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ISSN 2292-9754

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10.11.2014


आज तुम-हम मिले थे

आज तुम-हम मिले थे,
निशि के मन्द आलोक में
जब चाँदनी समीर संग लोरी गा रही थी
हृदय के सूने पड़े वाद्ययंत्र पर सहसा
तेरे कोमल स्पर्श से
मधुर सुर में रागिनी बज उठी
मन में पड़ा पूर्वजन्म का भी गहन तिमिर
रूठ न जाने कहीं छिप गया
सर्वदिशा में हिय के गूँगे विहंग चहक उठे थे
नेत्र-नीर से तेरे चरण-सरोज को छू लिया
दंभी संदेही रक्त अंग के
कण-कण में विहरता रहा
वास्तविक पवित्र दर्शन हुए थे?
कर में तूने स्नेह-समुद्र का बालू जो भेंट दिया
आज तुम-हम मिले थे


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