साँझ घिर आई.... नीना वाही
फिर एक साँझ घिर आई है फिर तुम्हारी याद आई है तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श की याद आई है नयनों में न थमने वाली बरखा घिर आई है फिर तुम्हारी याद आई है रोते हुए होंठों पे हँसी आई है जब तुम्हारी सूरत झरोखे से नज़र आई है फिर तुम्हारी याद आई है