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| 05.31.2008 |
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दूर से आए थे साक़ी सुन के मैख़ाने को हम |
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दूर से आए थे साक़ी सुन के मैख़ाने को हम मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं हम को फ़सना था कफ़ज़ में क्या गिला सय्याद का बाग़ में लगता नहीं सहरा में घबराता है दिल क्या हुई तक़सीर हमसे तू बता दे ऐ ”नज़ीर” |
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