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| 04.06.2008 |
| मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं नीरज गोस्वामी |
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मान लूँ मैं ये करिश्मा प्यार का कैसे नहीं
वो सुनाई दे रहा सब जो कहा तुमने नहीं इश्क का मैं ये सलीका जानता सब से सही जान देदो इस तरह की हो कहीं चरचे नहीं तल्ख़ बातों को जुबाँ से दूर रखना सीखिए घाव कर जाती हैं गहरे जो कभी भरते नहीं अब्र* लेकर घूमता है ढेर सा पानी मगर फ़ायदा कोई कहाँ गर प्यास पे बरसे नहीं छोड़ देते मुस्कुरा कर भीड़ के संग दौड़ना लोग ऐसे ज़िंदगी में हाथ फिर मलते नहीं ख़ुशबुएँ बाहर से वापस लौट कर के जाएँगी घर के दरवाजे अगर तुमने खुले रक्खे नहीं जिस्म के साहिल पे ही बस ढूँढते उसको रहे दिल समंदर में था मोती तुम गए गहरे नहीं यूँ मिलो "नीरज" हमेशा जैसे अन्तिम बार हो छोड़ कर अरमाँ अधूरे तो कभी मिलते नहीं |
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