नवीन विश्वकर्मा
गुमनाम पिथौरागढ़ी

दीवान
आपसे जब दोस्ती होने लगी
काबा कलीसा न कोई शिवाला है
चाँद सूरज देख के ललचाते हैं
ज़िन्दगी इक सराब हो जैसे
तुमने पुरखों की हवेली बेच दी
नेता में खोट है
यूँ जब-जब शबनम रोती है
सच कहेगा