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05.03.2012
 

चूहे
नवल किशोर कुमार


कुछ चूहे मेरे घर में कायरों की तरह,
मुझसे आँखें चुराकर,
मेरी अनुपस्थिति में घुस आते हैं।
कभी मेरी किताबों पर,
कभी रसोई में बचे रोटियों के ढेर पर,
पूरी रात धमाचौकड़ी मचा लेने के बाद,
सुबह होने के पहले ही ओझल हो जाते हैं।
मैं हर बार अपनी आँखों से,
उन्हें अपने कपड़े काटते देखता हूँ,
लेकिन, मेरी भी एक मजबूरी है,
मेरे घर में वे धार्मिक प्रतीक कहे जाते हैं।
जी कहता है कभी उन्हें,
तोपों से बिलों समेत मिटा दूँ,
वह जो उन्हें भेजता है साजिश के तहत,
उनका नामोनिशान मिटा दूँ,
लेकिन पुनः सोचता हूँ,
जब तोपें चलेंगी तो,
अपने घर की दीवारें भी गिरेंगी,
क्योंकि कुछ चूहों के बिल,
अपने घर में ही मौजूद हैं,
जिनके सहारे वे वे मेरे घर तक आते हैं।
धर्म के नाम पर,
मेरे घर का सुख छीनने वाले ये चूहे,
जिन्हें मैं रोज अपनी आँखों से देखता हूँ,
ऐसा नहीं कि मेरा रक्त अब नीर बन गया,
या मेरा साहस वामी हो गया है,
अग्नि और त्रिशूल की धार तो तीक्ष्ण है,
पर सच तो यह है कि,
मेरे घर का मुखिया ही बेपानी हो गया है।


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