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| 07.13.2008 |
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हे धर्मराज, मेरी गुहार सुनो |
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जीवन की गोधूलि बेला में, बचपन सुहाना, पथरीली जवानी, गाँव की हरी-भरी वादियों में, पत्थरों के रोशन इस मरूस्थल में, मुक्त करो इस कृत्रिमता से |
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