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ISSN 2292-9754

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05.27.2017


डेनमार्क की हिन्दी लेखिका अर्चना पैन्यूली के उपन्यास "वेयर डू आई बिलांग" का साहित्यिक मूल्यांकन

"प्रवासी हिन्दी साहित्य" का इतिहास बहुत लम्बा है। इस कारण यहाँ साहित्य सृजन कर रहे साहित्यकारों की सूची भी काफ़ी लम्बी है। ये प्रवासी साहित्यकार भारत के भिन्न-भिन्न राज्यों से विश्व के अलग-अलग देशों में गए हैं, ज़्यादातार प्रवास उत्तर भारत से हुआ है। इन प्रवासी साहित्यकारों में से कुछ तो भारत में ही लेखन के कार्य से जुड़े हुए थे व कुछ वहाँ की परिस्थितियों व परिवेश से प्रभावित होकर साहित्य लेखन से जुड़ गए। प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों की सूची में अर्चना पैन्यूली का अपना विशेष स्थान है। इनका जन्म कानपुर, उत्तर-प्रदेश में हुआ। तदुपरांत, परिवार के देहरादून बस जाने से शिक्षा-दीक्षा देहरादून में हुई। इनके माता-पिता मूलतः गढ़वाल (हिमालय पर्वतीय क्षेत्र) के निवासी थे। 1997 में डेनमार्क आईं और यहाँ एन.जी.जी. इंटरनेशनल स्कूल में शिक्षण का कार्य करने लगी।

इनका उपन्यास "परिवर्तन" एक साधारण-सी ग्रामीण महिला रत्ना की कहानी है, जो उत्तरांचल में रहती है। 13 साल की छोटी आयु में रत्ना की शादी कर दी जाती है। उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है कि जब वह मात्र 18 साल की होती है तो उसके पति की मृत्यु हो जाती है। रत्ना के पास एक बेटी है। यह उपन्यास रत्ना के जीवन-संघर्ष की दास्तान है। पति की मृत्यु के पश्चात उसका जीवन कठिनाइयों से भर जाता है; बच्ची का पालन-पोषण केवल उसकी ज़िम्मेवारी है। वह पहाड़ों को छोड़ मैदानी इलाक़े में आ जाती है। उसके जीवन में परिवर्तन आता है। जब उसका परिवेश बदलता है तो उसकी सामाजिक दशा भी बदलती है और बाद में उसकी पीढ़ियों में भी ज़बरदस्त बदलाव आता है तथा वे अपने पहाड़ों को भूल जाते हैं। यह सारा बदलाव ही परिवर्तन की कहानी है। "रत्ना" के जीवन के माध्यम से लेखिका ने पहाड़ की महिलाओं के जीवन-संघर्ष को, उनके परिश्रम व कठिन दिनचर्या को अपने उपन्यास में चित्रित किया है। आजीविका की पूर्ति के लिए अधिकांश पुरुषों को यहाँ की चोटियों से नीचे उतरकर मैदानों का मार्ग पकड़ना पड़ता है। पुरुषों के पलायन के पश्चात जीवन की बागडोर घर की महिलाओं को सँभालनी पड़ती है। खेतों में अनाज उगाना, लकड़ी काटना, पशुपालन करना आदि रोज़मर्रा ज़िंदगी के सभी अनिवार्य कार्य महिलाओं को करने पड़ते हैं। "परिवर्तन" उपन्यास इन सभी संघर्षों की कहानी बयान करता है।

वहीं पैन्यूली का दूसरा उपन्यास "वेयर डू आई बिलांग" विस्थापन, प्रवास, संस्कृति-भेद, आधुनिकता व पारम्परिक जीवन-मूल्यों के प्रश्नों को तलाश करता है। इस उपन्यास की कहानी एक प्रवासी भारतीय रीना को केन्द्र में रख कर लिखी गई है। डेनमार्क में रहने वाली रीना जेनेटिक इंजीनियरिंग की छात्रा है और संसार के विषय में व्याप्त धारणाओं की थाह लगना चाहती है। इसी क्रम में वह भारत आकर अपने पूर्वजों के देश से परिचित होती है। रीना आत्मीयता, अन्तरंगता और आत्मस्वीकृति के कई आयाम देखती है। अर्चना के शब्दो में, "प्रेम चाहे कितना ही असीम व अनन्त क्यों न हो, सब कुछ जीत नहीं सकता। किसी भी रिश्ते को बनाने के लिए मन की भावनाओं के अलावा कई अन्य तथ्य इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें उपेक्षित नहीं किया जा सकता"। यह उपन्यास संस्कृतियों के संघर्ष की कहानी अपनी तरह से विकसित करता है। दो संस्कृतियों में रहने के कारण प्रवासियों को अक्सर सांस्कृतिक द्वन्द्व के दौर से गुज़रना पड़ता है। वे किस संस्कृति को अपनाएँ, किसे ना अपनाएँ। इस द्वन्द्व का शिकार ज़्यादातर नई पीढ़ी होती है। वे अपने माता-पिता को ख़ुश करने के लिए जहाँ भारतीय संस्कृति के अनुकूल आचरण करते हैं, वहीं अपने कार्यक्षेत्र स्कूल, कॉलेज आदि में पाश्चात्य परिवेश के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करते हैं। उपन्यास की नायिका रीना कहती है कि, "हमें स्कूल या संस्थानों में भिन्न वातावरण मिलता है, जबकि हमारे पेरेंट्स हमसे भिन्न व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। बच्चे अपने पेरेंटस को कभी भी निराश नहीं करना चाहते। मेरी समझ से हर सन्तान अपने माता-पिता की एक अच्छी सन्तान बनना चाहती है। मगर हमें अपने कॉलेज या ऑफ़िस के वातावरण से भी तालमेल बैठाना पड़ता है। इसलिए दो विपरीत संस्कृतियों से हमें जूझना पड़ता है।"1

प्रवासी भारतीय एक ओर अपने पूर्वजों की संस्कृति (भारतीय संस्कृति) का अनुसरण करना चाहते हैं, तो वहीं दूसरी ओर, उन्हें डेनिश संस्कृति में रहते हुए उसके साथ भी तालमेल बिठाना पड़ता है। इस प्रकार दोहरी संस्कृतियों के बीच जीवन व्यतीत करना एक बड़ी समस्या बन जाता है। घर के बड़े चाहते हैं कि उनके बच्चे भी भारतीय संस्कृति के अनुसार आचरण करें, लेकिन, डेनिश संस्कृति में पले-बढ़े बच्चों को यह सही नहीं लगता- "शांडिल्य - शर्मा परिवार ने अपने घर का वातावरण चाहे कितना ही रूढ़िवादी बना रखा हो, शहर का वातावरण स्वच्छन्द था। अगर वे सोचते थे कि इसका प्रभाव उनके बच्चों पर नहीं पड़ेगा तो वे गलत थे। रीना सारे डेनिश नियम, सामाजिक प्रचलन व कायदों से भिज्ञ थी। जो वह नहीं समझ पायी थी कि वह यह कि क्यों उसके माता-पिता व नाना-नानी उससे उस आचरण की उम्मीद करते हैं जो उसका परिवेश उसे सीखने का अवसर नहीं देता।"2 इस सांस्कृतिक टकराव की वजह से अधिकतर प्रवासी भारतीयों को पारिवारिक कलह, झगड़ों व अन्तर्द्वन्द्व से गुज़रना पड़ता है।

उपन्यास डेनमार्क के प्रवासियों के जीवन से संबंधित है। इसके माध्यम से लेखिका ने बताया है कि इस देश में प्रवासियों के लिए न केवल सुविधाओं को कम कर दिया गया है बल्कि उनके लिए सख़्त नियम भी बना दिए गए हैं- "स्थायी निवास की अनुमति जो पहले किसी अप्रवासी को यहाँ तीन वर्ष के निवास के बाद मिल जाती थी, अब वह अवधि बढ़ा कर सात वर्ष कर दी गयी है। पहले लोग अपने देशों से अपने पारिवारिक लोगों को यहाँ आसानी से बुला सकते थे, अब नियम बहुत सख़्त हो गये हैं। डेनिश नागरिकता हासिल करने के लिए यहाँ कम-से-कम नौ वर्ष का निवास काल चाहिए। उसे डेनिश भाषा अच्छी तरह आनी चाहिए।... और डेनिश संस्कृति एवम् इतिहास की परीक्षा भी पास करनी पड़ेगी।"3 उपन्यास में अकेलेपन की समस्या को भी उठाया गया है। लगभग प्रत्येक प्रवासी को किसी न किसी रूप में अकेलेपन की समस्या का सामना करना पड़ता है। अजनबी परिवेश में व अनजान लोगों के बीच वह अपने-आप को एकदम अकेला महसूस करता है। कई बार तो व्यक्ति अपने परिवार में रहता हुआ भी स्वयं को अकेला ही पाता है। उसे लगता है कि उसके लिए किसी के पास समय ही नहीं है। उपन्यास में एक पात्र गोविन्द प्रकाश अपने अकेलेपन में भारत को, वहाँ अपने रिश्तेदारों आदि को याद करता है- "कभी-कभी गोबिन्द प्रकाश बहुत ही अकेलापन व उदासी महसूस करते। यहाँ भाई-बहन नहीं, रिश्तेदार नहीं। मुट्ठी भर के मित्र जिनसे मित्रता एक हद तक ही घनिष्ठ हो पाती थी। बिना औपचारिक निमन्त्रण के कोई किसी के घर नहीं जाता। जैसे-जैसे उमर बढ़ रही थी औपचारिक निमन्त्रण मिलने कम होते जा रहे थे। अब बिरले ही कोई उन्हें अपने घर बुलाता। कोई बिरला ही उन्हें फोन करता।"4

अर्चना पैन्यूली ने अपने उपन्यास के माध्यम से नारी जीवन के संघर्ष, उसकी कठिनाईयों का भी मार्मिक चित्रण किया है। इनके उपन्यास में अनेक स्त्री-पात्र हैं। सभी किसी-न-किसी प्रकार की समस्या और परेशानी से जूझते नज़र आते हैं। उपन्यास की नायिका रीना प्रवासी भारतीय परिवार से संबंध रखती है। उसके जीवन में आने वाले दो भारतीय युवक किसी न किसी प्रकार से उसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं। उसके जज़्बातों के साथ खेलते हैं; अपना काम निकलवाने के लिए उसका प्रयोग करना चाहते हैं। जहाँ हरि उससे शादी कर के डेनमार्क में स्थायी रूप से रहना चाहता है, वहीं राधेश पढ़ी-लिखी रीना की नौकरी के माध्यम से अपनी आर्थिक हालत में सुधार करना चाहता है। इसके लिए चाहे उन्हें दो अलग-अलग शहर में ही क्यों न रहने पड़े, लेकिन, यह दूरियों भरा रिश्ता रीना को मंजूर न था- "एक अजीब ख्याल यह भी उसके मस्तिष्क में कौंध रहा था कि कहीं राधेश पैसों के लिए तो उससे शादी नहीं करना चाहता।... सम्भवतः एक कमाऊ बीबी उसके आर्थिक दबाव का कुछ भार अपने कन्धों पर ले ले। वह उसे उन हिन्दुस्तानी आदमियों की तरह लगने लगा था जो पढ़ी-लिखी व कमाऊ पत्नी चाहते हैं और साथ ही उनसे यह अपेक्षा भी करते हैं कि वे पारम्पारिक भूमिकायें निभायें।"5 उपन्यास में स्टेफेनी एक विदेशी नारी पात्र है लेकिन उसके जीवन की यह त्रासदी है कि उसने दो बार शादी की और दोनों बार शादी सफल न हो सकी तथा बात तलाक़ पर आकर ख़त्म हो गयी। वह पुनर्विवाह करने के बाद फिर से अकेली हो गयी- "उसे रोते देख स्मिता का भी दिल पसीज गया था। सोचने लगी थी कि भले ही कोई कितनी ही विलासिता में रहे। किसी का जीवन कितना ही सुविधामय हो, सुख की गारंटी तो कहीं भी नहीं। और विवाह विच्छेद व पुनर्विवाह भले ही किसी राष्ट्र में अति सामान्य समझा जाये मगर विच्छेद की वेदना हर हाल में एक सी होती है।"6 इस प्रकार की ही अनेक समस्याओं का चित्रण उपन्यास में किया गया है; जिनसे नारी पात्र संघर्ष करते हैं।

कुल मिलाकर हम "वेयर डू आई बिलांग" उपन्यास के संबंध में कह सकते हैं कि इसमें प्रवासी भारतीयों के जीवन-संघर्ष, उनके अर्न्तद्वंद्व, संस्कृतियों के टकराव, उनके भय-चिंताएँ, नारी जीवन के संघर्ष, टूटते-बिगड़ते रिश्ते और इमिग्रेशन संबंधी मुद्दे जैसी समस्याओं को लिया गया है।

ंदर्भ सूची :

1. अर्चना पैन्यूली, वेयर डू आई बिलांग, नई दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, 2010, पृ. 307.
2. वही, पृ. 216.
3. वही, पृ. 84.
4. वही, पृ. 115.
5. वही, पृ. 374.
6. वही, पृ. 277.

डॉ. नवनीत कौर
पुत्री स. शेर सिंह,
गांव- यारी, डाकखाना- डीग,
शाहबाद (मा.), जिला कुरूक्षेत्र (हरियाणा) 136135
फोन नं.- 09468365633


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