अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
06.23.2014


ऐसा क्यों

गाड़ी चलने ही वाली थी कि वो भागती हुई आ कर उसमें चढ़ गई। डिब्बे में आ कर वह डरी हुई सी छुप-छुप कर खिड़की से बाहर देखने लगी जैसे किसी से बचने की कोशिश कर रही हो।

एक दस ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसके कंधे से स्कूल का बस्ता लटक रही है, उसने स्कूल यूनिाफ़ार्म पहन रखी है। साफ़ पता चलता है कि यह लड़की घर से भाग कर कहीं जा रही है।

जब गाड़ी ने गति पकड़ी तो उस बच्ची ने एक लम्बी साँस ली। स्कूल बैग़ को उसने काँपते हुए हाथों से कस कर सीने से लगा लिया। ज़रा सी भी आवाज़ होती तो वह घबरा जाती। किसी के कदमों की आहट सुनती तो अपने बैग के पीछे छुपने की कोशिश करती। शायद उसे अभी भी यह डर था कि कहीं कोई उसे पहचान न ले। स्कूल बैग उसने ऐसे सीने से दबोचा हुआ था जैसे कोई डरा हुआ बच्चा अपनी माँ के सीने से लग कर स्वयं को सुरक्षित समझता है।

जब उसे विश्वास हो गया कि अब यहाँ कोई नहीं आ सकता तो वह लम्बी साँस खींच सीट पर सीधी हो कर बैठ गई। अभी भी कोई उसके पास से निकलता तो वह चौंक जाती।

सामने वाली सीट पर एक अधेड़ उम्र की महिला बैठी हुई थी। वह बहुत ध्यान से उस लड़की की हरकतें देख रही थी। शायद वो उसकी घबराहट समझ रही थी। उस महिला ने चारों ओर नज़रें घुमा कर देख लिया था कि इस लड़की के साथ कोई नहीं है। साफ़ पता चल रहा था कि यह लड़की घर वालों की अनुमति के बिना कहीं जा रही है। आख़िर क्या मजबूरी हो सकती है जो इस छोटी सी आयु में इस बच्ची ने इतना बड़ा कदम उठा लिया है। इतने छोचे बच्चे का अकेले सफ़र करना.....। वो महिला सोचने लगी कि मुझे बातों में लगा कर इससे पूछना होगा कि यह कहाँ जा रही है।

उस लड़की की नज़रें जैसे ही अपने सामने की सीट पर बैठी महिला से टकराईं तो वह महिला हल्के से मुस्कुरा दी जिसे देख कर उस लड़की ने झेंप कर नज़रें झुका लीं मानों कोई चोरी करते हुए पकड़ी गई हो।

बच्ची की तरफ़ देखते हुए उस महिला को तीन चार दिन पहले की एक घटना याद हो आई। यह सामने बैठी महिला एक सोशलवर्कर है। यह एक समेरिटेन ग्रुप में भी काम करती है। समेरिटेन एक ऐसी संस्था है जो अपने प्रियजनों से सताये हुए लोगों के लिये काम करती है। विशेषकर ज़ुल्म सहने वाले वे बच्चे, जो किसी से भी दिल की बात बताने में असमर्थ होते हैं, फिर हार कर ग़लत कदम उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। कभी तो उनका छोटा सा दिमाग स्वयं को ही इन सब का कारण समझने लगता है।

आप समेरिटेन संस्था के किसी भी मेम्बर से मिल नहीं सकते। आपसी बात केवल टेलीफ़ोन द्वारा होती है। इस लिये अकसर जो लोग किसी और से अपने दिल की बात नहीं बता सकते, वो बेझिझक इनसे बात करके अपने दिल का बोझ कम कर लेते हैं। इस संस्था के सदस्य अपनों से सताये हुए बच्चों की सहायता करने के लिये सदैव तत्पर रहते हैं।

इस महिला को दो तीन दिन पहले ही एक डरी सहमीं लड़की का फ़ोन आया था - "हैलो!" महिला ने स्पीकर उठा कर कहा।

दूसरी ओर से तेज़ साँसे लेने की आवाज़ें, मगर कोई जवाब नहीं। शायद कोई बात करने के लिये हिम्मत जुटाने की कोशिश कर रहा था। इससे पहले कि वो घबरा कर फ़ोन ना काट दे वह महिला बड़ी नर्म आवाज़ से बोली.. "देखिये, आप घबराइए मत।

आप जो भी हैं, हम आपको देख नहीं सकते। इस लिये जो बात कहनी है, बेझिझक मुझसे कह सकते हैं।"

दूसरी ओर से एक बच्ची की सिसकती सी धीमी आवाज़, "आई, मुझे बहुत डर लग रहा है।"

"क्यों बेटा आपको किस बात से डर लग रहा है?"

दूसरी ओर से फिर ख़ामोशी।

"आप अँधेरे से डरती हैं?" महिला ने प्यार से पूछा - "वो अच्छा आदमी नहीं है। वो मुझे हर्ट करता है।" एक रुआँसी सी आवाज़ आई।

"आप की मम्मी हैं ना। आप उनसे बात करिये।" महिला ने समझाते हुए कहा।

"नहीं मम्मी मेरी बात नहीं मानेंगी। मुझे ही मारेंगी। वह मम्मी का ब्वायफ़्रेंड है।" बच्ची की सहमी सी आवाज़ आई।

उस महिला का माथा ठनका।

"और क्या कहता है वो आपसे बेटा?"

"वो गंदी बातें करता है। जब वो मुझे किस करता है तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। वो कहता है कि मैंने मम्मी को कुछ बताया तो वह मुझे और मेरी मम्मी दोनों को मार डालेगा। वो बहुत बुरा है। मैं घर से भाग जाऊँगी।" वह लड़की रोते हुए बोली।

"देखो बेटे, मेरी बात ध्यान से सुनो। आप कितने साल की हैं और कहाँ से बोल रही हैं?"

इस से पहले कि वह महिला उस बच्ची को बातों में उल्झा कर कुछ कर पाती, उधर से घबराई हुई आवाज़ आई - "वो मुझे ढूँढते हुए इधर ही आ रहा है।" और फ़ोन बच्ची के हाथ से छूट गया।

"अच्छा तो तुम यहाँ छुपी बैठी हो। मैं कहाँ कहाँ तुम्हें ढूँढ कर आ रहा हूँ। मुझ से बचना इतना आसान नहीं है जेनी।" किसी पुरुष की भद्दी हँसी हँसते हुए आवाज़ आई- "चलो घर।"

"नहीं मैं घर नहीं जाऊँगी," वो लड़की रोते हुए बोली। ज़ोरदार चाँटे की आवाज़ और चीख सुनाई दी।

क्योंकि रिसीवर लटका हुआ था इसलिये उधर बैठी महिला सब कुछ सुन रही थी। मगर वह कुछ कर नहीं सकती थी। बस उस के दोबारा फ़ोन करने का इंतज़ार करने लगी। पर दोबारा फ़ोन नहीं आया।

जेनी बैठे-बैठे उस हादसे में खो गई जब वह सहायता के लिये किसी को फ़ोन कर रही थी। तभी डेविड उसे ढूँढते हुए वहाँ आ गया था। वह उसे कैसे जानवरों की तरह खींच रहा था फ़ोनबूथ से उसे बाहर खींच कर डेविड ने गुस्से से पूछा.. "किसको फ़ोन कर रही थी जेनी?"

"किसी को भी नहीं। तुम कौन होते हो मुझ से पूछने वाले?"

"अभी बताता हूँ कि मैं कौन होता हूँ?" वह उसका हाथ पकड़ कर अँधेरे कोने की ओर उसे घसीट कर ले जाने लगा।

उसके गंदे इरादे समझ कर जेनी ने ज़ोर से उसके हाथ पर काटा। पकड़ ढीली होते ही वह जल्दी से घर की ओर भागी। डेविड भी जेनी के पीछे भागता हुआ घर में घुसा। उसके एक हाथ से ख़ून बह रहा था।

"अरे, ये तुम्हारे हाथ में चोट कहाँ से लगी?" जेनी की मम्मी सूज़न ने जल्दी से पूछा।

"कुछ नहीं छोटी सी चोट है।"

डेविड अपने कमरे में जाते हुए बोला, "ज़रा अपनी बेटी से पूछो, इस समय किस को फ़ोन कर रही थी।"

"इट्स नन आफ़ योर बिज़नेस," जेनी डेविड की तरफ़ देख कर ज़ोर से बोली।

"जेनी, मैं देख रही हूँ तुम कितनी बदतमीज़ होती जा रही हो। ये कौन सा तरीका है डेविड से बात करने का? वह तुम्हें कितना प्यार करता है।"

"मुझे उसका ऐसा प्यार नहीं चाहिये। आई हेट हिम।"

"ख़ामोश," एक ज़ोरदार चाँटा जेनी के मुँह पर पड़ा- "ना जाने इस लड़की को क्या होता जा रहा है। चलो सीधे अपने कमरे में जाओ और जब तक मैं ना कहूँ बाहर मत निकलना।"

जेनी रोते हुए अपने कमरे में चली गई।

"बच्चों पर इतना नहीं बिगड़ते सूज़ी। जेनी अभी छोटी है," डेविड ने आ कर सूज़न को समझाते हुए कहा।

"इसको इतना भी प्यार मत करो डेविड कि वह बिगड़ जाए," सूज़न का गुस्सा अभी भी कम नहीं हुआ था।

"चलो छोड़ो गुस्सा तुम खाना लगाओ मैं उसे ले कर आता हूँ।"

डेविड के कदमों की आवाज़ सुन कर जेनी जल्दी से पलंग की दूसरी ओर हो गई।

"जेनी," डेविड सूज़न को सुनाते हुए बाहर से ही ज़ोर से बोलता हुआ जेनी के कमरे की ओर बढ़ा।

"चलो डार्लिंग, आओ खाना खायें," जेनी को डार्लिंग कहते हुए उसके होंठो पर एक शैतान मुस्कान खेल रही थी।

"मुझे भूख नहीं है," जेनी जल्दी से बोली और पलंग के दूसरी तरफ़ हो गई।

"देखो डार्लिंग, खाने पर गुस्सा नहीं उतारते," डेविड बोलते हुए जेनी की ओर बढ़ता जा रहा था।

उस छोटे से कमरे में जेनी कहाँ तक उससे बच सकती थी। उसने माँ को बुलाने के लिये जैसे ही मुँह खोला, डेविड ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। डेविड ने आगे बढ़ कर जेनी को अपनी गोद में उठा लिया। जेनी उसकी मज़बूत बाहों में छटपटाती रही। कहाँ वह छोटी सी दस साल की बच्ची और कहाँ वह छ: फ़ुट का आदमीं। वह उससे कैसे मुकाबला कर सकती थी। डेविड ने जैसे ही अपना मुँह नीचे किया तो जेनी ने उसका गंदा इरादा भाँप कर अपने छोटे-छोटे नाख़ूनों से उसका मुँह नोचने की कोशिश की, मगर वह भद्दी हँसी हँसता रहा। डेविड ने ला कर जेनी को कुर्सी पर सूज़न के सामने बिठा दिया।

"देखो यह तुम्हें कितना प्यार करता है। अब तो यह जल्दी ही तुम्हारा डैडी बनने वाला है। बस फिर हम एक फ़ैमली के समान रहेंगे।"

"हीं यह मेरा डैडी नहीं बन सकता। मम्मी आप नहीं जानतीं कि यह...."

"जेनी," डेविड की ज़ोरदार आवाज़ आई तो जेनी के हाथ से चम्मच गिर गया- "चुपचाप से अपना खाना खाओ और जाओ अपने कमरे में।"

जेनी ने डरते हुए जल्दी से थोड़ा सा खाया और अपने कमरे में चली गई।

जेनी का दिल बहुत घबरा रहा था। अब तो डेविड की हिम्मत बढ़ती ही जा रही थी। वह मम्मी के सामने ही उसके कमरे में बेधड़क आने जाने लगा था। अपनी घबराहट छुपाने के लिये जेनी ने एक किताब उठा कर अपना ध्यान दूसरी ओर लगाने की कोशिश की। ना जाने क्यों वह बहुत डर रही थी। काश। वह मम्मी को सब कुछ बता सकती।

जेनी को आज दादी माँ की बहुत याद आ रही थी। अगर दादी माँ होतीं तो डेविड जैसे दरिंदे से उसे बचा लेतीं। जेनी ने अपना दरवाज़ा अंदर से बंद किया और कपड़े बदल कर बिस्तर पर लेट गई। वह करवटें बदलने लगी। डर के मारे आज उसे नींद भी नहीं आ रही थी। ज़रा सी आहट से चौंक कर दरवाज़े की ओर देखने लगती।

आधी रात गुज़र चुकी थी। जेनी गहरी नींद में सो रही थी। दरवाज़े पर हल्की सी आवाज़ सुन कर उसकी नींद खुल गई। क्या देखती है कि अँधेरे में कोई सावधानी से उसकी ओर बढ़ रहा है। डर के कारण जेनी की चीख निकल गयी।

चीख सुनते ही वो परछांई कमरे से बाहर भाग गयी। इतने में सूज़न जल्दी से बेटी के कमरे की तरफ़ लपकती हुई आई, "जेनी," वह उसके कमरे की बत्ती जलाते हुए बोली- "क्या बात है?"

जेनी कस कर रज़ाई अपने चारों ओर लपेट बिस्तर पर बैठी काँप रही थी। उसके चेहरे का रंग सफ़ेद चादर सा हो रहा था। माँ को देखते ही वह सिसकियाँ लेते हुए बोली- "ममा वो यहाँ आया था?"
"कौन, कौन आया था?" इससे पहले कि जेनी कुछ कहती, डेविड कमरे में आ गया। उसने आते ही पूछा, "क्या हुआ सूज़न ये चीख की आवाज़ किसकी थी?"

"शायद जेनी ने कोई बुरा सपना देखा है।"

"जेनी आर यू आल राईट डार्लिंग," कहते हुए डेविड आगे बढ़ा प्यार से जेनी का चेहरा छूने के लिये हाथ बढ़ाया तो जेनी ने जल्दी से रज़ाई को बीच में कर दिया।

"दूर रहो मेरे पास मत आना," वह रोते हुए बोली- "ममा इसे बोलो मेरे कमरे से बाहर चला जाये।"

"जेनी," माँ की ज़ोर से आवाज़ आई- "अभी माफ़ी माँगो डेविड से। मैं अब तुम्हारी बदतमीज़ी और बरदाश्त नहीं करूँगी।"

"छोड़ो सूज़न बच्ची है," डेविड ने कहा।

"नहीं, इसे तमीज़ सिखानी ही पड़ेगी, ऐसे नहीं चलेगा," सूज़न गुस्से से बोली- "चलो, बहुत हो गया तमाशा। सो जाओ अब।" सूज़न कमरे से बाहर जाने लगी तो जेनी गिड़गिड़ाते हुए बोली- "ममा आप आज मेरे पास सो जाओ।"

"अरे तुम छोटी सी बेबी नहीं हो। दो दिन के बाद तुम ग्यारह साल की हो जाओगी। मुझे और डेविड को कल काम पर भी जाना है। अब तुम आराम से सो जाओ। पहले ही हमारी काफ़ी नींद ख़राब हो चुकी है," कह कर सूज़न डेविड के साथ अपने कमरे में चली गई।

जेनी को उसके बाद नींद नहीं आई। उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे ही उसने आँखें बंद कीं, डेविड कमरे में आ जायेगा। जेनी ने सोचा कि अगर मम्मी ने डेविड से शादी कर ली तो फिर उसके लिये और भी मुश्किल हो जायेगी। शेर जब एक बार ख़ून का स्वाद चख़ लेता है तो वो बार-बार ख़ून करता है। डेविड के ख़तरनाक इरादों से जेनी को बहुत डर लगने लगा था। वह इसी कशमकश में थी कि किसे बताए और कैसे।

जेनी ने मन ही मन में एक निश्चय किया। उसने सोचा कि वह एक ही घर में डेविड के साथ रह कर सुरक्षित नहीं रह सकती। आज उसका घर से दूर चले जाना बहुत ज़रूरी था। उसे एकदम अपनी आँटी का ख़्याल आया। उसके डैडी की बहन, जो लिवरपूल में रहती हैं, वह ज़रूर उसकी सहायता करेंगी। यही सोच वह लिवरपूल के लिये अकेली ही चल पड़ी।

जब एक झटके के साथ गाड़ी स्टेशन पर रुकी तो जेनी अपने ख़्यालों से जागी। लोग गाड़ी से उतरने और चढ़ने लगे। उसने जल्दी से सामने की सीट पर नज़र डाली तो देखा कि वह महिला अभी भी अपनी सीट पर बैठी हुई थी।

गाड़ी अपनी मंज़िल की ओर चल पड़ी। जेनी घबराई सी इधर से उधर देख रही थी। उस महिला ने मुस्कुरा कर जेनी से पूछा-

"आप कहाँ जा रहे हो बेटा?"

"लिवरपूल," उसने डरते हुए जवाब दिया।

"इतनी दूर आप अकेले ही जा रहे हो?"

जेनी ने हाँ में सिर हिला दिया।

कुछ सोचते हुए महिला ने बैग में हाथ डाला और दो सैंडविच निकाल उसे जेनी की तरफ़ बढ़ा कर बोली- "सैंडविच खाओगी?" बच्ची ने ललचाई नज़रों से सैंडविच की तरफ़ देखा और ना में सिर हिला कर पलकें झुका लीं।

"ले लो, देखो मैं भी खा रही हूँ," महिला ने प्यार से कहा।

बच्ची ने थैंक्यू कह कर सैंडविच ले लिया। सैंडविच खाते हुए महिला ने कहा, "मेरा नाम वरोनिका है। आप का नाम क्या है बेटे?"

"जी जेनी।" उसने पहली बार मुस्कुरा कर जवाब दिया। अब उसका डर शायद कुछ कम हो रहा था।

"लिवरपूल आप किस के पास जा रही हैं?"

"अपने डैडी की सिस्टर के पास," अब वह थोड़ा खुलने लगी थी।

"आप पहले कभी...." बात पूरी होती इससे पहले ही टी.टी. आ गया टिकट चैक करने।

जब टी.टी. जेनी के पास आया तो उसने डरते हुए जेब से टिकट निकाल कर काँपते हाथों से आगे बढ़ा दिया।

टी.टी. ने एक नज़र उसकी स्कूल यूनिफ़ार्म और बस्ते पर डाल कर कहा, "तुम्हें इस समय स्कूल में होना चाहिये था यंग लेडी।" फिर पलट कर सामने बैठी वरोनिका को सम्बोधित करते हुए पूछा- "ये लड़की आपके साथ है?"

वरोनिका धीरे से मुस्कुरा दी तो टी.टी. आगे बढ़ गया। जेनी ने एक बार फिर स्कूल बैग को सीने के साथ कस से लगा लिया और डरी नज़रों से वरोनिका को देखने लगी।

जब टी.टी. आँखों से ओझल हो गया तो वरोनिका ने जेनी से सवाल किया, "जेनी आप जानती हैं कि लिवरपूल में आपकी आँटी कहाँ रहती हैं?"

"जी मेरे पास आँटी का पता है," वह भोलेपन से बोली- "आँटी बहुत अच्छी हैं। मेरे हर जन्मदिन पर मुझे कार्ड और पैसे भेजती हैं," जेनी ने ख़ुश हो कर कहा।

अपने किन्हीं ख़्यालों में खोये हुए वरोनिका बोली, "एक बात बताओ जेनी, तुम्हें टिकट कैसे मिली। छोटे अकेले बच्चे को कोई टिकट बेचता नहीं फिर तुमने इस गाड़ी की टिकट कैसे ख़रीद ली?"

जेनी पहले तो झिझकी, फिर धीरे से बोली, "मैंने झूठ बोल कर ली है। एक बूढ़ी औरत टिकट ख़रीद रही थी। मैंने उससे कहा- मेरी मम्मी छोटे भाई बहन के साथ वहाँ बैठी हैं। वो मेरी टिकट लेना भूल गई हैं। तो प्लीज़ आप मेरे लिये टिकट ले लीजिये। वो महिला जल्दी में थीं। उन्होंने मेरे से कोई सवाल नहीं पूछा और टिकट ले कर दे दी।" जेनी ने इतने भोलेपन से बताया कि वरोनिका हँस दी।

"जेनी आपकी आँटी जानती हैं कि आप उनके पास आ रही हैं?" वरोनिका ने पूछा तो जेनी ने ना में सिर हिला दिया।

वरोनिका सोच में पड़ गईं कि यह लड़की स्वयं नहीं जानती कि कहाँ जा रही है। कहीं यह ग़लत लोगों के हाथ में ना पड़ जाये। मुझे इस के लिये कुछ करना होगा।

उधर जेनी सोच रही थी कि यह महिला मेरी कुछ नहीं लगती। इसकी आवाज़ में कितनी मिठास है। यह कितने प्यार से बातें करती है, बिल्कुल दादी माँ की तरह।

दादी माँ की याद आने से जेनी की पलकें भीग गईं।

वरोनिका बहुत ध्यान से जेनी के चेहरे पर बदलते भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। उसे इस छोटी सी बच्ची पर तरस आ रहा था। वरोनिका ने धीरे से जेनी को सम्बोधित किया तो वह चौंक गई।

"जेनी, मम्मी को नहीं मालूम ना कि आप आँटी से मिलने लिवरपूल जा रही हो?" जेनी ने रुआँसी सूरत से ना में सिर हिला दिया। साफ़ पता चल रहा था कि यह कितनी डरी हुई है।

वरोनिका को अब पूरा विश्वास होने लगा कि यह वही लड़की है जिसने दो तीन दिन पहले उसे फ़ोन किया था।

"आपके डैडी हैं जेनी?" वरोनिका ने कुछ सोचते हुए पूछा।

"मम्मी डैडी का बहुत पहले तलाक हो चुका है। डैडी बहुत अच्छे हैं। वह दूसरी शादी करके दुबई चले गये हैं।" फिर वह कुछ उदास हो कर बोली- "मुझे कोई प्यार नहीं करता, कोई नहीं चाहता। मम्मी हर समय डाँटती और मारती रहती हैं। कभी दूसरे बच्चों की मम्मी की तरह प्यार नहीं करतीं।" जेली आँखों में आँसू भर कर बोली। एक लम्बी साँस खींच कर उसने धीरे से कहा- "मम्मी के पास ब्वायफ़्रेंड है। वह मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। मालूम है वरोनिका आज मेरा जन्मदिन है। मैं पूरे ग्यारह साल की हो गई हूँ।"

"जन्म दिन मुबारक हो जेनी। अब तो आप बड़ी और समझदार हो गई हैं ना।" वरोनिका जेनी का डर हटा कर उसका विश्वास पाना चाहती थी। वरोनिका पक्का करना चाहती थी कि यह वही टेलीफ़ोन वाली लड़की है, जो वह उसकी कुछ सहायता कर सके।

"और क्या कहता है बेटे डेविड आपसे?" वरोनिका ने प्यार से पूछा।

"डेविड ने आज सुबह ही मुझसे कहा कि अब मैं बड़ी हो गई हूँ। वह मुझे एक ख़ास तोहफ़ा देगा जो हम दोनों की सीक्रेट बात होगी। अगर मैंने मम्मी को नहीं बताया तो वह और भी तोहफ़े देगा। मुझे उसके तोहफ़े नहीं चाहियें। वह गंदा है। मुझे हर्ट करता है," जेनी आँखों में आँसू भर कर बोली।

"आँटी से कब बात हुई थी आपकी जेनी?" वरोनिका की गम्भीर आवाज़ आई।

"आँटी नहीं जानती कि मैं आ रही हूँ," वह डरते हुए बोली।

"हूँ।" वरोनिका ने सोचा जैसे भी हो इसे उस डेविड जैसे दरिंदे से बचाना होगा। उससे बचने के चक्कर में यह किन्हीं और ग़लत हाथों में ना पड़ जाये। मुझे इस के लिये कुछ करना होगा और वो भी जल्दी। इस समय वरोनिका का पेशेवर दिमाग सोच रहा था।

गाड़ी तेज़ गति से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी। वरोनिका ने सोचा कि लिवरपूल पहुँचने से पहले ही उसे कुछ लोगों को सूचित कर के उन की सहायता लेनी होगी।

"जेनी कॉफ़ी पियोगी बेटा?"

जेनी सूनी आँखों से वरोनिका की ओर देख कर सोचने लगी- यह महिला कितनी अच्छी है। मेरी माँ ऐसी क्यों नहीं है। उसे सोच में देख कर वरोनिका ने कहा- "जेनी तुम मेरे सामान का ख़्याल रखना, मैं अभी कॉफ़ी ले कर आई।"

जेनी से दूर होते ही वरोनिका ने सोशलसर्विस को, फिर पुलिस को फ़ोन करके सारी सूचना दे दी। अगला स्टेशन लिवरपूल ही था। जेनी को इस सब के बारे में कुछ भी पता ना चला।

जैसे-जैसे लिवरपूल करीब आ रहा था, वैसे ही जेनी के दिल की धड़कन भी तेज़ होने लगी। यह सोच कर उसका दिल बैठने लगा कि वह लिवरपूल में किसी को भी नहीं जानती। अगर आँटी इस पते पर ना मिलीं तो.... अगर उन्होंने मुझे अपने घर रखने से इन्कार कर दिया तो क्या होगा। उसके पास तो इतने पैसे भी नहीं जो घर वापिस जा सके।

जेनी यही सोच कर परेशान होने लगी कि मम्मी वैसे ही उसे प्यार नहीं करतीं, अगर नाराज़ हो कर घर से निकाल दिया तो वह कहाँ जायेगी। घर रहती है तो डेविड के चंगुल से नहीं बच सकती। मम्मी डेविड से प्यार करती हैं। वह तो डेविड की झूठी बातों पर विश्वीस करके मुझे ही दोषी ठहरायेंगी। छोटी सी बच्ची और इतनी बड़ी सोच। जेनी का पूरा शरीर ज़ोर से काँप गया। डर से उसका गोरा रंग और भी सफ़ेद पड़ने लगा था।

वरोनिका जेनी के दिल की हालत समझ रही थी। वह एक औरत के साथ-साथ एक माँ भी है। बचपन में वह भी अपनों का शिकार हो चुकी है। कई बार घर में रहने वाले दरिंदे ही नहीं छोड़ते। मासूम सी बच्चियाँ डर और शर्म के मारे घर में किसी से कुछ नहीं कह पातीं।

वरोनिका ने प्यार से जेनी के कंधे पर हाथ रखा तो वह चौंक कर बड़ी मासूम नज़रों से उसकी ओर देखने लगी। इस समय वह ऐसे डरे हुए चिड़िया के बच्चे के समान लग रही थी जिस पर बिल्ली बस झप्पटा मारने ही वाली हो। जेनी की आँखों में वरोनिका को एक दर्द और भय दिखाई दिया जिसका कभी उसने भी अनुभव किया था।

वरोनिका बड़े प्यार से बोली, "घबराओ मत बेटा, सब ठीक हो जायेगा।" वरोनिका की सहानुभूति से भरपूर आवाज़ सुन जेनी सुबक कर रो पड़ी। वरोनिका ने उसका हाथ सहलाया तो वो तूफ़ानी पत्ते के समान काँप रहा था।

जेनी बड़ी उदास आवाज़ में बोली, "मुझे बहुत डर लग रहा है। मम्मी डेविड से क्यों शादी कर रही हैं। वह अच्छा आदमी नहीं है। मम्मी यह सब क्यों नहीं समझतीं।"

"हम आपकी मम्मी को समझायेंगे।" वरोनिका की बात सुन कर जेनी जल्दी से बोली- "नहीं, नहीं मम्मी मुझे बहुत डाँटेंगी कि किसी अजनबी के साथ मैंने घर की बात क्यों की। प्लीज़ आप उनसे कुछ मत कहियेगा।"

गाड़ी जैसे ही लिवरपूल स्टेशन पर रुकी जेनी अपना बस्ता सीने से लगाये गाड़ी से नीचे उतर कर इधर-उधर देखने लगी। वरोनिका उसके पीछे ही थी। जेनी जब और लोगों के पीछे आगे बढ़ने लगी तो पीछे से वरोनिका की आवाज़ आई- "ज़रा रुको जेनी।" वरोनिका की आवाज़ में एक ऐसा भारीपन था कि जेनी वहीं ठिठक गई और प्रश्न भरी नज़रों से वरोनिका की ओर देखने लगी।

इतने में दो महिलाओं ने आ कर वरोनिका को अपना परिचय दिया। ये एक सादा वर्दी में पुलिस की महिलाएँ थीं।

"सोशलसर्विस से कोई नहीं आया?" वरोनिका ने पूछा।

"जी, आज शुक्रवार है। हमें यही कहा गया है कि आप से ज़्यादा अच्छे तरीके से इसे कौन सम्भाल सकता है। अगर आवश्यकता पड़ी तो सोमवार को अपकी सहायता के लिये कोई आ जायेगा।"

"हूँ," वरोनिका ने कुछ सोचते हुए जेनी को सम्बोधित करते पुए कहा- "जेनी बेटा, तुम्हारे पास जो आँटी का पता है वो ज़रा दिखाना।"

जेनी थोड़ा घबरा गई तो वरोनिका उसके कंधे पर हाथ रख कर प्यार से बोली, "डरो मत जेनी। यह जो सामने महिला खड़ी हैं ना, यह पता लगा कर बतायेंगी कि तुम्हारी आँटी इस पते पर हैं कि नहीं। नहीं तो तुम अकेली यूँ ही इस अन्जान शहर में भटकती रहोगी।"

जेनी कुछ सोचने लगी तो वरोनिका आवाज़ में मिठास भर कर बोली- "मुझ पर विश्वास है ना जेनी। मैं तुम्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी, बस इतना यकीन रखना।"

जेनी कुछ ना बोली, सिर्फ़ वरोनिका की तरफ़ देखती रही। उसने चुपचाप आँटी का पता जेब से निकाल कर हाथ आगे बढ़ा दिया। जेनी मन ही मन सोचने लगी- मुझे वरोनिका पर विश्वास करना ही होगा। मैं वैसे भी लिवरपूल में किसी को नहीं जानती।

ये डेविड से बचते हुए अब मैं और किस मुसीबत में फंस गई हूँ। उसकी आँखों में बेबसी के आँसू भर आये।

वरोनिका का दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था। उसने कुछ सोचते हुए उनमें से एक पुलिस महिला से कहा, "चलिये, मैं और जेनी भी आपके साथ चलते हैं जेनी की आँटी

के पास।" फिर वरोनिका ने दूसरी पुलिस महिला की ओर देख कर कहा - "देखिये, आप किसी होटेल में एक डबल कमरा बुक करके हमें फ़ोन कर दीजिये।"

जो पता जेनी ने दिया था वहाँ पहुँच कर पुलिस महिला ने दरवाज़े पर लगी घंटी बजाई।

जेनी का दिल ज़ोर से धड़क रहा था। वह मन ही मन प्रार्थना करने लगीकि आँटी उसे रखने के लिये मान जायें। मगर हर सोचने वाली बात पूरी हो जाये तो इन्सान ना जाने क्या कुछ सोचने लगे।

घंटी की आवाज़ सुन कर किसी महिला ने दरवाज़ा खोला और हैरानी से देखने लगी।

"आँटी.....!" जेनी ख़ुशी से चीखी और आँटी के गले से लिपट गई।

आँटी घबरा कर बोली, "जेनी तुम....यहाँ सब ठीक तो है ना?"

जेनी रोते हुए बोली "आँटी मैं अपके पास रहने आई हूँ। मम्मी का ब्वायफ़्रेंड गंदा है। मैं वहाँ नहीं रहूँगी।"

"आप लोग अंदर आइए," आँटी ने गम्भीर आवाज़ में कहा।

घर के अंदर आ कर वह जेनी से बोलीं, "जेनी आप अंदर जा कर अपनी बेबी कज़न के साथ खेलो बेटा।"

वरोनिका ने जेनी के बारे में जितना जानती थी सब कुछ आँटी को बता दिया।

आँटी ने कुछ सोचते हुए गम्भीर हो कर कहा, "यह एक या दो हफ़्तों की बात होती तो मैं जेनी को हँस कर अपने पास रख लेती। देखिये, मेरे अपने भी तीन बच्चे हैं। मेरा पति इतना नहीं कमाता कि वह एक और बच्चे की ज़िम्मेदारी ले सके। फिर जेनी की माँ सूज़न, वो तो हमें चैन से नहीं रहने देगी। उसने मेरे भाई की ही ज़िंदगी नर्क बनाई हुई थी। मैं जेनी को प्यार करती हूँ। यह मेरे भाई की बेटी है। बट आई एम सॉरी। मैं यह कमिटमैंट नहीं ले सकती। हमें सूज़न से दुश्मनी बहुत महँगी पड़ेगी।"

आख़िर जिस बात का वरोनिका को डर था, वही हुआ। साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि जेनी की आँटी उससे प्यार करती है। वह शायद उसे अपने पास रख भी लेती, मगर वह उसकी माँ सूज़न से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती। इस सब के बीच में बिचारी जेनी पिस रही थी। जब माँ बाप किसी कारणवश अलग हो जाते हैं, उनकी आपस में नहीं बनती तो उसका असर सबसे अधिक बच्चों पर होता है। कभी-कभी तो यह मासूम बच्चे माँ-बाप के अलग होने में स्वयं को दोषी समझने लगते हैं और बड़ों के समाज में यह नन्हे दिमाग उलझ के रह जाते हैं।

जेनी की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। वह सोचने लगी कि घर तो छोड़ आई है, अब इतने बड़े जहान में वह कहाँ जायेगी। जेनी ने मन ही मन तय कर लिया कि वह मर जायेगी मगर जिस घर में डेविड जैसा दरिंदा रहता है वहाँ हरगिज़ नहीं जायेगी।

मायूस सी जेनी आँटी के घर से बाहर आई। वरोनिका की तरफ़ आँसुओं भरी नज़रों से देख कर कहा, "थैंक्यु वरोनिका। और अपना बस्ता सीने से लगाये चलने लगी।

"कहाँ जा रही हो जेनी?" वरोनिका ने रोकते हुए पूछा।

"पता नहीं," जेनी ने पलकें ढुकाए रुआँसी आवाज़ में कहा।

जेनी को उदास और खोई सी देख कर वरोनिका को उस पर बहुत तरस आ रहा था। इस समय इस छोटी सी बच्ची को माँ की गोदी की सख़्त ज़रूरत थी। वरोनिका भी एक माँ है। उसका जी चाह रहा था कि बढ़ कर इस मासूम को गले से लगा ले। वह प्यार से बोली---

"जेनी, देखो बेटा, इसे किसी प्रकार का दबाव नहीं समझना मैं सोशलसर्विस में एक ऊँची पदवी पर काम करती हूँ। मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है कि तुम्हारी मुलाकात किसी ग़लत इन्सान से ना हो कर मुझ से हुई है। मेरी एक बेटी है जो शादी के बाद अपने घर में रहती है। मैं अपने छोटे से घर में बस अकेली रहती हूँ। तुम जब तक चाहो मेरे साथ मेरे घर रह सकती हो। यहाँ तुम्हें किसी तरह की भी तकलीफ़ नहीं होगी, और ना ही किसी डेविड जैसे शैतान का ख़तरा। अगर चाहोगी तो हम तुम्हारे लिये कोई अच्छा सा ज़रूरतमंद परिवार ढूँढ लेंगे, जहाँ बच्चों की कद्र हो। तुम्हें भी तुम्हारे हिस्से का प्यार मिलना चाहिये बेटा।"

जेनी वरोनिका की बातें सुन कर सुबकती रही। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। वरोनिका भी उसके लिये अजनबी है। अब अगर वह यहाँ से भागे तो कहाँ जाये। इतने बड़े जहान में कोई भी तो नहीं जिसके गले लग कर वह रो सके। ङर कर उसने ख़ुद को तकदीर के हवाले कर दिया...। बेबसी उसकी आँखों से बरस रही थी।

कहते हैं ना कि जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है। वह अपने बच्चों के लिये कोई ना कोई रास्ता खोल ही देता है। वरोनिका जेनी को ले कर होटेल में चली गई। होटेल में आने से पहले वरोनिका ने एक महिला पुलिस से कह दिया था कि जेनी की मम्मी और उसके ब्वायफ़्रेंड को होटेल में आने का संदेश भेज दो।

उधर जेनी जब स्कूल से घर नहीं आई तो सूज़न को चिंता होने लगी। उसे अब ख़्याल आया कि जेनी कुछ दिनों से परेशान सी भी लग रही थी। फिर स्वयं ही इस विचार को दिल से निकाल दिया यह कह कर कि इस आयु में लड़कियों के साथ ऐसा होना स्वभाविक होता है।

डेविड अपने तरीके से परेशान था। उसने सोचा भी नहीं था कि जेनी जैसी सीधी-सादी लड़की कभी घर छोड़ कर भी भाग सकती है। जेनी अपनी ज़ुबान खोले, उससे पहले उसे जेनी को ढूँढना ही होगा। वह ज़रूर यहीं कहीं इसी शहर में होगी।

डेविड को घर में घुसते देख कर सूज़न ने कहा, "डेविड, अभी तक जेनी नहीं आई। क्या तुम्हारे साथ उसकी कोई बात तो नहीं हुई जब तुम उसे स्कूल छोड़ने जा रहे थे?"

"नहीं सुबह तो वह बहुत ख़ुश थी जब मैंने उससे कहा कि आज उसे हम एक बहुत बड़ा बर्थ-डे सरप्राइज़ देने वाले हैं।"

"तो फिर वह कहाँ गई? लगता है हमें पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ेगी," सूज़न बोली।

"नहीं, नहीं।" डेविड ने जल्दी से कहा- "पुलिस को कुछ भी कहने की ज़रूरत नहीं है। मैं अभी उसे ढूँढ कर लाता हूँ।"

डेविड उल्टे कदमों फिर घर से बाहर चला गया।

सूज़न सोचने लगी कि जेनी इसकी कुछ नहीं लगती फिर भी यह उसका कितना ख़याल रखता है। उधर जेनी है कि इस से सीधे मुँह बात ही नहीं करती।

डेविड को अपनी जान की पड़ी थी, इस लिये उसने सूज़न को पुलिस में जाने के लिये मना किया था। उसका शैतान दिमाग सोच रहा था कि अगर जेनी मिल गई तो वह उसे अपनी कैद में रखेगा, और ऐसी जगह छुपायेगा जहाँ किसी को उसका निशान तक ना मिल सके। जेनी सिर्फ़ मेरी है। उसे मुझ से कोई नहीं छीन सकता, पुलिस भी नहीं।

डेविड के मोबाइल की घंटी बजी तो उसके ख़्यालों को झटका लगा।

"हैलो डेविड, जेनी का पता चल गया है," दूसरी ओर से सूज़न की आवाज़ आई - "वो लिवरपूल में है। अभी वहाँ जाना है उसे लेने के लिये। आप कहाँ हो, जल्दी घर आओ," सूज़न एक साँस में सब कुछ कह गई।

चाहे सूज़न बेटी को डाँटती हो, प्यार ना करती हो मगर है तो उसकी माँ ही। कभी तो बेटी के दर्द से मन में तकलीफ़ होती होगी।

जेनी की मम्मी अपने ब्वायफ़्रेंड डेविड के साथ लिवरपूल में बताये हए पते पर पहुँचीं।

जेनी को देखते ही डेविड की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं, जो वरोनिका से छुपा ना रह सका।

"जेनी माई डार्लिंग," डेविड आगे बढ़ा जेनी को गले से लगाने के लिये। जेनी सहम कर वरोनिका के पीछे हो गई। यह देख कर सूज़न को अच्छा नहीं लगा। जो थोड़ी देर पहले बेटी के लिये प्यार दिल में उमड़ रहा था उसकी जगह गुस्से ने ले ली और वह तुनक कर बोली---- "देखा एहसान फ़रामोश को। मैं जानती थी यह लड़की कुछ ना कुछ गुल ज़रूर खिलायेगी," फिर उसने सब की तरफ़ देख कर ज़ोर से कहा - "डेविड इस का बाप ना हो कर भी इसे कितना प्यार करता है। यह तो पैदा ही हमारा ख़ून पीने के लिये हुई है। दूसरी तरफ़ इस का बाप है जिसने इसे कभी प्यार ही नहीं किया।"

"यह सच नहीं है, डैडी मुझसे बहुत प्यार करते थे। यह तो आप उनसे लड़ती रहतीं थी और ना जाने क्या झूठी बातें करके उनका दिल दुखाती रहती थीं कि मैं उनकी बेटी नहीं हूँ," जेनी रोते हुए बोली।

"प्यार करता होता तो मेरे सिर अपनी मुसीबत पटक कर ना जाता," जेनी की माँ तुनकती हुई बोली।

"चल बहुत तमाशा हो चुका। डेविड तेरे लिये कितना परेशान था। घर चल, मैं तुझे घर से भागने का मतलब समझाती हूँ," माँ हाथ पकड़ कर जेनी को अपनी ओर खींचने लगी।

जेनी ने झटके से हाथ माँ के हाथ से छुड़ाया और रो कर बोली - "मैं आप लोगों को नहीं जानती। आप यहाँ से जा सकते हैं," और दूर जा दीवार की ओर मुँह कर के सिसकने लगी। डेविड यह सब देख कर प्यार से जेनी की ओर बढ़ने लगा तो एक पुलिस महिला ने उसे वहीं रोक कर कहा- "आप ने शायद सुना नहीं कि जेनी ने क्या कहा है... आप जा सकते हैं।"

"अरे ऐसे कैसे जा सकते हैं। जेनी मेरी बेटी है। वह अभी नाबालिग है। मेरी मर्ज़ी के बिना वह कुछ नहीं कर सकती। ऩा जाने आप लोगों ने उसके छोटे से दिमाग में क्या भर दिया है। मैं अभी इसे ले कर जा रही हूँ। आप होते कौन हैं मेरी बेटी को रोकने वाले," सूज़न गुस्से से बोली।

एक पुलिस की महिला ने अपना आइडेंटिटी कार्ड निकाल कर सामने कर दिया। कार्ड पर नज़र पड़ते ही डेविड के चेहरे का रंग उड़ गया। सूज़न भी सकते में आ गई। मगर वह ख़ुद को सम्भाल कर बोली, "आप किस जुर्म में मेरी बेटी को यहाँ रोक रहे हैं?"

डेविड ने जल्दी से आगे बढ़ कर कहा, "हाँ, हाँ सूज़न ठीक कह रही है। आप ज़बरदस्ती जेनी को यहाँ नहीं रोक सकते।"

वरोनिका, जो अब तक चुप खड़ी थी, धीरे से आगे आ कर बोली, "देखिये मैं एक सोशलवर्कर हूँ और ये दोनों पुलिस आफ़िसर्स हैं। जेनी ने हमें सब कुछ बता दिया है। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि हम क्या कर सकते हैं.... क्यों मिसेटर डेविड?"

"चलो सूज़न, इनसे बहस करने का कोई फ़ायदा नहीं। हम घर जा कर ही कुछ करेंगे।" डेविड सूज़न का हाथ पकड़ कर वहाँ से जाने लगा तो पीछे से आवाज़ आई - हम जल्दी ही आ कर आपसे मिलेंगे मिस्टर डेविड।

वरोनिका ने रोती हुई जेनी के आँसू पोंछे। वह सिसकियाँ भरते हुए उसके गले से लग कर बोली, "वरोनिका, देखो मम्मी मुझे छोड़ कर चली गईं।"


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें