नीरज सारंग

कविता
आज तुम-हम मिले थे
जग त्याग उड़ जाना मुझको न भाता
जहाँ अपने गीतों के माध्यम से
जहाँ कहीं भी मेरे पग पड़ते थे
मेरा हर गीत सुमन सज जाने दे
मैं क्या गीत गाऊँ?
संदेही सरि की मँझधार में हो जाती