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| 07.15.2007 |
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कुछ सदा में रही
कसर शायद नीरज गोस्वामी |
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कुछ सदा में रही
कसर शायद
दर्द तन्हाई का
ना पूछ मुझे
तेज़ थी धूप छा
गई बदली
बोलती बंद आजकल
उसकी
गीत पत्थर भी
हैं लगे गाने
फिर जलाईं
हथेलियाँ उसने
सिल गये होंठ
दुश्मनों के तभी
लो घटा याद की
है गहराई
सच अकेला है भीड़
में नीरज |
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