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ISSN 2292-9754

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10.11.2014


संदेही सरि की मँझधार में हो जाती

हिय-वीणा पर बज रहे कीर्तन भजन आरती
संदेही सरि की मँझधार में हो जाती
मेरे सुर की तरणी-दिशा में
विकार की सुध होने लगती
तेरे मधुर मुग्ध मधु मंजरी के चारों ओर
न जाने कितने भँवरे
उन्माद लिये भ्रमण करते
मन-अभिप्राय है -
तू अपने स्नेह सौरभ सागर में
डुबा केवल मुझे
मेरा दंभी मन रूठकर
देवालय-वातावरण त्याग
बैठ जाता कोने
अतः -
अंतःवीणा के सभी राग
टूट-टूट कर बिखर जाते
ढोंगी प्रेम की रागिनियों से भरी
मेरी नौका डूब जाती, -
रूठे प्राण तृप्त न हो पाते
सद् विचार हो!
हे सुमन-हिय-कोष में आसन ग्राही!
कृतार्थ वालों में अंतिम ही बना ले


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