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| 02.24.2008 |
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अब नहीं देखता ख़्वाब मैं रातों को |
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अब नहीं देखता ख़्वाब मैं रातों को,
रातों में पलकें झपकाना भी भूल गया। दिये हैं जालिम तुमने ज़ख़्म इतने कि, ज़ख़्मों पर अब मरहम लगाना भूल गया। वक़्तो गुज़र जाता है तन्हां इस कदर कि, बीते वक़्तत का हिसाब लगाना भूल गया। तेरी बेवफ़ाई के सहारे ज़िन्दा हूँ या नहीं, ज़िन्दगी के अंतिम साँसें लेना भूल गया। ग़म नहीं है मुझे कि तेरी बेवफ़ाई मिली, तेरी बेवफ़ाई से प्यार का नाम भी भूल गया। यूँ इस कदर जमींदोज़ होने का मलाल नहीं, मैं तो अपनी क़ब्र पर फूल तक चढ़ना भूल गया। |
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