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| 04.14.2008 |
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ख़्वाहिशें |
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तन कठोर और हृदय में, देखते हैं लोग उसे अक्सर ही, देखती है वह सपने अनेक, काश वह भी सीता होती, जाने नियति कहाँ ले जायेगी, |
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