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01.27.2008
 
मैं तन्हा हूँ ये दरिया में
नीरज गोस्वामी

तुम्हें जब याद करता हूँ मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ
हमारे बीच की इन दूरियों को यूँ मिटाता हूँ

इबादत के लिए तुम ढूँढते फिरते कहाँ रब को
गुलों कों देख डाली पर मैं अपना सर झुकाता हूँ

नहीं औकात अपनी कुछ मगर ये बात क्या कम है
मैं सूरज कों दिखाने दिन में भी दीपक जलाता हूँ

मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज़ पहुँचेगी
मगर तन्हाईयों में मैं तुम्हे अक्सर बुलाता हूँ

मैं तन्हा हूँ ये दरिया में मगर डरता नहीं यारों
जो कश्ती डगमगाती है तुझे मैं साथ पाता हूँ

अँधेरी सर्द रातों में ठिठुरते उन परिंदों कों
अकेले देख कर कीमत मैं घर की जान जाता हूँ

घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी "नीरज"
इन्ही में दिल करे जब भी तुझे मैं देख आता हूँ

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