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07.28.2007
 
याद आये तो
नीरज गोस्वामी

ज़िक्र तक हट गया फ़साने से
लोग जब हो गये पुराने से

बात सुनते नहीं बुज़ुर्गों की
हैं ख़फ़ा उनके बुदबुबाने से

जो है दिलमें जुबां पे ले आओ
दर्द बढ़ता बहुत दबाने से

तू मिला आँख यार कातिल से
ना पसीजेगा गिडगिडाने से

याद आये तो जागना बेहतर
मींच कर आँख छटपटाने से

राज बस एक ही खुशी का है
चाहा कुछ भी नहीं जमाने से

ग़म के तारे नज़र नहीं आते
चाँद के सिर्फ़ मुस्कुराने से

देख बदलेगी ना कभी दुनिया
तेरे दिन रात बड़बड़ाने से

बुझ ही जाना बहुत सही यारों
बे सबब यूँ ही टिमटिमाने से

तुम बुरे को बुरा कहो नीरज
यही अच्छा है फुसफुसाने से

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