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ISSN 2292-9754

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12.15.2018


ठण्ड से बैकुण्ठ तक

तीर की तरह चुभते जाड़े के ठंडे थपेड़े
और धूप के संग-संग
कुर्सी सरकाते घर के बूढ़े-बड़े

मेरे घर के सामने एक तिकोना पार्क है
एक महीने से वहाँ सफ़ेद टैंट झूल रहा है
हर दूसरे दिन तीये की बैठक होती है
और लाउडस्पीकर गरुड़ पुराण बोल रहा है
ये शीतलहर बहुतों को उम्र पार कराती है
वेटिंग वालों की भी तत्काल में
टिकट कन्फ़र्म हो जाती है
गृहस्थ में उलझे श्रवण कुमार
भूल गए बाऊजी हैं बीमार
छत पर खाट को धूप दिखाई
खाट पे गद्दे और गद्दे पर रजाई
इन के ही बीच में रखने थे बाउजी
बस ये ही बात याद न आई
खैर बाउजी ये सर्दी खेंच ना पाये
और तीये के दिन भर-भर लोग आये
बाउजी इतनी भीड़ उठावने से पहले देख लेते
तो अर्थी से उठकर बैठ जाते
दोनों हाथ बेंत पर रक्खे
फिर कोई क़िस्सा सुनाते
इतनी इम्पोर्टेंस जीते जी मिलती
तो दो-चार बरस और जी जाते
शायद तीये की बैठक में बाउजी तो मिलेंगे नहीं
इसीलिए सब आ गए
पाँच मिनट बैठेंगे और फ्री...
जीते जी कौन आता है?
वैसे भी उनके कमरे से
अजीब सी बूढ़ों वाली बू आती थी
दस मिनट बैठा ना जाता था.....
वो होते तो बहु-बेटियों को अंदर भेज देते थे
और बच्चों को ज़बरदस्ती रोक लेते थे
बरामदे में पंचायत लगती
और उनका भूरा बटुआ
बेचैनी में बार-बार खुलता
और नाती-पोतों के लिए
हर बार कोई नोट निकलता
खैर...
बटुआ दबा ही रह गया
कोई आता ही नहीं था
उनकी रूह अब भी बच्चों की फ़िक्र कर रही थी
कफ़न के नीचे भी बेचैनी बढ़ रही थी
मगर जाने सबको क्या जल्दी थी
जल्दी अर्थी उठाओ,
जल्दी पैर चलाओ
फ़ुर्ती से डालो लकड़ी
और जल्दी आग लगाओ
जलते-जलते बाउजी सोच रहे थे
ये तो सब पहले से तैयार थे
और मैं यूँ ही फ़िक्र करता था
कि मेरे बग़ैर कैसे रहेंगे
इतने में सर पर घी उड़ेल दिया गया
चिता और तेज़ जलने लगी थी
कि सर पर लल्ला ने ज़ोर से लाठी जड़ी
और आख़िरी साँस भी निकल पड़ी
मर तो कबके चुके थे
कपाल-क्रिया आज हुई थी
आख़िरी झलक में भी
लकड़ियों के बीच से बेटा ही नज़र आया था
पंडित से पूछ रहा था कितनी देर और लगेगी....... 


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