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06.30.2012


मेरा मकान है

पत्तों पे झूलता हुआ मेरा मकान है
नीचे कहीं ज़मीं ना ऊपर आसमान है

फिसल गए हथेलियों से रेत की तरह
लमहों की मेरे देखो बड़ी तेज़ उड़ान है

ये रात की दीवार बढ़ कर रोकने लगी
होने दो रोशनी को आगे बियाबान है

देखो तो कैसे जूझ रहा है हवाओं संग
वो इक दिया जो रात का ही महमान है

भूल के कल थाम ले जो आज की बाहें
उसके ही आगे झुकता ये सारा जहान है


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