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05.03.2012
 

क़िस्मत
नवल किशोर कुमार


पूनम की रात में,
जब खिला हो चाँद,
अपने पूरे आकार में,
उसकी मद्धिम रजत ज्योति से,
चहक जाती है धरती,
जगमगा उठता है आसमान,
और उस पर काले बादलों की,
स्याह परछाई से खिल उठता है,
धवल चेहरा उसका।

कभी नाज़ आता है,
बादल की क़िस्मत पर,
कितना मोहक है ये,
रूप इस स्याह का,
ज्यों रजतमुखी श्यामवर्णा ने ओढ़ ली हो,
स्वर्णमयी सुनहरी चादर,
और तब बिखरती है,
एक अनोखी छटा इस धरती पर।

कभी ईर्ष्यावश चित कहता है,
रुक जाओ बादल,
अब हमारी बारी है,
है अरमान हमारा भी,
चाँद की परछाई बन,
उसके मुख का शृंगार बनें,
सौंप निज अस्तित्व उसे,
उसके गले का हार बनें।

कभी मन विचारता है,
वह ले नहीं सकता जगह,
हवा में बहते बादलों की,
क्योंकि वह तो मानव है,
नहीं उगे हैं पर उसके,
जो स्वच्छदंता से उड़ सके,
ऐसे भी हम मानवों ने,
कतर रखे हैं पर अपने,
ताकि हम बादल न बन सकें,
आजीवन मनुष्य बन,
अतृप्तता का पर्याय बन सकें,

असंख्य प्रश्नों को,
हृदय में आत्मसात कर,
रवाना हो सकें उस ओर,
जहाँ चाँद खिलता है हमेशा,
अपने पूरे आकार में,
और तब शायद हम सक्षम हों,
अवारा बादलों को हटा,
चंद्रमुख को निहार सकें,
तब तक चाँद को यूँ ही,
देखते रहना हमारी क़िस्मत है,
वक़्त के आगे घुटने टेक,
ग़ुलामी करना हमारी फ़ितरत है।


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