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| 02.07.2009 |
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ये कौन दे रहा है यूँ दस्तक़ |
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ये कौन दे रहा है यूँ दस्तक़ मेरे टूटे दरवाज़े पर,
जैसे कोई टूटे सितार पर नया सुर छेड़े जाता है, यूँ महक उठा है मेरा वीरान आशियाना, साक़ी, कि कोई ग़ैर तूफ़ान में दीया जलाये जाता है। ज़िन्दगी, तुमने भी क्या ख़ूब साथ निभाया है, वक़्त है कि बेवक़्त ही हमारा साथ छोड़े जाता है, ग़म है कि दिल ने अर्ज़ करने की गुस्ताख़ी की, मेरे ज़ख़्मी बदन पर नये ज़ख़्म छोड़े जाता है। जब तुम ग़ैर थे तब ज़िन्दगी क्या ख़ाक बुरी थी, तेरी पनाह में कोई मेरा संसार उजाड़े जाता है, दिल की आवारग़ी ने जीना सीखा दिया है, साक़ी, हर साँस में दिल अपना दामन छुड़ाये जाता है। जीने की चाह रखते हैं दूर तक फैले सहरा में भी, पत्थरों से रौशन शहर में कोई साँस छीने जाता है, उपरवाले तेरी रहनुमाई से यूँ मिट गया “नवल”, अब तो अपना साया भी मुझसे मुँह चुराये जाता है। |
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