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05.03.2012
 

सूखे पत्ते
नवल किशोर कुमार


सूखे पत्ते,
टूट रहे हों जैसे,
हम भी तो हो रहे हैं दूर
अपनी मिट्टी से
अपने जड़ों से
एक अनजानी
कभी पूरी न होने वाली
इच्छाओं के पीछे
बिना यह सोचे
कि हमारा भविष्य क्या होगा
हमारा अस्तित्व क्या होगा
चले जा रहें हैं बस
बिन मंज़िल का मुसाफ़िर बन
एक ऐसे रास्ते पर
जो कहीं खत्म नहीं होता
कभी सोचता हूँ
क्या यही सपना है
जो देखा था कभी
मेरे और तुम्हारे
पूर्वजों ने हमारे लिए
हमारे बेहतर कल के लिए !


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