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05.03.2012
 

जीवन मेरा सजीव है प्रिये
नवल किशोर कुमार


मन उपवन में खिलते हैं
अरमानों के नये-नये फूल,
तुम्हारे केशुओं के साये में
जीवन मेरा सजीव है प्रिये।

सुख-दुख के राहों से चलकर,
आ पहुँचा हूँ पास तुम्हारे,
तुम्हारे आँचल की घनी छाँव में,
मेरी सुबह औ शाम है प्रिये।

सुंदरता का नहीं ज्ञान मुझे,
मेरे मन मंदिर की देवी तुम,
तुम्हारे मन के आँगन में,
मेरा आजीवन वास है प्रिये।

तुम संग हो तो खुबसूरत है,
ये पर्वत, नदियाँ और नजारे भी,
तुम्हारी झील सी आँखों में,
बसे हैं मेरे सपने प्रिये।

हम पर्याय हैं एक दूजे के,
दो बदन एक जान हैं हम,
तुम्हारी साँसों की खुश्बू से,
महका है मेरा संसार प्रिये।

मोक्ष नहीं है चाहत मेरी,
ना ही स्वर्ग की कामना है,
तुम्हारे बाहों के घेरे में,
निकले मेरा प्राण प्रिये।


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