लेकर कपड़ों एवं बच्चों के खिलौनों तक। किसी - किसी दुकान पर नोटिस लगा
था -
’एनीथिंग
इन टेन डालर‘।
एक अन्य दुकान पर एक आदमी खड़ा था। पास में दो काउन्टर थे जिन पर तरह - तरह
के छोटे - बड़े खिलौने रक्खे थे। दूसरी ओर वेट लेने की एक बड़ी मशीन रक्खी
थी। यहाँ पर यदि दुकानदार ग्राहक की उम्र और वजन अन्दाज से तीन के अंतर तक
सही बता देगा तो ग्राहक को एक छोटा खिलौना २ डालर में या एक बड़ा खिलौना ५
डालर में खरीदना होगा। महेन्द्र जाकर एक बड़ा खिलौना ५ डालर में खरीद लाये।
बोले -
“यह
टेडीबियर अभी मेरी कार की सीट पर गद्दी का काम देगा,
बाद में सजावट के काम आयेगा।”
प्रत्येक कसीनो में कई थियेटर हैं। कुछ में फ्री शो होते हैं और कुछ में
टिकिट से। गोपाल सिंह व कमला के पुत्र राजीव को ज्ञात हुआ कि कमला हम सबको
लेकर घुमाने के लिये लास-वेगस आई हैं तो मदर डे की गिफ़्ट के रूप में उसने
हम सब के लिये शैम्पेन के साथ डिनर एवं शो के आठ टिकिट भेजे। राजीव की
पत्नी जिल ने स्वयं टिकिट लाकर कमला को दिये। एक सौ छिअत्तर डालर का एक
टिकिट था और हम लोगों में से किसी का इरादा इतना धन व्यर्थ व्यय करने का
नहीं था। माँ के लिये राजू एवं जिल के स्नेह की भावना ने हम सभी के हृदय
गद्गद कर दिये। शाम को साढ़े छः बजे एम०जी०एम० में डिनर एवं शो के लिये
जाना था। साढ़े तीन बजे थे अतः हम लोगों ने कमरे मे आकर कुछ देर विश्राम
किया। सब लोग तैयार होकर साढ़े पाँच बजे कमरे से बाहर निकले। दीप्ति एवं
सरोज ने काली डिजाइनर टॉप एवं काली पैन्ट पहनी थी। कमला ने लाइट ब्राउन
डिजाइनर लौंग स्कर्ट और मैचिंग टॉप पहनी थी। वे तीनों ही बहुत आकर्षक लग
रही थीं। एकाएक मेरे मन में विचार आया कि बोलूँ – ’आप तीनों फटाकड़ी लग रही
हैं‘,
परन्तु मुस्करा कर रह गई। सब लोग नीचे स्लॉट मशीन के पास पहुँचे। सबने थोड़ा
सा हारने के लिये खेला। अब मेरी दृष्टि एक काली मिनी स्कर्ट व अर्ध अनावृत्
वक्ष वाले काले टॉप एवं काले नेट वाले टाइट्स पहने लड़की पर पड़ी जो ट्रे में
गिलास रख कर ड्रिंक्स ले जा रही थी। मैंने ध्यान से देखा तो वहाँ पर इसी
प्रकार की ड्रेस पहने कई लड़कियॉ दिखाई दीं जो ग्राहकों को ड्रिंक्स
प्रस्तुत कर रही थीं। मेरे पति से महेन्द्र फुसफुसा कर बोले -”
ये लड़कियॉ लोगों को पिला- पिला कर मस्त कर देती हैं और वे जमकर हारते हैं।”
इसी समय स्विमिंग कॉस्ट्यूम पहने
कुछ युवतियॉ पूल से निकल कर आती दिखाई दीं
,जो
हाल में होकर अपने कमरे में जा रही थीं। मल्लिका शेरावत,
मन्दिरा बेदी एवं अन्य अनेकों अभिनेत्रियों की वेशभूषा एवं शारीरिक संरचना
देखते - देखते आँखें इतनी अभ्यस्त हो चुकी हैं कि यहाँ आकर कुछ भी अटपटा या
अश्लील नही लगता।
छः बजे हम लोग पैदल ही एस्कैलिबर के हाल से बाहर निकल कर पुल से होते हुए
एम० जी० एम० में पहुँचे। पुल पर एक अत्यन्त मनोरंजक दृश्य देखा।
-
दो लड़के जमीन पर नीचे बाईं ओर बैठे थे। उनके सामने एक प्लेकार्ड रक्खा था,
जिस पर लिखा था -
“व्हाई
लाय,
आय नीड मनी फॅार माय बियर”।
हम सब उनकी सत्यवादिता पर हँसते हुए आगे बढ़ गये। एम० जी० एम० के आगे बनी
शक्तिशाली वनराज की मूर्ति अत्यन्त आकर्षक लग रही थी। अन्दर प्रवेश करने पर
हमने सफेद शेर के निवास स्थान को देखा। बीच- बीच में शेर की रिकार्डेड आवाज
सुनाई देती थी। वहाँ पर एक नोटिस लगा था -
’मेन्टिनेन्स
के कारण शेर नहीं देखा जा सकता है।‘
मालूम नहीं कि शेर था भी या नहीं।
एम० जी० एम० के बहुत विशाल क्षेत्र मे बने कसीनो के हाल,
थियेटर,
शॉप्स,
रेस्ट्राँ आदि बहुत सुन्दर सुसज्जित थे एवं रोशनी से जगमग कर रहे थे।
सर्वप्रथम हम लोग
’पर्ल‘
नामक चाइनीज रेस्ट्राँ में पहुँचे। वहाँ मेरा वेजिटेरियन भोजन भी बहुत
स्वादिष्ट था। भोजन के उपरान्त शैम्पेन खोली गई। सियाटल से राजू ने फोन
करके डिनर के लिये स्वयं आर्डर दिया था। एक लेडी फोटोग्राफर ने वहाँ आकर
हम सबकी फोटो खींची। वह आधे घन्टे में ही फोटो खींचकर ले आई। फोटो
की एक प्रति का मूल्य २० डालर था।
डिनर समाप्त करके सवा नौ बजे हम लोग थियेटर की ओर रवाना हुए। शो का नाम
’का‘
था। हाल के अन्दर प्रवेश
करते ही हम उसे विस्फारित नेत्रों से देखते रह गये। वह हाल एक बहुत विशाल
स्टेडियम की भाँति दिखाई दे रहा था। अनोखे वस्त्र पहने कई पुरुष जगह-जगह पर
खड़े थे जो सबके टिकिट देखकर उन्हें बिठाने का कार्य करते थे और दर्शकों को
हँसाने के लिये विदूषकों की भाँति कुछ न कुछ अटपटा कार्य भी करते थे। शो के
प्रारम्भ होने के पूर्व बालकनी में सामने स्टेज के समीप नीचे से आग की तेज
लपटें धधकती हुई ऊपर उठती दिखाई देने लगीं। हाल में दाहिनी ओर एवं बाईं ओर
कई मन्जिला इमारतें बनी थीं जिनमें छोटी - छोटी बालकनी बनी थीं। शो ठीक
साढ़े नौ बजे प्रारम्भ हुआ। अनोखी वेशभूषा धारण किये हुए योद्धा लोग दोनों
ओर के भवनों में एक बालकनी से दूसरी बालकनी पर उछलते - कूदते
,
मल्ल युद्ध करते दिखाई दे रहे थे। वे कठपुतलियों की भाँति कमर में आसानी से
न दिखाई देने वाले तार से बॅधे हुए थे। उनके मुख पर रंग पुता हुआ था। उनकी
भाषा भी समझ में नहीं आती थी। अब नीचे से उठकर एक प्लेटफार्म ऊपर आ गया
जिसपर हमारे सामने दो राजकुमार मल्लयुद्ध कर रहे थे। उनके पीछे कई लोग थे।
राजा - रानी बैठे थे। वहाँ एक मोटी स्त्री
भी थी जो दर्शकों के परिहास के लिये कुछ न कुछ करती रहती थी। ऊपर से
एक दूसरा प्लेटफार्म निकल कर आया,
जिसपर राजा के शत्रु थे। उनमें युद्ध हुआ। स्टेज एवं शो का प्रस्तुतीकरण
अद्वितीय था। भाषा अगम्य होने पर भी हम लोग मन्त्रमुग्ध होकर कलाकारों के
अभिनय एवं क्षण - क्षण बदलते हुए स्टेज की कलात्मकता को को देखते रहे। कहते
हैं कि इस स्टेज के निर्माण में अठारह मिलियन डालर व्यय किये गये हैं। शो
समाप्त होने पर भावाभिभूत हम लोग अपने होटल वापस लौट आये।
“भाई
साहब ! आप लोग तैयार हो गये क्या ! चाय
,काफी
कुछ लाऊँ आपके लिये।”
-
फोन की घन्टी बजी तो दीप्ति ने प्रश्न किया।
“हाँ
हम तैयार हैं। चाय ले लेंगे।”
- मेरे
पति ने उत्तर दिया।
“ठीक
है
,
मैं लेकर आ रही हूँ”
-
दीप्ति ने कहा। थोड़ी देर में ब्राउन जीन्स व लाइट पिंक टॉप पहने दीप्ति ऊपर
आईं। उनके दोनों हाथों में चाय के गिलास थे एवं एक बगल में एक पैकिट दबा था
जिसमें दूध और चीनी थी। चाय हमारे कमरे मे रखकर दीप्ति बोलीं
-
“मैं
अभी कुकीज लेकर आ रही हूँ। आज हम लोग ब्रेकफास्ट न करके सीधे अर्ली लंच ही
करेंगे।”
“ठीक
है”
- मैने
उत्तर दिया।
“आज
क्या प्रोग्राम है”
- मेरे
पति ने प्रश्न किया।
“आज
वेनीशियन,
सीजर्स पैलेस,
मान्डले बे,
बेलाजियो आदि देखने जाने का प्रोग्राम है।”-
दीप्ति
ने उत्तर दिया।
हम लोग जब नीचे उतरे तो महेन्द्र पोकर एवं बृज ब्लैक जैक में कुछ हाथ
आजमाकर आ गये थे। कमला एवं सरोज ने भी कुछ देर स्लॉट मशीनों पर किस्मत
अजमाई थी। ११ बज रहे थे अतः हम लोग एस्कलेटर से रेस्ट्राँ मे पहुँचे। सबने
अपनी - अपनी पसन्द का भोजन किया और कॉफी पीकर घूमने के लिये तैयार हो गए।
गोपाल सिंह एवं बृज कार ले आये। चलने से पूर्व,
कमरे से सामान निकालकर हमने क्लोक रूम में रख दिया था क्योंकि आज रात को
हमे मिशिगन के लिये फ़्लाइट पकड़नी थी। यहाँ चेकिंग आउट का समय दिन के ११ बजे
है।
सर्वप्रथम हम वेनीशियन में गए। यह कसीनो बाहर से तो सुन्दर है ही परन्तु
अन्दर कितना सुन्दर है इसका अनुमान अन्दर जाकर ही लग पाता है। छत और
दीवारों की साज - सज्जा देखने के उपरान्त जब हम और आगे,
ऊपर की ओर बढ़े तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हम वेनिस में ही आ
गए हैं। सामने एक कैनाल थी जिसके दोनों ओर दुकानें एवं इमारतें थीं।
पाश्चात्य स्थापत्य कला के आधार पर निर्मित भव्य भवन,
ब्रिज और मूर्तियॉ -
वास्तव में वहाँ जैसे वेनिस साकार
हो उठा था। वहाँ पर सर्वाधिक आकर्षक था - भव्य भवनों के ऊपर आच्छादित नकली
आकाश जो संध्याकालीन आकाश की भॉति एकदम वास्तविक प्रतीत हो रहा था। स्ट्रीट
में आकर्षक लैम्प जल रहे थे। एक कोने में गोलाकार चबूतरे पर एक धवल श्वेत
पुरुष की मूर्ति खड़ी थी। जब उसके समीप खड़े होकर उसे ध्यान से देखा तो उसने
ऑखें झपकाईं। अब समझ में आया कि जीता - जागता व्यक्ति मूर्ति बनकर खड़ा है।
सब लोगों ने उसके साथ फोटो खिंचवाई। इतने मे एक लड़की प्राचीन वेशभूषा धारण
किये हुए इधर - उधर घूमती दिखाई दी। कैनाल मे प्राचीन वेषभूषा में एक नाविक
गोंडोला /नौका/ चला रहा था। पर्यटक उसमें
बोटिंग कर रहे थे। नाविक वेनिस की भाषा मे गीत गा रहा था। कुछ आगे
चलने पर एक चबूतरे पर एक स्त्री नृत्य कर रही थी और कई गायक अपने साजों के
साथ गीत गा रहे थे। सब लोगों की वेशभूषा प्राचीन वेनिस की थी।
कैनाल के किनारे - किनारे घूमकर हमें ऐसा आभास हुआ जैसे हम
संध्याकाल में वेनिस की सैर करके आये हूँ।
वेनीशियन की सैर के पश्चात् हम मान्डले बे देखने गए। वहाँ शार्क मछलियाँ
पली हुई हैं। यहाँ पर कुछ थियेटरों में फ़्री शो हो रहे थे और कुछ के टिकिट
बिक रहे थे। हमलोगों की शो में रुचि नहीं थी। हाल आदि घूमने के बाद हम
शार्क मछलियाँ देखने पहुँचे। वहाँ १६ डालर प्रति व्यक्ति का टिकिट था जो
हमने क्रय करना उचित नहीं समझा। कसीनो से बाहर आते समय हमने वहाँ स्थित
रेस्ट्राँ से आइसक्रीम खाई और बाहर निकल आये।
अभी शाम के तीन बजे थे अतः हम लोग हूवर डैम के लिये रवाना हो गए। हूवर डैम
नेवादा एवं एरिजोना स्टेट के बॉर्डर पर है और कोलाराडो रिवर पर बना है। यह
लास - वेगास से ४० मील दूर है। रास्ते मे चारों ओर छोटी - छोटी पहाड़ियाँ
घिरी हुई हैं जो बहुत सुन्दर दिखाई देती हैं। कहीं - कहीं पर कैक्टस और पाम
के वृक्ष हैं। रेगिस्तान होने के कारण वहाँ अन्य पेड़ - पौधे नहीं होते हैं।
रास्ते में छोटे - छोटे कन्डोमोनियम की कालोनी बनी थी। ये घर बहुत मंहगे
हैं। डैम पर पहचने के उपरान्त हम लोग मीड लेक तक गए। वहाँ पर लोगों की
प्राइवेट बोट खड़ी थीं। कुछ लोग बीच पर जा रहे थे। हमारे पास समय कम था अतः
हम वहाँ का चक्कर लगा कर वापस आ गए।
हूवर डैम से लौटकर हम सीजर पैलेस पहुँचे। सीजर पैलेस मे बाहर सीजर की
मूर्ति लगी है। रोमन स्थापत्य कला पर निर्मित भवनों एवं कलाकृतियों से
सुसज्जित सीजर पैलेस ने हमें अत्यन्त प्रभावित किया। यहाँ प्रवेश करने पर
प्रारम्भ में एक सुन्दर विशाल हाल है जिसमें स्लॉट मशीनें लगी हुई हैं।
वहाँ से आगे चलने पर नकली आकाश से आच्छादित संध्याकालीन रोम की अनुकृति
नाने का प्रयास किया गया है। दोनों ओर विभिन्न प्रकार की दुकानें हैं। बीच
में एक सुन्दर फाउन्टेन है। यहाँ से बाईं ओर चलकर जब हम अन्दर के हाल में
पहुँचते हैं तो बीच में एक गोलाकार चबूतरा बना दिखाई ेता है। इसके बीच में
एक ओर सीजर की मूर्ति लगी है और दूसरी ओर एक स्त्री की मूर्ति लगी है। बीच
में भी एक मूर्ति लगी है। वहाँ का हाल गोलाकार है जिनमें ऊपर स्क्रीन लगी
हैं और उनमें मछलियाँ तैरती दिखाई दे रही हैं। यहाँ साढ़े सात बजे शो
प्रारम्भ हुआ। पहले ऊपर की स्क्रीनों पर शो से सम्बन्धित फोटो आने लगे। अब
बीच की सीजर की मूर्ति नीचे
चली गई और रोमन वेषभूषा में एक सिंहासन पर बैठ कर अटलांटिस का किंग ऊपर आ
गया। कुछ देर के बाद स्त्री की मूर्ति भी नीचे चली गई और दूसरा प्लेटफार्म
ऊपर आ गया। इसके ऊपर एक स्त्री रोमन वेशभूषा में खड़ी थी। दोनों आपस में कुछ
बात करते रहे। बीच में जो मूर्ति लगी थी वह भी नीचे चली गई और वहाँ पर एक
पुरुष का शरीर ऊपर आया। स्त्री अटलांटिस के किंग की बेटी थी और पुरुष किंग
का बेटा था। पूरा शो समाप्त होने पर कलाकार उस गोले के अन्दर चले गए एवं
मूर्तियाँ वापस अपने स्थान पर आ गईं।
सब लोगों को शो बहुत अच्छा लगा। पैलेस में बहुत सुन्दर संगमरमर लगा हुआ था।
सभी मूर्तियाँ एवं कलाकृतियाँ बहुत आकर्षक थीं। इसके पश्चात् हम बेलाजियो
की ओर चले।
बेलाजियो इटली के एक गाँव का नाम है। इसी के नाम पर यह रिजॉर्ट बनाया गया
है। बेलाजियो के सामने अत्यन्त सुन्दर फाउन्टेन है। प्रारम्भ में लॉबी में
प्रवेश करते है। लॉबी के अन्दर वेनीशियन ग्लास से कलात्मक सज्जा की गई है।
वहाँ निर्मित मूर्तियाँ एवं कलाकृतियाँ विशेष रूप से सुन्दर हैं।
कलाकृतियों में हाथी,
शेर,
हिरन आदि जानवर इतने सजीव लगते हैं कि बस देखते ही बनते
हैं।
अन्दर जाकर थियेटर हैं,
रेस्ट्राँ हैं, कई सुन्दर शॉप्स
हैं। बेलाजियो का वाटर शो अपने में अनोखा है। इस शो में भाग लेने वाले
कलाकारों को बचपन से ही एक्रोबेटिक्स की शिक्षा दी जाती है। वाटर शो के
थियेटर में दर्शकों के बैठने के लिये यू शेप में सीटिंग की व्यवस्था की गई
है। सामने शो होता है। जब कलाकार ऊपर से नीचे कूदते हैं तो आगे वाली सीटों
के दर्शकों के ऊपर पानी के
छींटे पड़ जाते हैं। इसलिये आगे बैठने वाले दर्शकों को पहनने के लिये बरसाती
दी जाती है। सामने पूल में कलाकार जल क्रीड़ा करते हैं और दर्शक उसका आनन्द
लेते हैं। पूल के बीच में कभी प्लेटफार्म बन जाते हैं जिनपर कलाकार खड़े
दिखाई देते हैं, कभी प्लेटफार्म नीचे चले जाते हैं।
प्लेटफार्म के बीच में छोटे - छोटे छेद होते हैं। कलाकार ऊपर से नीचे के
छेदों के जल में कूदते हैं। नीचे छलाँग लगाने वाले कलाकार बहुत एक्सपर्ट
होते हैं।
बेलाजियो का नेचर सेन्टर बहुत सुन्दर है। इसकी विशेषता यह है कि इसके अन्दर
मौसम के अनुसार फूल लगाये जाते हैं। मैसूर के वृन्दावन गार्डेन की भॉति
यहाँ पर
’लाइट
एन्ड वाटर शो
‘
होता है,
साथ में म्यूज़िक बजता रहता है।
बेलाजियो में पीछे की ओर हाल में स्लॉट मशीनें एवं कार्ड खेलने की व्यवस्था
है।
लास वेगास में इतने सारे कसीनो हैं कि इतने कम समय में उनके विषय में जानना
सम्भव नहीं है। यहाँ यह देखकर आश्चर्य होता है कि हर कसीनो में बेशुमार भीड़
है। विश्व के अगण्य पर्यटक
यहाँ आते हैं और रहते हैं। जहाँ तक मुझे ज्ञात है लक्सर में २५००,
एस्कैलिबर में ४०००, एम० जी० एम०
में ५००० रूम्स हैं। सभी कसीनों भरे ही रहते हैं।
हम लोग चलते - चलते थक गए थे और फ़्लाइट भी लेनी थी अतः आगे न जाकर वापस हो
लिये। ज्यूमिटी नामक शो के जगह - जगह पर पोस्टर लगे हुए थे। उसका टी० वी०
पर भी काफी प्रचार किया जा
रहा था। यह न्यूड शो था। लास - वेगस ही ऐसा स्थान है
जहाँ वेश्यावृत्ति की कानूनन स्वीकृति दी गई है। रास्ते में पैरिस
के सामने आइफल टावर की प्रतिकृति देखकर पैरिस भ्रमण की स्मृति हो आई।
एस्कैलिबर में वापस आकर हमने डिनर लिया और अपना सामान लेने क्लोक रूम में
पहुँचे। इस समय रात्रि जवान थी। लोगों की भीड़ लगी थी और स्लॉट मशीनों पर
खट् - खट्,
खनन -खनन की ध्वनि सुनाई दे रही थी। यह सब देखकर ऐसा
प्रतीत होता है जैसे यहाँ कोई गरीब नहीं है। दुःख का कहीं नामोनिशान नहीं
है। हर कोई व्यस्त है। युवा, युवती,
वृद्ध या वृद्धा -
जिसे देखो मस्त होकर स्लॉट मशीनों
पर जुटा हुआ है। हजार डालर की चाल खेलने वालों की भी यहाँ पर कमी नही है।
सबको मस्त रखने हेतु संक्षिप्त काले वस्त्रों में सुसज्जित लड़कियाँ जाम के
गिलास लिये इधर - उधर घूमती रहती हैं ।
हम लोग जब होटल से बाहर निकलकर एयरपोर्ट की ओर चले तो ऑख भरकर अन्तिम बार
वहाँ की जगमगाहट को देखा।”अमीरों
की ऐशगाह”-
लास वेगस वास्तव में एक
जादुई नगरी है। |