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05.03.2012
 

मानव
नवल किशोर कुमार


मैं मानव,
पंचतत्वों से बना,
एक निरीह प्राणी।

आदि से लेकर अंत तक
कर्मों का बोझ ढोता,
मैं मानव,
एक निरीह प्राणी।

देश, समाज, संस्कार
और भी न जाने कितने,
बंधनों में जकड़ा,
मैं मानव,
एक निरीह प्राणी।

कभी स्वयं को मिटाकर,
सृष्टि के नवनिर्माण का,
दम भरने वाला,
मैं मानव,
एक निरीह प्राणी।

वक्त के थपेड़ों को,
अपने तन पर सहता,
अपने ही हाथों,
अपना समूल नष्ट करने को आतुर,
पाखंड से पीड़ित,
मैं मानव,
एक निरीह प्राणी।


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